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कोलकाता ED छापेमारी विवाद: हाई कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक टकराव, जांच एजेंसियों बनाम राज्य सरकार आमने-सामने Featured

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कोलकाता।
कोलकाता में 8 जनवरी 2026 को राजनीतिक कंसल्टेंसी फर्म I-PAC के ठिकानों पर हुई प्रवर्तन निदेशालय (ED) की छापेमारी ने अब गंभीर कानूनी और राजनीतिक संकट का रूप ले लिया है। यह मामला कलकत्ता हाई कोर्ट से होते हुए सीधे सुप्रीम कोर्ट पहुँच चुका है, जहाँ केंद्र की जांच एजेंसी और पश्चिम बंगाल सरकार आमने-सामने खड़ी नजर आ रही हैं।

क्या है पूरा मामला

ED ने वर्ष 2020 के कोयला तस्करी प्रकरण से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग की जांच के तहत कोलकाता स्थित I-PAC कार्यालय और इसके निदेशक प्रतीक जैन के आवास पर छापेमारी की थी। ED का दावा है कि छापेमारी के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी मौके पर पहुँचीं और जांच में हस्तक्षेप करते हुए कुछ डिजिटल उपकरण व दस्तावेज अपने साथ ले गईं।

वहीं, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि ED आगामी 2026 विधानसभा चुनाव से पहले तृणमूल कांग्रेस (TMC) का गोपनीय राजनीतिक डेटा हासिल करने की कोशिश कर रही थी। उन्होंने इस कार्रवाई को राजनीतिक बदले की भावना से प्रेरित बताया।

हाई कोर्ट में हंगामा, सुनवाई टली

ED ने मुख्यमंत्री के खिलाफ FIR दर्ज कराने और मामले की CBI जांच की मांग को लेकर कलकत्ता हाई कोर्ट का रुख किया।
9 जनवरी 2026 को सुनवाई के दौरान वकीलों के बीच तीखी नोक-झोंक और हंगामे के चलते कार्यवाही बाधित हो गई। इसके बाद जस्टिस सुभ्रा घोष ने मामले की अगली सुनवाई 14 जनवरी 2026 तक के लिए स्थगित कर दी।

सुप्रीम कोर्ट में सीधी दस्तक

हाई कोर्ट में सुनवाई टलने के बाद ED ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी। एजेंसी का तर्क है कि जब राज्य की शीर्ष राजनीतिक कार्यपालिका पर ही हस्तक्षेप के आरोप हों, तब निष्पक्ष जांच केवल CBI से ही संभव है।

इधर, संभावित याचिका को भांपते हुए पश्चिम बंगाल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में पहले ही कैविएट दाखिल कर दी थी। इसका सीधा अर्थ है कि राज्य सरकार का पक्ष सुने बिना शीर्ष अदालत कोई भी एकतरफा आदेश पारित नहीं कर सकती।

ताज़ा घटनाक्रम: पुलिस बनाम ED

मामले ने नया मोड़ तब लिया जब कोलकाता पुलिस ने ED अधिकारियों के खिलाफ भी मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी। पुलिस ने प्रतीक जैन के आवास से CCTV फुटेज जब्त किए हैं, जिन्हें छापेमारी के दौरान की घटनाओं से जोड़कर देखा जा रहा है।
यह स्थिति अभूतपूर्व मानी जा रही है, जहाँ एक केंद्रीय जांच एजेंसी और राज्य पुलिस आमने-सामने आ गई हैं।

राजनीतिक तापमान चरम पर

तृणमूल कांग्रेस ने इस पूरे घटनाक्रम को चुनावी साजिश करार देते हुए इसे अपने राजनीतिक अभियान का हिस्सा बना लिया है। पार्टी का आरोप है कि केंद्र सरकार जांच एजेंसियों का इस्तेमाल कर राज्य की राजनीति को प्रभावित करना चाहती है। वहीं, विपक्ष इसे कानून के राज का मामला बताकर मुख्यमंत्री से जवाबदेही की मांग कर रहा है।

आगे क्या?

अब सबकी निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं। यह मामला केवल एक छापेमारी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह केंद्र-राज्य संबंध, जांच एजेंसियों की स्वतंत्रता, और संवैधानिक सीमाओं की बड़ी परीक्षा बन चुका है।
शीर्ष अदालत का फैसला न सिर्फ इस प्रकरण की दिशा तय करेगा, बल्कि भविष्य में ऐसे टकरावों के लिए भी एक महत्वपूर्ण न्यायिक मिसाल साबित हो सकता है।

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