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“गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने गिराया देश का मान: एआई समिट में फर्जी स्वदेशी प्रदर्शन”

  • devendra yadav birth day

**एआई नहीं, एरोगेंस ऑफ इग्नोरेंस!

गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने ‘मेड इन इंडिया’ को बनाया ‘मेड इन इल्यूजन’**

नई दिल्ली | विशेष रिपोर्ट

जिस मंच से भारत को विश्व को यह संदेश देना था कि वह अब एआई का उपभोक्ता नहीं, निर्माता बन चुका है, उसी मंच को गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने एक ऐसे कृत्य से शर्मसार कर दिया, जिसे भ्रम, अज्ञान और अकादमिक लापरवाही का संयुक्त प्रदर्शन कहना गलत नहीं होगा।

इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026, भारत मंडपम—जहाँ नीति, नवाचार और राष्ट्रीय गौरव का संगम होना था—वहाँ गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने चीनी रोबोट को भारतीय आत्मनिर्भरता का प्रतीक बताकर पेश कर दिया


जब ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ बना ‘सेंटर ऑफ एक्सक्यूज़’

जिस रोबोटिक डॉग को मंच से ‘ओरियन’ कहकर स्वदेशी नवाचार बताया गया, वह असल में चीन की यूनिट्री कंपनी का ‘Unitree Go2’ मॉडल निकला—जो न तो गुप्त है, न दुर्लभ, और न ही शोध का चमत्कार।
विडंबना यह रही कि 2–3 लाख रुपये में ऑनलाइन उपलब्ध इस उत्पाद को यूनिवर्सिटी के प्रतिनिधियों ने कैम्पस में विकसित शोध का नाम दे दिया।


वीडियो ने किया वह काम, जो विवेक नहीं कर सका

यदि सोशल मीडिया पर प्रोफेसर का दावा करता हुआ वीडियो वायरल न हुआ होता, तो शायद यह ‘स्वदेशी झूठ’ सरकारी मंच पर यूँ ही तालियाँ बटोरता रहता।
विडंबना यह है कि जिस विश्वविद्यालय से ज्ञान और सत्यनिष्ठा की अपेक्षा होती है, वहीं से गलत जानकारी आत्मविश्वास के साथ परोसी गई


सरकारी मंच, निजी लापरवाही

सरकार ने स्पष्ट कहा—दूसरे देश की तकनीक को अपनी बताने की अनुमति नहीं दी जा सकती
पर सवाल यह है कि—

  • क्या गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने एक बार भी तकनीकी सत्यापन की ज़रूरत समझी?

  • क्या ‘आत्मनिर्भर भारत’ सिर्फ़ स्टॉल सजाने का नारा बनकर रह गया?


माफी नहीं, जिम्मेदारी चाहिए

घटना के बाद आई माफी और सफाई यह बताने के लिए पर्याप्त है कि—

“प्रतिनिधि को जानकारी नहीं थी, उत्साह में गलत कहा गया।”

लेकिन यह वही उत्साह है, जिसने—

  • राष्ट्रीय मंच की विश्वसनीयता को ठेस पहुँचाई

  • और भारत के एआई प्रयासों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर असहज स्थिति में डाल दिया


गलगोटिया इफेक्ट: मेहनत दूसरों की, श्रेय हमारा?

यह घटना केवल एक विश्वविद्यालय की भूल नहीं, बल्कि उस मानसिकता का उदाहरण है, जहाँ
खरीदी गई मशीन को ‘खोज’ और
ब्रांडिंग को ‘ब्रेकथ्रू’
समझ लिया गया।


एआई समिट में गलगोटिया यूनिवर्सिटी की मौजूदगी नवाचार की नहीं, बल्कि नासमझी की पहचान बन गई।
यदि भारत को सच में एआई महाशक्ति बनना है, तो उसे ऐसे ‘स्वदेशी दिखावे’ से नहीं, बल्कि ईमानदार शोध से आगे बढ़ना होगा।

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