By - नरेश देवांगन
जगदलपुर, शौर्यपथ। वन विद्यालय जगदलपुर में सरकारी निर्माण के लिए मंगाए गए सीमेंट के खराब होने की खबर शौर्यपथ अख़बार ने प्रमुखता से प्रकाशित किया था। खबर सामने आने के बाद अब विभाग ने इसके रखरखाव का एक नया तरीका खोज लिया है। जानकारी सामने आई है कि शेड के नीचे रखे कुछ सीमेंट को अब वन विद्यालय परिसर के एक कमरे के अंदर रख दिया गया है। वहीं शेष सीमेंट को भी कमरे के अंदर रखने की तैयारी की बात सामने आ रही है।
*सवाल यह है कि जो सीमेंट पहले ही पत्थर जैसा जम चुका है, उसे कमरे में रखने से आखिर बचेगा क्या?*
पहले सीमेंट को नमी से बचाने के लिए सुरक्षित भंडारण नहीं किया गया और अब जब उसके खराब होने की तस्वीर सामने आई तो उसे कमरे के अंदर रखकर सुरक्षा देने की कवायद शुरू हो गई। मानो सीमेंट की हालत नहीं, सिर्फ उसका पता बदलना जरूरी हो!
*सीमेंट खराब होने के बाद कमरे की सुरक्षा या सरकारी नुकसान पर पर्दा?*
यदि सीमेंट वास्तव में उपयोग योग्य है, तो विभाग को उसका तकनीकी परीक्षण कराकर स्पष्ट करना चाहिए कि कितनी मात्रा निर्माण में इस्तेमाल करने लायक है। और यदि सीमेंट जमकर पत्थर बन चुका है, तो उसे कमरे में रखने के बजाय यह स्पष्ट होना चाहिए कि जनता के पैसे से खरीदी गई इस सामग्री के खराब होने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि पहले खुले या अपर्याप्त सुरक्षित स्थान पर रखा गया सीमेंट अब अचानक कमरे के अंदर रखने लायक कैसे हो गया? क्या यह कदम सीमेंट को बचाने के लिए है या फिर खराब हो चुकी सामग्री को नजरों से बचाने के लिए?
वन विद्यालय प्रबंधन ने पहले दावा किया था कि सीमेंट ठीक है और निर्माण कार्य जल्द शुरू होगा। अब यदि सीमेंट को कमरे में सुरक्षित रखा जा रहा है, तो विभाग को यह भी सार्वजनिक करना चाहिए कि क्या उसकी गुणवत्ता की कोई जांच हुई है और क्या उसे निर्माण में इस्तेमाल करने की अनुमति तकनीकी रूप से दी गई है?
जनता के पैसे से खरीदी गई सामग्री का हिसाब सिर्फ स्टॉक रजिस्टर में नहीं, जमीन पर भी दिखना चाहिए। पत्थर बन चुके सीमेंट को कमरे में रखने से सरकारी धन नहीं बचता—सवाल तो यह है कि वह पत्थर बना ही क्यों?
अब जरूरत कमरे बदलने की नहीं, जिम्मेदारी तय करने की है।