वन विभाग की ‘नैतिक दबाव’ रणनीति पर संवैधानिक बहस, कांग्रेस ने बताया तानाशाही फरमान
रायपुर, 05 फरवरी 2026।
छत्तीसगढ़ में वन्यजीवों के अवैध शिकार को रोकने के लिए वन विभाग द्वारा प्रस्तावित ‘सामाजिक बहिष्कार’ की रणनीति अब एक बड़े राजनीतिक और संवैधानिक विवाद का रूप ले चुकी है। जहां वन विभाग इसे समुदाय आधारित संरक्षण मॉडल बता रहा है, वहीं कांग्रेस ने इसे संविधान विरोधी, जंगलराज और भीड़तंत्र को बढ़ावा देने वाला फैसला करार दिया है।
वन विभाग का पक्ष: कानून के साथ नैतिक दबाव की नीति
प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) एवं मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक के अनुसार, केवल जेल और जुर्माने के डर से शिकार पूरी तरह नहीं रुक पा रहा है। इसी पृष्ठभूमि में विभाग ने Community for Conservation मॉडल के तहत सामाजिक दबाव की अवधारणा सामने रखी है।
वन विभाग की रणनीति के प्रमुख उद्देश्य:
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नैतिक दबाव: गांव-समाज में शिकारी की पहचान उजागर होने से लोक-लाज का डर पैदा करना
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सामुदायिक निगरानी: ग्रामीणों को वन्यजीव संरक्षण में भागीदार बनाना
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युवाओं में संदेश: शिकार को ‘वीरता’ नहीं, बल्कि ‘सामाजिक अपराध’ के रूप में स्थापित करना
प्रस्तावित कदमों में शामिल हैं:
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सार्वजनिक कार्यक्रमों में शिकारियों की भागीदारी सीमित करना
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शिकार में पकड़े गए व्यक्तियों के नाम सार्वजनिक करना
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शिकार बढ़ने पर संबंधित गांव की संयुक्त वन प्रबंधन समिति (JFMC) को मिलने वाले लाभों में कटौती
वन विभाग स्पष्ट कर रहा है कि यह कोई आधिकारिक दंडात्मक आदेश नहीं, बल्कि सामुदायिक संकल्प के रूप में लागू किया जाएगा।
कांग्रेस का हमला: ‘संविधान का अपमान और तानाशाही सोच’
प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ प्रवक्ता धनंजय सिंह ठाकुर ने इस फैसले पर तीखा हमला बोलते हुए वन मंत्री केदार कश्यप से सवाल किया—
“क्या छत्तीसगढ़ में अब कानून नहीं, जंगलराज चलेगा? क्या शिकारियों को अदालत नहीं, गांव की भीड़ सजा देगी?”
कांग्रेस का आरोप है कि:
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सामाजिक बहिष्कार संविधान के मूल अधिकारों के खिलाफ है
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यह व्यवस्था घृणा, तिरस्कार, जातिगत भेदभाव और हिंसा को जन्म दे सकती है
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बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर के संविधान में सामाजिक बहिष्कार जैसी कुरीतियों को खत्म करने का संकल्प था, ऐसे में यह फैसला संविधान का अपमान है
धनंजय ठाकुर ने कहा कि वन विभाग अपनी प्रशासनिक विफलता छुपाने के लिए सामाजिक दंड जैसी व्यवस्था थोपना चाहता है। दिसंबर 2025 की विभागीय बैठक में धर्मगुरुओं, गांव के मुखिया और समाजसेवियों के जरिए बहिष्कार कराने का निर्णय वैमनस्य फैलाने वाला है।
कानूनी बनाम सामाजिक दंड: मूल टकराव
यह पूरा विवाद दो विचारधाराओं के बीच टकराव को उजागर करता है—
| वन विभाग का दृष्टिकोण | कांग्रेस का दृष्टिकोण |
|---|---|
| समुदाय आधारित संरक्षण | संविधान आधारित दंड |
| नैतिक व सामाजिक दबाव | न्यायालय द्वारा सजा |
| सामूहिक जिम्मेदारी | व्यक्तिगत अधिकार |
| रोकथाम पर जोर | कानून के सख्त पालन पर जोर |
कांग्रेस की मांग
कांग्रेस ने सरकार से मांग की है कि:
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सामाजिक बहिष्कार जैसे फैसले पर तत्काल रोक लगाई जाए
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शिकारियों को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत कड़ी कानूनी सजा दी जाए
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ऐसे निर्णय लेने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई की जाए
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वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए ठोस और संवैधानिक उपाय किए जाएं