नई दिल्ली / एजेंसी / भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) की मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और इसके लिए इस्तेमाल किए जा रहे ECINet तकनीकी प्लेटफॉर्म को लेकर देशभर में बहस तेज हो गई है। 2,000 से अधिक समाजसेवियों, एक्टिविस्टों, पूर्व नौकरशाहों, वकीलों और शिक्षाविदों ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को खुला पत्र भेजकर सुप्रीम कोर्ट से मामले में हस्तक्षेप की मांग की है।
खुले पत्र पर समाजसेवी प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव, अंजलि भारद्वाज, पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल विष्णु भागवत, मद्रास हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश डी. हरिपरंथामन, अर्थशास्त्री जयती घोष और पूर्व नौकरशाह जवाहर सरकार समेत कई लोगों के हस्ताक्षर बताए गए हैं।
ECINet और मतदाता डेटा के केंद्रीकरण पर आपत्ति
हस्ताक्षरकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि SIR प्रक्रिया के माध्यम से मतदाता डेटाबेस का केंद्रीकरण किया जा रहा है और Form-6 में कथित तौर पर अनधिकृत बदलाव किए गए हैं। पत्र में यह भी दावा किया गया है कि ECINet के इस्तेमाल से स्थानीय निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों (ERO) के अधिकार प्रभावित हो रहे हैं।
पत्र में करीब 13 करोड़ वैध मतदाताओं के नाम हटाए जाने की आशंका या ऐसे मामलों का भी उल्लेख किया गया है। हालांकि, ये दावे पत्र भेजने वाले समूह के आरोप हैं और इनके संबंध में चुनाव आयोग का पक्ष अलग है।
SIR पर रोक और न्यायिक जांच की मांग
हस्ताक्षरकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से पूरे देश में चल रही SIR प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाने, मामले का स्वतः संज्ञान लेने और चुनाव आयोग के प्रशासनिक आचरण की स्वतंत्र न्यायिक जांच कराने की मांग की है।
पहले सुप्रीम कोर्ट ने SIR को माना था वैध
इस विवाद के बीच महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में SIR प्रक्रिया को संवैधानिक और वैध माना था। कोर्ट ने कहा था कि फर्जी मतदाताओं को हटाने के उद्देश्य से मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण करना चुनाव आयोग के संवैधानिक अधिकार क्षेत्र में आता है।
ECI ने सर्वसम्मति से फैसले का दावा किया
चुनाव आयोग ने उठ रहे विवादों के बीच स्पष्ट किया है कि SIR से संबंधित फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं। साथ ही, ECINet प्लेटफॉर्म को लेकर उठे सवालों के मद्देनजर आयोग ने इसकी समीक्षा के लिए विशेषज्ञ समिति गठित करने की घोषणा भी की है।
SIR को लेकर अब एक ओर मतदाता सूची की शुद्धता और फर्जी नामों को हटाने का संवैधानिक अधिकार महत्वपूर्ण मुद्दा है, वहीं दूसरी ओर प्रक्रिया की पारदर्शिता, तकनीकी व्यवस्था और वैध मतदाताओं के अधिकारों को लेकर उठाई गई आपत्तियां भी सुप्रीम कोर्ट के संभावित विचार का विषय बन सकती हैं।