16 जुलाई को सर्वोच्च न्यायालय ने नागरिकता, मध्यस्थता और लंबित मामलों के त्वरित निपटारे से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर सुनवाई करते हुए निष्पक्ष न्यायिक प्रक्रिया और समयबद्ध न्याय पर जोर दिया।
नई दिल्ली / शौर्यपथ / सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को नागरिकता निर्धारण, वाणिज्यिक मध्यस्थता (Arbitration) और वर्षों से लंबित मामलों के शीघ्र निपटारे से जुड़े महत्वपूर्ण मामलों पर सुनवाई हुई। अदालत ने कई अहम कानूनी सिद्धांतों को स्पष्ट करते हुए न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता को सर्वोच्च प्राथमिकता बताया।
नागरिकता से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि फॉरेनर्स एक्ट, 1946 की धारा 9 के तहत भारतीय नागरिकता साबित करने का दायित्व संबंधित व्यक्ति पर होता है। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति को विदेशी घोषित करने जैसा गंभीर निर्णय बिना उचित जांच, पर्याप्त सुनवाई और निष्पक्ष प्रक्रिया अपनाए नहीं किया जा सकता। ट्रिब्यूनल को एकतरफा (एक्स-पार्टी) कार्रवाई से बचते हुए प्रत्येक मामले में तर्कसंगत और न्यायसंगत प्रक्रिया का पालन करना होगा।
मध्यस्थता (Arbitration) से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गुवाहाटी हाईकोर्ट के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें गैर-हस्ताक्षरकर्ता कंपनियों के विरुद्ध मध्यस्थता कार्यवाही पर रोक लगाई गई थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि मध्यस्थता न्यायाधिकरण (Tribunal) के क्षेत्राधिकार से संबंधित आदेशों को सीधे संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत चुनौती नहीं दी जा सकती। ऐसे मामलों में अंतिम मध्यस्थता निर्णय आने के बाद ही उपयुक्त कानूनी उपाय अपनाए जा सकते हैं।
इसके अलावा, सर्वोच्च न्यायालय ने वर्षों से लंबित लगभग 800 पुराने सिविल और आपराधिक मामलों के शीघ्र निपटारे की दिशा में भी महत्वपूर्ण पहल की। इन मामलों की सुनवाई के लिए विशेष रोस्टर और विशेष पीठों (Special Benches) के गठन की प्रक्रिया पर चर्चा हुई, ताकि लंबित मामलों का तेजी से निस्तारण सुनिश्चित किया जा सके।