विवाह-तलाक, उत्तराधिकार, भरण-पोषण और लिव-इन संबंधों पर हुई चर्चा; आदिवासी परंपराओं के संरक्षण से लेकर लैंगिक समानता तक उठे मुद्दे
रायपुर । छत्तीसगढ़ में समान नागरिक संहिता (UCC) के संभावित क्रियान्वयन को लेकर राज्य स्तर पर गठित उच्च स्तरीय समिति की दो दिवसीय परामर्श बैठक में विभिन्न सामाजिक संगठनों, जनप्रतिनिधियों, अधिवक्ताओं, चिकित्सा क्षेत्र के प्रतिनिधियों और राज्य आयोगों के सदस्यों के साथ व्यापक चर्चा की गई। पुराना सर्किट हाउस के सभाकक्ष में आयोजित बैठक में विवाह एवं तलाक, उत्तराधिकार एवं विरासत, भरण-पोषण और लिव-इन रिलेशनशिप जैसे महत्वपूर्ण एवं संवेदनशील विषयों पर विभिन्न पक्षों से सुझाव आमंत्रित किए गए।
समिति के सदस्य एवं भारतीय प्रशासनिक सेवा के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी एम.के. राउत की अध्यक्षता में आयोजित बैठक में समिति के सदस्य एवं वरिष्ठ अधिवक्ता मोहन पवार भी उपस्थित रहे। प्रारंभ में पीपीटी के माध्यम से समान नागरिक संहिता से संबंधित वर्तमान नियमों और कानूनी प्रावधानों की जानकारी दी गई। इसके बाद विभिन्न सामाजिक एवं सामुदायिक प्रतिनिधियों के साथ विषयवार चर्चा की गई।
आदिवासी परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण की मांग
बैठक में गोंडी धर्म संस्कृति संरक्षण समिति के प्रांतीय सचिव गजानंद नुरूटी ने आदिवासी समाज की रूढ़िगत परंपराओं और विशिष्ट सांस्कृतिक ताने-बाने के संरक्षण का मुद्दा प्रमुखता से उठाया। उन्होंने आदिवासी समुदाय की मौलिक पहचान, परंपराओं और अधिकारों को सुरक्षित रखने की आवश्यकता बताते हुए उन्हें समान नागरिक संहिता के दायरे से पृथक रखने का औपचारिक अनुरोध समिति के समक्ष रखा।
लैंगिक समानता और समान उत्तराधिकार पर जोर
राज्य अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष अमरजीत सिंह छाबड़ा ने समाज में लैंगिक समानता को प्राथमिकता देने की बात कही। उन्होंने महिला और पुरुष को समान अधिकार देने तथा बेटे और बेटी को संपत्ति में बराबर उत्तराधिकार का अधिकार सुनिश्चित करने का सुझाव दिया।
उन्होंने विवाह एवं तलाक के अनिवार्य पंजीयन, संपत्ति और वसीयत से जुड़े प्रावधानों को स्पष्ट बनाने तथा कानूनी व्यवस्था में पारदर्शिता और समानता सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
ईसाई समाज ने विवाह संस्था और लिव-इन संबंधों पर रखी राय
क्रिश्चियन समाज के राजेश जॉन पाल सहित प्रतिनिधियों ने विवाह संस्था को लेकर अपने विचार समिति के समक्ष रखे। उन्होंने कहा कि उनके समाज में विवाह को ईश्वर द्वारा बनाई गई अटूट जोड़ी के रूप में माना जाता है। प्रतिनिधियों ने लिव-इन संबंधों को सामाजिक रूप से स्वीकार्य नहीं मानने संबंधी अपनी राय भी समिति के सामने रखी।
बच्चों के अधिकार और सामाजिक सुरक्षा पर भी चर्चा
बैठक में राज्य बाल संरक्षण आयोग की अध्यक्ष वर्णिका शर्मा ने बच्चों के अधिकारों और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर अपने विचार रखे। उन्होंने समान नागरिक संहिता के संदर्भ में बच्चों के हितों और उनके संरक्षण से जुड़े विषयों को महत्वपूर्ण बताया।
समिति के सदस्यों ने विभिन्न प्रतिनिधियों द्वारा प्रस्तुत सुझावों को गंभीरता और संवेदनशीलता के साथ सुना। समिति ने कहा कि अलग-अलग सामाजिक समूहों से प्राप्त सुझावों, व्यावहारिक अनुभवों और महत्वपूर्ण तथ्यों का गहन विश्लेषण किया जाएगा, ताकि आगे तैयार होने वाला मसौदा समावेशी, संतुलित और निष्पक्ष हो।
कानूनी प्रावधानों को स्पष्ट और पारदर्शी बनाने पर जोर
बैठक में अधिवक्ता संघ के वरिष्ठ अधिवक्ता बृजेश पांडेय, अधिवक्ता संघ के अध्यक्ष दिनेश देवांगन, अधिवक्ता परिषद के अध्यक्ष प्रमोद तिवारी तथा वरिष्ठ उपाध्यक्ष भारती राठौर ने भी अपने सुझाव दिए। उन्होंने समान नागरिक संहिता के प्रावधानों को अधिक कारगर, स्पष्ट और पारदर्शी बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
बैठक के द्वितीय सत्र में कान्यकुब्ज ब्राह्मण समाज के अध्यक्ष डॉ. सुरेश मिश्रा और आशीष बाजपेयी ने समान नागरिक संहिता को लेकर अपने विचार एवं अभिमत समिति के समक्ष दर्ज कराए।
इसी क्रम में मेडिकल एसोसिएशन के प्रतिनिधि डॉ. कुलदीप सोलंकी, डॉ. सुरभि दुबे और डॉ. के.पी. आजमानी ने भी समान नागरिक संहिता के क्रियान्वयन से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर अपनी राय रखी और समिति को सुझाव दिए।
सभी पक्षों की राय को शामिल करने की कवायद
दो दिनों तक चली इस परामर्श प्रक्रिया से स्पष्ट है कि छत्तीसगढ़ में समान नागरिक संहिता को लेकर समिति विभिन्न सामाजिक वर्गों और समुदायों की राय को व्यापक स्तर पर सामने लाने का प्रयास कर रही है। विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और पारिवारिक कानूनों से जुड़े प्रावधानों के साथ-साथ सांस्कृतिक विविधता, आदिवासी परंपराओं, महिलाओं के अधिकार, बच्चों की सुरक्षा और सामाजिक मान्यताओं जैसे मुद्दे भी चर्चा के केंद्र में रहे।