*रेट प्रिंट से ऊपर बिक रहा ज़हर!
कोंडागांव में गुटखा-सिगरेट की अवैध बिक्री,
नए टैक्स से पहले थोक व्यापारियों की जमाखोरी,
विभागीय चुप्पी से पनप रहा काला कारोबार**
कोंडागांव | दीपक वैष्णव की विशेष रिपोर्ट
एक ओर आम आदमी महंगाई की मार से जूझ रहा है, तो दूसरी ओर कोंडागांव का बाजार नए नियम लागू होने से पहले ही मनमानी महंगाई और कालाबाजारी का गवाह बन चुका है। नगर में गुटखा, जर्दा और सिगरेट बिना रेट प्रिंट, तय मूल्य से कहीं अधिक दामों पर खुलेआम बेचे जा रहे हैं, जबकि संबंधित विभाग कुंभकर्णी नींद में सोया हुआ नजर आ रहा है।
नए नियम से पहले ही ‘लूट का लाइसेंस’!
भारत सरकार द्वारा 1 फरवरी 2026 से तंबाकू उत्पादों पर नए उत्पाद शुल्क, स्वास्थ्य उपकर और राष्ट्रीय सुरक्षा उपकर लागू किया जाना है। साथ ही चबाने वाले तंबाकू, जर्दा व पान-मसाला के लिए नए पैकिंग नियम अधिसूचित किए जा चुके हैं।
लेकिन कोंडागांव में नियम लागू होने से पहले ही
? थोक व्यापारियों ने जमाखोरी शुरू कर दी है
? पुराने स्टॉक को नए दामों पर खपाया जा रहा है
? छोटे दुकानदार मजबूरी में अधिक कीमत पर बेचने को विवश हैं
यह स्थिति केवल महंगाई नहीं, बल्कि संगठित कालाबाजारी का संकेत देती है।
प्रतिबंध के बावजूद धड़ल्ले से गुटखा बिक्री
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद देश के कई राज्यों में गुटखा के उत्पादन और बिक्री पर प्रतिबंध है। इसके बावजूद कोंडागांव के हर चौक-चौराहे, ठेले-गुमटी और किराना दुकानों में
थोक और चिल्लर दोनों स्तर पर प्रतिबंधित गुटखा खुलेआम बिक रहा है।
यह सवाल खड़ा करता है कि
➡️ यह माल आ कहां से रहा है?
➡️ किसकी मिलीभगत से बाजार तक पहुंच रहा है?
➡️ और विभाग की निगाहें आखिर कहां टिकी हैं?
**त्योहारों में मिठाई दुकानों पर छापे,
लेकिन गुटखा पर ‘अघोषित संरक्षण’?**
विभाग की कार्यशैली भी सवालों के घेरे में है।
त्योहारी सीजन में
✔️ मिठाई दुकानों पर लगातार दबिश
✔️ सैंपल लेकर ‘खाना-पूर्ति’ की कार्रवाई
लेकिन शहर भर में चल रहे गुटखा-सिगरेट के अवैध कारोबार पर न कोई छापा, न कोई कार्रवाई।
यह चयनात्मक सक्रियता स्पष्ट रूप से विभागीय लापरवाही या मौन सहमति की ओर इशारा करती है।
राजस्व चोरी और सुशासन की पोल
बिना रेट प्रिंट, बिना वैध टैक्स और तय मूल्य से अधिक दामों पर बिक्री
? सीधे-सीधे सरकारी राजस्व की चोरी है
? स्वास्थ्य कानूनों की खुली अवहेलना है
? और सुशासन के दावों पर करारा तमाचा है
प्रदेश सरकार भले ही सुशासन की बात करे,
लेकिन कोंडागांव की जमीनी हकीकत बताती है कि नियम सिर्फ कागजों में जिंदा हैं।
सबसे बड़ा सवाल — जिम्मेदार कौन?
अब सवाल यह नहीं कि
❓ गुटखा बिक रहा है या नहीं
बल्कि सवाल यह है कि
❓ कब जागेगा संबंधित विभाग?
❓ किस अधिकारी की जिम्मेदारी तय होगी?
❓ या फिर यह अवैध कारोबार यूं ही फलता-फूलता रहेगा?
यदि समय रहते सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो यह सिर्फ कानून की हार नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य और राजस्व दोनों के साथ खुला अपराध माना जाएगा।