जयपुर / शौर्यपथ / राजस्थान के बारां जिले की अंता विधानसभा सीट पर उपचुनाव को लेकर इस बार वसुंधरा राजे, बीजेपी और कांग्रेस तीनों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। बीजेपी ने पूर्व सीएम वसुंधरा राजे की पसंद पर मोरपाल सुमन को मैदान में उतारा, वहीं कांग्रेस ने गहलोत सरकार के मंत्री प्रमोद जैन भाया पर फिर से भरोसा दिखाया है। निर्दलीय उम्मीदवार नरेश मीणा की जबरदस्त मौजूदगी इस बार मुकाबले को त्रिकोणीय बना रही है, जिससे सारे सियासी समीकरण उलझ गए हैं.
राजनैतिक समीकरण और विश्लेषण
बीजेपी के लिए अंता सीट सिर्फ जीत का सवाल नहीं, बल्कि पूर्व सीएम वसुंधरा राजे की साख से भी जुड़ी हुई है। उनकी पसंद के प्रत्याशी मोरपाल सुमन का मुकाबला स्थानीय मुद्दों, विकास और क्षेत्रीय मतदाताओं की अपेक्षाओं से है। राजे ने अपनी कोर टीम के साथ क्षेत्र में डेरा डाला है और खुद प्रचार की कमान संभाल रखी है.
कांग्रेस ने दो बार के विधायक और मंत्री प्रमोद जैन भाया पर भरोसा जताया है, जिनकी पहचान स्थानीय विकास और सामाजिक सक्रियता के आधार पर मजबूत मानी जा रही है। भाया पिछड़े क्षेत्र में सुलभ छवि और पूर्ववर्ती कार्य के आधार पर मतदाताओं को लुभा रहे हैं.
निर्दलीय नरेश मीणा युवा और मीणा समाज के बीच लोकप्रियता के साथ मैदान में हैं, जिन्हें आम आदमी पार्टी और आरएलपी जैसी विपक्षी ताकतों का समर्थन मिला है। वह बीजेपी और कांग्रेस दोनों के वोटों में महत्वपूर्ण सेंधमारी की संभावना रखते हैं.
सीट का सामाजिक समीकरण और मतदान
अंता सीट पर करीब 2.28 लाख मतदाता हैं—116783 पुरुष, 111477 महिला और 4 थर्ड जेंडर वोटर।
जातिगत समीकरण निर्णायक हैं: माली, मीणा, अनुसूचित जाति, धाकड़ आदि प्रमुख समूह हैं, जिनकी गोलबंदी पर चुनावी परिणाम निर्भर करेगा.
बीजेपी-कांग्रेस दोनों को आपसी खींचतान और भितरघात का सामना करना पड़ रहा है; वहीं नरेश मीणा के समर्थन से इलाके का युवा—खासकर मीणा समाज—सक्रिय रूप से तीसरी ताकत को उभरता देख रहा है.
चुनावी मुद्दे और प्रचार
चुनाव में स्थानीय विकास, किसानों की समस्या, सिंचाई-सुविधाएं और बेरोजगारी जैसा ज्वलंत मुद्दे प्रभावी हैं। प्रचार के अंतिम दौर में दोनों बड़े दलों के दिग्गज नेता—वसुंधरा राजे, सीएम भजनलाल शर्मा, अशोक गहलोत—डोर टू डोर, रोड शो और रैलियों कर माहौल गर्म किए हुए हैं.सुरक्षा के कड़े इंतजाम के बीच 11 नवंबर को मतदान होगा, जबकि नतीजे 14 नवंबर को आएंगे।
अंता उपचुनाव राज्य के लिए केवल एक सीट का सवाल नहीं, बल्कि राजे और गहलोत जैसे बड़े नेताओं की प्रतिष्ठा और मीणा समाज की गोलबंदी की नई दिशा तय करने वाला महासंग्राम बन गया है.