शौर्यपथ लेख / क्रिस्टोफर पाल और नजरुल खान ये दो ऐसे बेवकूफ इंसान है जो शिक्षा के लिए आज लड़ाई जमीनी स्तर पर लड़ रहे है और समझदार पालक सोशल मिडिया पर ज्ञान पेल रहे है . मुझे इनकी शिक्षा और निजी स्कूल की लड़ाई देख कर एक किस्सा याद आया . आज से तीन साल पहले की बात थी मेरे निक्की का स्कूल फीस समय पर नहीं दे पाने के कारण डीएवी स्कूल हुडको से बार बार फोन आ रहे थे जब भी फोन आता मई कॉल पर अपनी मज़बूरी बता कर कुछ दिनों बाद फीस जमा करने की बात बता देता किन्तु मेरे बताये समय का इंतज़ार भी नहीं हो रहा था स्कूल प्रबंधन को रोज रोज के काल और मेरे निक्की द्वारा फीस जमा करने के लिए स्चूओल से मेसेज आना बंद नहीं हुआ तब मैंने स्कूल के प्राचार्य से मुलाकात की और अपनी समस्या राखी तथा ये भी बताया कि मेरे द्वारा समय माँगा गया किन्तु इसके बावजूद भी लगातार मेसेज किया जा रहा है . मुझे मेसेज किया जा रहा है यहाँ तक तो सही है किन्तु मेरे बेटे के द्वारा मेसेज कर मेरे लाल के बाल मन में क्यों जहर घोला जा रहा है उसे क्यों सबके सामने शर्मिंदा किया जा रहा है प्रिंसिपल द्वारा इतनी बड़ी बात होने पर भी नियमो की दुहाई देने और फीस जमा करने की बात कही गयी जबकि शासन के नियमानुसार फीस के लिए बच्चो को परेशां करना मानसिक आघात पहुँचाना अपराध की श्रेणी में आता है किन्तु लालच से भरपूर स्कूल प्रबंधन को किसी से कोई मतलब नहीं मतलब है तो फीस से खैर मैंने जो समय माँगा था उस तय समय पर मेरे द्वारा फीस भर दी गयी पुरे पेनाल्टी सहित . पेनाल्टी सहित फीस भरने के बाद जब प्रिंसिपल से मुलाकात की और कहा की सर मेरे द्वारा देर से फीस भरने के कारण आपने जो पेनाल्टी तय की थी उसे भी भर दिया गया अब आपकी बारी है पेनाल्टी भरने की प्रिंसिपल के शब्द थे कि हम कौन सी पेनल्टी भरे तब मैंने कहा कि इतने दिनों आपने जो बच्चे को मानसिक पीड़ा दी उसकी पेनाल्टी कौन भरेगा मुझे अच्छे से याद है कि प्रिन्सिपल के वो वाक्य देर आपने की हमने हमारा काम किया . अगर आपको अच्छा नहीं लगता तो आप बच्चो को स्कूल से निकाल सकते है हम हर मामले में सही है . हालंकि प्रिंसिपल को समझ में आया की गलती उसकी भी है किन्तु बच्चो के भविष्य के लिए हमने बात खत्म की .
लेकिन उसके कुछ दिनों बाद ही एक वाकया हुआ तब वार्षिक उत्सव की तैयारी चलने लगी जिसके लिए जो जो प्रतिभागी था उसे समय समय पर स्कूल बुलाया जाता था मेरा लाल भी इस प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और निर्धारित समय पर स्कूल बस से जाने लगा लगातार १० दिनों तक जाने के बाद जिस दिन फाइनल सलेक्शन होना था उस दिन जाने का समय परिवर्तन हुआ जिसकी सुचना स्कूल से मिलनी चाहिए थी किन्तु मुझे समय पर नहीं मिली और मेरा लाल फाइनल सलेक्शन के दिन नहीं जा पाया इस तरह वो आयोजन में प्रतिभागी नहीं बन पाया जिसके कारण काफी उदास हो गया रोया भी मुझे इस बात का पता चलते ही मई अपने बेटे को स्कूल लेकर गया और प्रिंसिपल से मुलाक़ात की सारी बात राखी तब प्रिंसिपल का दो शब् मुझे स्तभ कर गया सॉरी स्टाफ से गलती हो गयी . किन्तु मुझे सार्री मंजूर नहीं था जिस तरह फीस की देरी की सजा मुझे मिली मेरे बच्चे को मिली उसी तरह इस लापरवाही की सज़ा भी जिम्मेदार को मिलनी ही चाहिए मई प्राचार्य के सामने अड़ गया कि जिसकी भी गलती के कारण मेरा बेटा प्रतिभागी नहीं बन पाया उसे सजा मिलनी ही चाहिए क्योकि मेरे द्वारा आपके स्कूल का हर नियम का पालन किया गया अब ये स्कूल प्रबंधन की जिम्मेदारी है कि जिसने भी गलती की है उसे सजा मिले काफी बहस और तर्क वितर्क के बाद स्कूल के प्राचार्य ने जिम्मेदार लोगो को जिसमे बस कंडक्टर जिसने फोन पर सूचित नहीं किया , मेसेज भेजने वाले स्टाफ जिसने समय पर मेसेज नहीं भेजा , नहीं आने का कारण नहीं पूछने वाले टीचर पर कार्यवाही की बात स्व्वेकार की तब मैंने कहा की इन सबके जिम्मेदार आप भी है जिनके अंडर में ये सारा कार्य हो रहा है मुखिया होने के नाते गलती आपकी भी है आखिर कार स्कूल के प्राचार्य ने भी माफ़ी मांगी इन सब वाक्य में मैंने अपने बेटे को साथ रखा . जब स्कूल से बाहर निकले तब मैंने बेटे को बताया कि बेटा स्कूल फीस किसी मज़बूरी वश देर से देने के बाद भी सजा के तौर पर पेनाल्टी भरी क्योकि गलती हमारी थी कि हमने स्कूल फीस समय पर जमा नहीं कराई और इस गलती के लिए पेनाल्टी भरने के साथ स्कूल प्रबंधन से देर से फीस जमा करने के लिए माफ़ी भी मांगी उसी तरह इस बार तुम वार्षिक उत्सव में प्रतिभागी नहीं बने इसमें गलती तुम्हारी नहीं स्कूल प्रबंधन की थी और इस लिए स्कूल प्रबंधन से न्याय के लिए लड़ाई लड़ी उनके माफ़ी मांगने से जीत नहीं हुई जीत इस लिए हुई कि तुम कही गलत नहीं थे वो गलत थे इसलिए मन में ये ना सोंचो की वार्षिक उत्सव में भाग नहीं ले पाए अगले साल फिर मेहनत करना और भाग लेना . किन्तु भगवान को शायद मंजूर नहीं था अगले साल मेरा बेटा ही इस दुनिया में नहीं रहा उसे तो इश्वर ने सभी प्रतियोगिता से मुक्त कर दिया स्कूल की भी और जिन्दगी की भी .
आज उन्ही बच्चो पर अन्याय ना हो और बच्चो का हक उन्हें मिले इस लिए शहर के दो पागल इंसान क्रिस्टोफर पाल और नजरुल खान निजी स्कूल की मनमानी निति के खिलाफ लड़ रहे है और कुछ पालक तो साथ है किन्तु बहुतेरे पालक दुर से सोशल मिडिया से ज्ञान दे रहे है किन्तु साथ नहीं आ रहे है . अरे समझदार पालको नजरुल खान और क्रिस्टोफर पाल जैसे लोग अपने बच्चो के लिए नहीं लड़ रहे है आपके लिए लड़ रहे है उन निजी स्कूल वालो से जो सालो पहले एक छोटे से घर में रहते थे एक छोटी सी किराए की बिल्डिंग में स्कूल चलाते थे आज लाखो की गाडियों में घूम रहे है करोडो की बिल्डिंग के मालिक है लाखो रूपये घुमने फिरने में खर्च करते है लखपति से करोडपति हो गए है किन्तु वैश्विक महामारी के समय भी ऐसे पेश आ रहे है कि अगर फीस नहीं मिली तो बर्बाद हो जायेंगे बस एक बार दिल में हाँथ रखकर ये सोंचो कि जो आज स्कूल के मालिक है वो कुछ साल पहले कैसी जिन्दगी जी रहे थे और कितनी संपत्ति थी और अब कितनी है . नजरुल खान और क्रिस्टोफर पाल जैसे लोग बेवकूफ नहीं है बेवकूफ तो वो है जो अपने बच्चो के साथ हो रहे अन्याय के बाद भी मौन है शिक्षा पर सबका अधिकार है किन्तु शिक्षा को बेचने वाले को ये बात तभी समझ आएगी जब आप लोग संगठित हो जाओगे नहीं तो आज नहीं तो कल आपके बच्चो के कंधो का सहारा लेकर ये निजी स्कूल वाले लालची प्रवित्ति के लोग आपको बेइज्जत करते रहेंगे साथ ही बच्चो के बालमन के साथ खिलवाड़ मै तो बेवकूफ नजरुल खान के साथ हु मै तो बेवकूफ क्रिस्टोफर के साथ हूँ क्योकि मै बेवकूफ हूँ लेकिन एक पिता हूँ जो अपने बच्ची के भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं कर सकता और लालची लोगो का साथ नहीं दे सकता समझदारी से अच्छा बेवकूफ कहलाना पसंद करूँगा क्योकि अपने बच्ची के साथ अन्याय नहीं होने दूंगा . हाँ मै क्रिस्टोफर और नजरुल जैसे लोगो के साथ हूँ जो शिक्षा के लिए लड़ाई लड़ रहे है . आप किसके साथ है ये आपके ऊपर है क्योकि बच्चे आपके है उनके भविष्य की चिंता आपको ज्यादा है सबसे ज्यादा .... ( शरद पंसारी - सम्पादक , दैनिक शौर्यपथ समाचार पत्र )