दुर्ग। शौर्यपथ विशेष।
दुर्ग जिले की राजनीतिक भूमि एक बार फिर हिल रही है—इस बार वजह है एक ऐसा नाम, जिसे कार्यकर्ता अपना नेता मानते थे और जनता मजदूरों की आवाज। हम बात कर रहे हैं ध्रुव कुमार ‘लंगूर’ सोनी की, जिन्होंने कांग्रेस की अनदेखी और संगठन की मनमानी नीति से आहत होकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को अलविदा कह दिया है।
कांग्रेस के लिए यह एक बड़ा झटका है, लेकिन भारतीय जनता मजदूर संघ के लिए यह संगठनात्मक मजबूती का ऐलान है। ध्रुव सोनी को भारतीय जनता मजदूर संघ ने न सिर्फ स्वीकार किया, बल्कि सीधे प्रदेश महासचिव की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंप दी, यह बताने के लिए काफी है कि जो नेता ज़मीनी होता है, उसे नजरअंदाज करना किसी संगठन की बड़ी भूल साबित हो सकती है।
?️ मजदूरों की आवाज, ध्रुव सोनी का नाम
ध्रुव कुमार सोनी सिर्फ एक नेता नहीं, बल्कि एक संघर्षशील कार्यकर्ता, एक जनप्रिय चेहरा और मजदूर हितों की लड़ाई का प्रतीक रहे हैं। वर्षों तक कांग्रेस के साथ रहते हुए उन्होंने पार्टी के लिए दिन-रात एक किया, लेकिन जब बदले में संगठन ने उन्हें सिर्फ उपेक्षा और चुप्पी दी, तब उन्होंने वो रास्ता चुना जहां संघर्ष को सम्मान मिलता है।
भारतीय जनता मजदूर संघ का यह कदम बताता है कि बीजेपी समर्थित संगठन न केवल कार्यकर्ताओं की काबिलियत पहचानते हैं, बल्कि उन्हें उचित मंच और सम्मान भी देते हैं। यही वजह है कि कांग्रेस की निष्क्रियता से उपजी एक नेता की नाराज़गी, अब पूरे प्रदेश के मजदूरों की ताकत बन गई है।
? कांग्रेस की रणनीतिक चूक या चाटुकारों की जीत?
ध्रुव कुमार सोनी के कांग्रेस छोड़ने के पीछे सिर्फ एक कारण नहीं—बल्कि एक सिस्टमेटिक इग्नोरेंस की परतें हैं। जिला कांग्रेस के कुछ तथाकथित मठाधीश नेताओं की चाटुकारिता आधारित राजनीति ने कई जमीनी नेताओं को हाशिए पर धकेल दिया।
जब कार्यकर्ता सिर्फ इसलिए नजरअंदाज हो, क्योंकि वह सच बोलता है और जनहित के मुद्दे उठाता है, तो वह संगठन कब तक उसके समर्पण को रोक पाएगा? आज कांग्रेस को आत्ममंथन करने की जरूरत है—क्या वे चाटुकारों की भीड़ में असली नेताओं को खो रहे हैं?
?️ अब नई जिम्मेदारी, नया संघर्ष
ध्रुव कुमार ‘लंगूर’ सोनी को भारतीय जनता मजदूर संघ छत्तीसगढ़ का प्रदेश महासचिव बनाए जाने से यह तय हो गया है कि वे अब केवल दुर्ग नहीं, पूरे प्रदेश के मजदूरों की आवाज बनेंगे। यह न सिर्फ उनके संघर्ष का सम्मान है, बल्कि उन हजारों- लाखो मजदूरों की उम्मीदों का भी विस्तार है, जो अब संगठन के माध्यम से अपनी बात बुलंद कर सकेंगे।
एक निष्कर्ष – जिन्हें दरकिनार किया गया, वही अब सबसे आगे हैं
कांग्रेस के लिए यह एक चेतावनी भी है और एक अवसर भी—चेतावनी इस बात की कि अगर जमीन से जुड़े नेताओं को नजरअंदाज किया गया तो पार्टी और अधिक खोएगी, और अवसर इस बात का कि अभी भी वक्त है, चाटुकारों से ऊपर उठकर वास्तविक कार्यकर्ताओं को पहचानें।
ध्रुव कुमार सोनी अब एक दल के नहीं, बल्कि मजदूरों के संघर्ष की पहचान हैं।