रायपुर/बेमेतरा। छत्तीसगढ़ में कैदियों के पुनर्वास और उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने की दिशा में राज्य सरकार 2 अक्टूबर, गांधी जयंती के अवसर पर 6 खुली जेलों (Open Jails) की शुरुआत करने जा रही है। इस योजना का प्रमुख केंद्र बेमेतरा जिले के पथर्रा गांव में विकसित खुली जेल होगी, जिसे करीब 23 करोड़ रुपये की लागत से तैयार किया गया है।
खुली जेल की व्यवस्था में पात्र सजायाफ्ता कैदियों को परिवार के साथ रहने और जेल परिसर से बाहर जाकर रोजगार या स्वरोजगार करने का अवसर मिलेगा। पथर्रा में 200 पुरुष सजायाफ्ता कैदी अपनी पत्नी और बच्चों के साथ अलग-अलग क्वार्टरों में रह सकेंगे।
छह स्थानों पर अलग-अलग क्षमता
बेमेतरा (पथर्रा): 200 पुरुष कैदी
दुर्ग: 50 पुरुष कैदी
जगदलपुर: 25 पुरुष और 25 महिला कैदी
रायपुर: 25 महिला कैदी
अंबिकापुर: 15 पुरुष कैदी
बिलासपुर: उपलब्ध जानकारी के अनुसार सीमित क्षमता का परिसर
खुली जेल में पारंपरिक जेलों जैसी ऊंची दीवारों और कठोर सुरक्षा व्यवस्था के बजाय अनुशासन आधारित व्यवस्था होगी। कैदी दिन में परिसर से बाहर जाकर खेती, पशुपालन, डेयरी, सिलाई-कढ़ाई, बुनाई, लघु वनोपज प्रसंस्करण, हस्तशिल्प या अन्य रोजगार कर सकेंगे। उन्हें सूर्यास्त से पहले वापस लौटकर अनिवार्य रूप से उपस्थिति दर्ज करानी होगी।
नियमों का उल्लंघन या निर्धारित समय पर वापस नहीं लौटने पर कैदी को सामान्य जेल में वापस भेजे जाने का प्रावधान रहेगा।
चयन में आचरण और पात्रता महत्वपूर्ण
खुली जेल में स्थानांतरण के लिए कैदी को पहले जेल अधीक्षक के समक्ष आवेदन करना होगा। जेल प्रशासन उसके आचरण, स्वास्थ्य और आपराधिक रिकॉर्ड की समीक्षा करेगा, जिसके बाद निर्धारित समिति की जांच और अंतिम स्वीकृति की प्रक्रिया होगी।
प्रस्तावित पात्रता में उम्र, सजा की अवधि, जेल में आचरण तथा शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य जैसे मानकों को महत्व दिया गया है। वहीं गंभीर यौन अपराध, जघन्य हत्या, UAPA, POTA, TADA, NSA, छत्तीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा अधिनियम, NDPS और जाली नोट से जुड़े मामलों में सजायाफ्ता या संबंधित श्रेणियों के बंदियों को योजना से बाहर रखने का प्रावधान बताया गया है।
पुनर्वास के साथ आत्मनिर्भरता पर जोर
खुली जेल की अवधारणा का उद्देश्य केवल कैदियों को अधिक स्वतंत्रता देना नहीं, बल्कि उन्हें जिम्मेदार नागरिक के रूप में पुनर्वासित करना है। परिवार के साथ रहने, रोजगार करने और सामाजिक वातावरण में जिम्मेदारियों का निर्वहन करने से सजा पूरी होने के बाद समाज में पुनः स्थापित होने की प्रक्रिया आसान हो सकती है।
साथ ही, कैदियों के रोजगार से आत्मनिर्भर बनने की स्थिति में जेल प्रशासन पर उनके भोजन और रखरखाव का आर्थिक भार भी कम होने की संभावना है। इस तरह यह व्यवस्था दंड के साथ सुधार और पुनर्वास को जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।