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निर्दलीय प्रत्याशियों का आरोप—एनओसी जमा होने के बावजूद नामांकन रद्द किया गया, निष्पक्ष जांच की मांग
सदस्यों का सवाल—पिछले कार्यकाल का लेखा-जोखा पूरा हुए बिना नए चुनाव की घोषणा क्यों?
बचेली/किरंदुल, दंतेवाड़ा। बैलाडीला ट्रक ऑनर्स एसोसिएशन (बीटीओए) के वार्षिक चुनाव 2026-27 को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। दो निर्दलीय प्रत्याशियों के नामांकन निरस्त किए जाने के बाद चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठने लगे हैं। प्रभावित प्रत्याशियों का आरोप है कि नामांकन के साथ जमा किए गए अनापत्ति प्रमाण-पत्र (एनओसी) को कथित रूप से नजरअंदाज अथवा छिपाकर उनके नामांकन निरस्त किए गए।
मामला केवल नामांकन निरस्तीकरण तक सीमित नहीं है। चुनाव प्रक्रिया के दौरान बीटीओए कार्यालय के सीसीटीवी कैमरे बंद होने तथा निगरानी फुटेज या संबंधित दस्तावेजों से कथित छेड़छाड़ के आरोप भी सामने आए हैं। दोनों निर्दलीय प्रत्याशियों ने अनुविभागीय अधिकारी को लिखित शिकायत देकर मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। इसके अलावा तहसीलदार और फम्र्स एंड सोसायटीज विभाग से भी जांच की मांग किए जाने की जानकारी सामने आई है।
सिर्फ दो नामांकन पर सवाल
सदस्यों के बीच यह सवाल भी चर्चा में है कि यदि नामांकन नियमों के तहत निरस्त किए गए हैं तो इसकी पूरी प्रक्रिया और संबंधित दस्तावेज सार्वजनिक कर स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं की जा रही? खासतौर पर यह सवाल उठ रहा है कि सिर्फ दो निर्दलीय प्रत्याशियों के नामांकन ही क्यों निरस्त किए गए?
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि यदि उनके द्वारा एनओसी सहित आवश्यक दस्तावेज जमा किए गए थे, तो उनकी जांच किस आधार पर की गई और नामांकन निरस्त करने का स्पष्ट कारण क्या था, इसे सामने लाया जाना चाहिए।
लेखा-जोखा पूरा हुए बिना चुनाव की घोषणा?
वहीं, संस्था के कुछ सदस्यों ने 2025-26 के कार्यकाल से जुड़े लेखा-जोखा और आवश्यक दस्तावेजी प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि पिछले कार्यकाल का हिसाब-किताब और संस्था से जुड़ी वैधानिक प्रक्रियाएं पूरी किए बिना 2026-27 के चुनाव की घोषणा कैसे कर दी गई?
सदस्यों का तर्क है कि नए चुनाव से पहले पिछले कार्यकाल की वित्तीय एवं प्रशासनिक स्थिति स्पष्ट होना जरूरी है, ताकि संस्था के सदस्यों के बीच पारदर्शिता बनी रहे।
सीसीटीवी जांच की मांग
सीसीटीवी को लेकर सामने आए आरोपों ने विवाद को और गंभीर बना दिया है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि यदि चुनाव प्रक्रिया के दौरान कैमरे बंद किए गए या रिकॉर्ड से छेड़छाड़ हुई है, तो इसकी तकनीकी जांच आवश्यक है। इसके लिए सीसीटीवी रिकॉर्ड, डीवीआर और संबंधित दस्तावेजों की जांच कर वास्तविक स्थिति सामने लाने की मांग की गई है।
पहले जांच या पहले मतदान?
अब पूरा विवाद इस सवाल पर केंद्रित हो गया है कि पहले शिकायतों की निष्पक्ष जांच होगी या विवादों के बीच ही मतदान कराया जाएगा?
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि यदि आरोपों और कथित अनियमितताओं की जांच किए बिना चुनाव करा दिया गया, तो चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल बने रहेंगे। वहीं, जल्दबाजी में चुनाव कराने से पिछले कार्यकाल से जुड़ी कथित अनियमितताओं की जांच प्रभावित होने की आशंका भी जताई जा रही है।
दो निर्दलीय प्रत्याशियों की शिकायत के बाद अब निगाहें प्रशासन और संबंधित विभाग की जांच तथा निर्णय पर टिकी हैं। यदि जांच होती है तो नामांकन निरस्तीकरण, एनओसी, सीसीटीवी रिकॉर्ड और चुनाव प्रक्रिया से जुड़े अन्य दस्तावेजों की स्थिति स्पष्ट होने की उम्मीद है।
जिला पंचायत कोंडागांव में मनीष पटेल की नियुक्ति पर गंभीर सवाल, बिना नए विज्ञापन के प्रतीक्षा सूची से नियुक्ति का उल्लेख
जांच प्रतिवेदन में संविदा भर्ती नियम 2012 के पालन न होने की बात, जिम्मेदारों पर एफआईआर और विभागीय कार्रवाई अब भी लंबित
कोंडागांव / शौर्यपथ / जिला पंचायत कोंडागांव में पदस्थ मनीष कुमार पटेल की नियुक्ति को लेकर सामने आए जांच प्रतिवेदन ने भर्ती प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जांच में निर्धारित संविदा भर्ती नियमों और प्रक्रियाओं का पालन नहीं किए जाने का उल्लेख होने के बावजूद अब तक एफआईआर अथवा ठोस विभागीय कार्रवाई सामने नहीं आने से प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं।
जांच प्रतिवेदन के अनुसार, जिला पंचायत कोंडागांव ने इंदिरा आवास योजना के अंतर्गत जिला स्तर पर डाटा एंट्री ऑपरेटर के एक रिक्त पद के लिए विज्ञापन क्रमांक 1057, दिनांक 4 फरवरी 2014 जारी किया था। भर्ती प्रक्रिया के बाद तैयार चयन सूची में सरित साहू का चयन हुआ, जबकि प्रतीक्षा सूची में मनीष कुमार पटेल प्रथम स्थान पर थे। चयन एवं प्रतीक्षा सूची के अनुमोदन की तारीख 23 अगस्त 2014 बताई गई है।
इसके बाद डीआरडीए योजना के अंतर्गत डाटा एंट्री ऑपरेटर का एक पद रिक्त हुआ। जांच में उल्लेख है कि वर्ष 2012 के विज्ञापन के आधार पर इस पद पर ममता देवांगन की नियुक्ति हुई थी। उन्होंने 30 अगस्त 2014 को पटवारी प्रशिक्षण के लिए त्यागपत्र दिया, जिसके बाद पद रिक्त हो गया।
बिना नए विज्ञापन के प्रतीक्षा सूची से नियुक्ति
जांच में सामने आया महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि डीआरडीए योजना के रिक्त पद पर नियुक्ति के लिए न तो नया विज्ञापन जारी किया गया और न ही विभागीय अनुमति ली गई, बल्कि इंदिरा आवास योजना की प्रतीक्षा सूची के आधार पर मनीष कुमार पटेल को नियुक्त कर दिया गया।
जांच प्रतिवेदन के अनुसार, उनकी नियुक्ति कार्यालयीन आदेश क्रमांक 8972/जि.पं. (डीआरडीए)/अधी./स्था./2014, दिनांक 16 सितंबर 2014 के माध्यम से की गई। अभिलेखों के परीक्षण के बाद जांच में यह भी उल्लेखित किया गया है कि पूरी भर्ती प्रक्रिया में संविदा भर्ती नियम 2012 के निर्धारित नियमों एवं निर्देशों का पालन नहीं किया गया।
जांच के बाद भी कार्रवाई पर सवाल
जांच प्रतिवेदन में भर्ती प्रक्रिया को लेकर अनियमितताओं का उल्लेख होने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध अब तक क्या कार्रवाई की गई? यदि जांच में नियुक्ति प्रक्रिया नियमों के अनुरूप नहीं पाई गई, तो संबंधित अधिकारियों और जिम्मेदार कर्मचारियों की भूमिका तय करने की प्रक्रिया आगे क्यों नहीं बढ़ी?
मामले में यह भी सवाल उठ रहा है कि बिना नए विज्ञापन और विभागीय अनुमति के एक अलग योजना के रिक्त पद पर दूसरी योजना की प्रतीक्षा सूची से नियुक्ति किए जाने के लिए जिम्मेदारी किसकी थी और इस संबंध में अब तक कोई ठोस विभागीय कार्रवाई क्यों नहीं हुई।
प्रशासन के अगले कदम पर निगाह
जांच प्रतिवेदन उपलब्ध होने के बावजूद कार्रवाई लंबित रहने से प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर चर्चा तेज हो गई है। अब निगाहें जिला प्रशासन पर हैं कि वह जांच में सामने आए तथ्यों के आधार पर जिम्मेदारी तय करते हुए आगे क्या कदम उठाता है।
मामले में संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका की समीक्षा, नियुक्ति प्रक्रिया की वैधानिकता तथा आवश्यक विभागीय एवं कानूनी कार्रवाई पर प्रशासन का निर्णय अब महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
एक ही परिवार से जुड़े सदस्यों को समूह में शामिल करने और बिना निविदा प्रक्रिया के आवंटन के आरोप, अनुमति व एनओसी को लेकर भी सवाल
कोंडागांव। जिला मुख्यालय में विहान समूह के अंतर्गत संचालित किए जा रहे ‘मोर स्वाद वीआईपी रेस्टोरेंट’ को लेकर अब कई सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि रेस्टोरेंट का संचालन जिस लक्ष्मी स्व सहायता समूह, पलारी को दिया गया है, उसमें एक ही परिवार से जुड़े कई सदस्य शामिल हैं। वहीं, समूह के पीछे प्रभावशाली लोगों की भूमिका होने के आरोप भी लगाए जा रहे हैं।
बताया जा रहा है कि रेस्टोरेंट को विहान समूह के अंतर्गत लक्ष्मी स्व सहायता समूह को आवंटित किया गया है। आरोप है कि समूह में जिला पंचायत में विहान के अंतर्गत पदस्थ लेखापाल लोचन देवांगन की पत्नी, उनके बड़े भाइयों की पत्नियां तथा परिवार से जुड़े अन्य सदस्य शामिल हैं। संबंधित सदस्यों के पतियों के शासकीय संस्थानों में पदस्थ होने की बात भी सामने आ रही है।
इसी को लेकर सवाल उठ रहा है कि क्या पात्रता और पारदर्शिता के सभी मापदंडों का पालन करते हुए समूह का चयन किया गया? शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि इतने महत्वपूर्ण कार्य के लिए निविदा प्रक्रिया नहीं अपनाई गई, ग्राम पंचायत के नाम समूह बनाकर सीधे शहरी छेत्र मे अलबेडा पारा वार्ड के समूह को छोड़ककर अमीर लोगो के परिवार को गरीब बता कर समूह बना कर खोला गया है, जो नियम के विरुद्ध मिलीभगत से खोला गया है।
शहरी क्षेत्र में संचालन, अनुमति को लेकर भी सवाल
मामले का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू रेस्टोरेंट के स्थान और संचालन से जुड़ा है। बताया जा रहा है कि उक्त रेस्टोरेंट शहरी क्षेत्र में संचालित हो रहा है। और खाने पीने का सामानों में अत्यधिक राशि लिया जा रहा है ऐसे में स्थानीय निकाय की अनुमति, आवश्यक एनओसी और अन्य वैधानिक औपचारिकताओं को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि रेस्टोरेंट शुरू करने से पहले संबंधित वार्ड पार्षद की अनुमति तथा नगरपालिका से आवश्यक अनापत्ति प्रमाण-पत्र लिया गया था या नहीं। इस संबंध में प्रशासन और नगरपालिका स्तर से स्थिति स्पष्ट किया जाना आवश्यक है।
महिला सशक्तिकरण योजना पर भी उठ रहे सवाल
सरकार द्वारा महिला स्व सहायता समूहों को आर्थिक रूप से मजबूत करने और उन्हें रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के लिए विभिन्न योजनाएं संचालित की जा रही हैं। ऐसे में यदि किसी एक समूह को बिना पारदर्शी प्रक्रिया के लाभ पहुंचाया गया है, तो यह योजना के मूल उद्देश्य और निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर सकता है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि समूह के सदस्यों के पारिवारिक संबंध, उनके पतियों की सरकारी सेवा में पदस्थापना और समूह को मिले कार्य की प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
जांच से साफ होगी पूरी तस्वीर
मामले में यह स्पष्ट होना बाकी है कि लक्ष्मी स्व सहायता समूह का चयन किन नियमों के तहत किया गया, चयन प्रक्रिया में कितने समूह शामिल हुए, क्या निविदा या अन्य निर्धारित प्रक्रिया अपनाई गई तथा रेस्टोरेंट संचालन के लिए नगरपालिका सहित संबंधित विभागों से आवश्यक अनुमति ली गई या नहीं।
इस सम्बन्ध मे संजय सोनपिपरे संपादक, उजाला टुडे के द्वारा जिला पंचायत बिहान को सुचना का अधिकार के तहत समूह के सदस्यों के नाम पति/ पिता का नाम पता और निविदा के जानकारी चाही गई थी किंतु जानकारी प्रदाय नहीं किया गया, पुनः प्रथम अपील जिला पंचायत कोंडागांव के अपिलीय अधिकारी को किया गया। जिसपर सुनवाई 20/07/2026 को किया गया अपिलीय अधिकारी अविनाश भोई केजानकारी प्रदाय नहीं किये जाने के कारण जिला मिशन मैनेजर विनय सिंह को तत्काल निर्देशित कर समूह कि सूची उपलब्ध कराने के निर्देश दिए जिमसे विनय सिंह द्वारा सूची मै स्वयं निकाल दिया था देने के लिए पर स्टॉफ क्यों नहीं दिए मै तत्काल समूह कि सूची दे रहा हु बोला गया। किंतु दो माह होने जा रहा है आज दिनांक तक समूह कि जानकारी नहीं दिया गया। जो पारदर्शिता मे एनिमयता दिखाई दे रही है जो जाँच का विषय है
अब मांग उठ रही है कि जिला प्रशासन पूरे मामले की जांच कर चयन प्रक्रिया, समूह की पात्रता, हितों के टकराव और आवश्यक अनुमतियों की जांच करे। जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि लगाए जा रहे आरोप कितने सही हैं और कहीं नियमों का उल्लंघन तो नहीं हुआ। अगर उलंघन हुआ है तो दोषियों पर करवाई कब किया जायेगा।
कोंडागांव, शौर्यपथ। कल पूरे देश में शिक्षक दिवस बड़े ही धूमधाम से मनाया गया और बनाया भी जाना चाहिए क्योंकि शिक्षा ही इस देश का मूल आधार है शिक्षा के बिना जग अंधेरा है पर क्या आप किसी ने सोचा की हमारी शिक्षा व्यवस्था में कुछ शिक्षक ऐसे भी हैं जो बच्चों के जीवन के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं, जिनको उस कुर्सी में बैठने के लिए और बच्चों की जीवन को बचाने व सुरक्षित करने के लिए सरकार उनके ऊपर 100000 ₹150000 का खर्चा कर रही है पर वो सोचते हैं पर जब बच्चों की को शिक्षा व्यवस्था से जोड़ने और उन्हें न्याय दिलाने की बात आती है तब ये अपना दरवाज़ा बंद कर लेते है। कभी बहाना करते हैं कि सीट फुल हो गया, तो कभी बहाना करते हैं कि आपका यह कागज नहीं है। वो ऐसा ही मामला ग्राम कोरोबेड़ा का है। यहां के बच्चो के सिर्फ माँ बाप नहीं होने का सजा इन्हें मिल रहा है और ये सजा, ये अपनी किस्मत से नहीं भोग रहे है हमारे शिक्षकों की वजह से भोग रहे हैं, कभी उन बच्चों को आधार कार्ड के कारण स्कूल से निकाल दिया गया जब आधार कार्ड बन गया तो जिला कलेक्टर के आदेश को नजरअंदाज करते हुए उन बच्चों को फिर से गाँव भेज दिया गया। गाँव के हॉस्टल में जब जाकर वह बोले कि इन्हें यहां रख के ही पढ़ाना है तो वहां के टीचर बोले कि हमारे पास सीट फूल हो गया है। आप अपने घर से पैदल आ जाओ, जो कि उनका घर 4 km दूर है टीचर को यह शब्द बोलने से पहले ये सोचना चाहिए कि यह सिर्फ दूर नहीं बीच में जंगल है, नदी है, नाले हैं। और बच्चों की उम्र मात्र 5 -6 साल है, यह घटना न सिर्फ शिक्षा व्यवस्था पर आवाज़ उठाती है। ये घटना यह भी बताती है कि बिना माँ बाप के बच्चों का जीना इस समाज में इस देश में कितना मुश्किल है जहां इन्हें हर कदम पर यह एहसास दिलाया जाता है कि तुम्हारे लिए कोई नहीं है तुम अकेले हो यही दुनिया का सबसे बड़ा हकीकत है कि जहां पूरे समाज को पूरे प्रशासन को इनका परिवार बनके इनके लिए काम करना था वह इन्हें गली गली भटकने पर मजबूर कर दिया गया।
जिला कलक्टर ने कोशिश भी किया। आदेश भी किया पर जो जवाबदार अधिकारी है, उन्हें कोई मतलब नहीं सिर्फ उनके बच्चे अच्छे स्कूलों में प्राइवेट स्कूलों में पढ़ लें, डॉ इंजीनियर कमिश्नर बन जाए।हमें गरीबों के बच्चों से क्या लेना है?इन्हें मानसिकता के साथ आज पुरा सिस्टम कार्य कर रहा है, यह मात्र सिर्फ दो बच्चों की कहानी नहीं है।यह उन तमाम जरूरतमंद, यह तमाम अनाथ तमाम गरीब और गरीबी से जूझ रहे उन बच्चों की कहानी है जो पढ़ना तो चाहते हैं, पर उन्हें मजबूर किया जाता है कि तुम्हारे लिए शिक्षा नहीं बनी है।और यही बच्चे जब शिक्षा से वंचित रह जाते हैं कोई गलत काम करते हैं नशा करते हैं या किसी और घटना को अंजाम दे देते हैं। तो यही प्रशासन अपने लाखों और करोड़ों की बिल्डिंग में बैठकर तक चर्चा करते हैं। ये हमारे क्षेत्र का हमारे जिले का लॉयन ऑर्डर कैसे बिगड़ रहा है कौन है यह है ये गुंडा कौन है यह नशेड़ी है, और उठाकर उसे जेल भेज दिया जाता है पर क्या उसकी आपबीती जानने का या उसे पहचानने का या किस कारण से आज उसका यह हालत हुई है इसके ऊपर कभी किसी ने सोचा है किसी ने चर्चा किया है इसका कारण भी यही समाज है यही प्रशासन है जब वो न समझ था तो स्कूल स्कूल घूम रहा था कि मुझे कोई पढ़ा लो उस समय कोई पढ़ाने वाला नही था और ना ही कोई सहारा देने वाला था हमें उन चीजों में भी विचार करना और सोचने की उतनी ही जरूरी है की हम प्रशासन के सबसे बड़े पद और प्रतिष्ठा में बैठकर। हमने उन नौजवान, वो अनाथ, उन गरीब जरूरतमंद बच्चों के लिए क्या किया है। कि आज वो बर्बादी के सबसे ऊंचे पायदान पर पहुंच गये। वो नहीं पहुंचे, उन्हें हमारे सिस्टम ने हमारे समाज भी उतना ही जिम्मेदार है जितना उस बच्चे की मजबूरी जिम्मेदार थी ये हम सभी के लिए प्रश्नवाचक चिन्ह है।क्या हमने अपने समाज के लिए अपने बच्चों के लिए क्या किया है?
दंतेवाड़ा की शिक्षा व्यवस्था का ‘जमीनी रिपोर्ट कार्ड’: बच्चों ने गुलदस्ता देकर किया स्वागत, प्रार्थना में नंगे पैर खड़े रहे; विभाग बोला—‘जूते मंगाए हैं, जल्द मिलेंगे’
शौर्यपथ संवाददाता कृष्णा मंडल
दंतेवाड़ा / तस्वीर कभी-कभी वह सच बोल देती है, जिसे फाइलों में दर्ज आंकड़े और सरकारी दावे भी नहीं बता पाते। दंतेवाड़ा में शिक्षा मंत्री के स्कूल-आश्रम निरीक्षण के दौरान सामने आई एक तस्वीर ने जिले की शिक्षा व्यवस्था के दावों पर ही सवाल खड़े कर दिए। मंत्री के स्वागत में बच्चों के हाथों में छिंद से बने खूबसूरत गुलदस्ते थे, चेहरे पर मुस्कान थी, लेकिन कई बच्चों के पैरों में जूते नहीं थे।
प्रार्थना सभा में मंत्री बच्चों के साथ खड़े होकर उनकी मधुर आवाज सुनते रहे। बच्चे अनुशासन के साथ प्रार्थना करते रहे, लेकिन नीचे नजर गई तो किसी के पैर खाली थे तो कोई हवाई चप्पल में खड़ा था। दूसरी ओर, शिक्षा विभाग के अधिकारी पूरी वर्दी और चमचमाते जूतों में मंत्री को जिले की शिक्षा व्यवस्था का हाल बताते नजर आए।
यही दृश्य अब एक बड़ा सवाल बनकर खड़ा है—क्या दंतेवाड़ा में शिक्षा व्यवस्था की चमक बच्चों के चेहरों तक पहुंचने से पहले ही अफसरों के जूतों में सिमट गई?
बच्चों ने दिया गुलदस्ता, बदले में कब मिलेगा पूरा हक?
मंत्री के स्वागत के लिए बच्चों ने पूरी तैयारी की। हाथों में गुलदस्ते लेकर उन्होंने अतिथि का अभिनंदन किया। प्रार्थना सभा में भी उत्साह के साथ शामिल हुए। लेकिन सवाल यह है कि जिन बच्चों से व्यवस्था अनुशासन, उपस्थिति और बेहतर परिणाम की उम्मीद करती है, क्या उनकी बुनियादी जरूरतों की जिम्मेदारी भी उसी व्यवस्था की नहीं है?
बच्चों के हाथ में स्वागत का गुलदस्ता था, मगर पैरों में जूते नहीं। यह विरोधाभास सरकारी शिक्षा व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़ा करता है।
DMF-CSR के करोड़ों के बीच बच्चों के पैरों में चप्पल क्यों?
दंतेवाड़ा को DMF और CSR मद से मिलने वाले बड़े संसाधनों वाले जिलों में गिना जाता है। शिक्षा और आदिवासी क्षेत्रों के विकास के लिए बड़े पैमाने पर योजनाएं और बजट होने के बावजूद यदि स्कूल के बच्चों को अभी तक पूरी यूनिफॉर्म और जूते नहीं मिल पाए हैं, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
आखिर बजट की फाइलों से जूते निकलकर बच्चों के पैरों तक पहुंचने में इतना समय क्यों लग रहा है?
अगर स्कूल की प्रार्थना सभा में ही बच्चे नंगे पैर खड़े दिखाई दें, तो शिक्षा व्यवस्था की समीक्षा सिर्फ आंकड़ों से नहीं, बच्चों के पैरों से भी करनी पड़ेगी।
शिक्षा अधिकारी बोले—‘जूते मंगाए गए हैं, जल्द मिलेंगे’
मामले को लेकर जब हमारी टीम ने दंतेवाड़ा के जिला शिक्षा अधिकारी प्रमोद ठाकुर से फोन पर जानकारी ली, तो उन्होंने बताया कि जूते मंगाए गए हैं और जल्द उपलब्ध करा दिए जाएंगे।
हालांकि, शिक्षा सत्र शुरू हुए कई महीने गुजर चुके हैं और यदि अब तक विद्यार्थियों को यूनिफॉर्म का पूरा सेट उपलब्ध नहीं हो पाया है, तो विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठना लाजिमी है।
खास बात यह है कि शिक्षा मंत्री करीब दो-तीन माह पहले सार्वजनिक मंच से यह दावा कर चुके हैं कि छत्तीसगढ़ के इतिहास में पहली बार बच्चों को यूनिफॉर्म और पाठ्य सामग्री उपलब्ध करा दी गई है। ऐसे में अलग-अलग स्थानों से पाठ्य सामग्री और अब यूनिफॉर्म के पूरे सेट उपलब्ध नहीं होने की जानकारी सामने आना सरकारी दावे और जमीनी स्थिति के बीच अंतर की ओर इशारा करता है।
मंत्री ने बच्चों की आवाज सुनी, अब पैरों की खामोशी भी सुनेंगे?
मंत्री ने बच्चों के साथ प्रार्थना की। बच्चों की मधुर आवाज सुनी और उनके उत्साह को करीब से देखा। लेकिन इस दौरान बच्चों के नंगे पैर भी शायद किसी सवाल की तरह सामने खड़े थे।
अब सवाल यह है कि क्या मंत्री और शिक्षा विभाग के अधिकारी इस खामोश सवाल को भी सुनेंगे?
क्योंकि बच्चे शिकायत नहीं कर रहे थे।
वे बस नंगे पैर प्रार्थना में खड़े थे।
100 प्रतिशत उपस्थिति, लेकिन 100 प्रतिशत सुविधा कब?
बच्चे तमाम परिस्थितियों के बावजूद स्कूल पहुंच रहे हैं। उनकी नियमित उपस्थिति, अनुशासन और पढ़ाई के प्रति लगन निश्चित रूप से सराहनीय है। मगर सरकार से सवाल है कि क्या बच्चों को सिर्फ स्कूल तक पहुंचा देना ही जिम्मेदारी है?
उनके पैरों में जूते, शरीर पर पूरी यूनिफॉर्म, हाथों में पाठ्य सामग्री और पढ़ाई के लिए जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराना भी तो व्यवस्था का दायित्व है।
दंतेवाड़ा का ‘जमीनी रिपोर्ट कार्ड’ आखिर क्या कह रहा है?
सरकार आदिवासी अंचलों में शिक्षा की तस्वीर बदलने, बच्चों को बेहतर सुविधाएं देने और शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने की बात करती है। दूसरी तरफ मंत्री के सामने ही बच्चों का नंगे पैर खड़ा होना इस दावे की जमीनी तस्वीर पर सवाल खड़ा कर रहा है।
फाइलों में यूनिफॉर्म पूरी हो सकती है, लेकिन बच्चों के शरीर पर भी पूरी है या नहीं—इसका जवाब तस्वीर दे रही है।
और तस्वीरों को किसी प्रेस नोट की जरूरत नहीं होती।
सवाल सिर्फ जूतों का नहीं... व्यवस्था की प्राथमिकता का है
मंत्री के स्वागत में बच्चों ने गुलदस्ता दिया। उन्होंने पूरे अनुशासन से प्रार्थना की और अपनी जिम्मेदारी निभाई। अब बारी व्यवस्था की है।
सवाल सिर्फ इतना नहीं कि बच्चों को जूते कब मिलेंगे। सवाल यह है कि जिस व्यवस्था के पास DMF-CSR जैसे संसाधन हैं, वहां बच्चों की इतनी छोटी-सी बुनियादी जरूरत पूरी करने में महीनों क्यों लग जाते हैं?
मंत्री और अधिकारी महंगे जूतों में खड़े होकर शिक्षा व्यवस्था की तस्वीर समझाते रहें और बच्चे नंगे पैर भविष्य की प्रार्थना करते रहें—यह तस्वीर दंतेवाड़ा की शिक्षा व्यवस्था के लिए प्रशंसा से ज्यादा आत्ममंथन का विषय है।
अब देखना होगा कि यह तस्वीर सिर्फ एक निरीक्षण की तस्वीर बनकर रह जाती है या फिर दंतेवाड़ा के बच्चों के पैरों में जूते और उनके हाथों में बेहतर भविष्य पहुंचाने की शुरुआत बनती है।
सुकमा, शौर्यपथ। जिले के कोंटा ब्लॉक में जगदलपुर की टीम एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) ने बड़ी कार्रवाई करते हुए ब्लॉक शिक्षा अधिकारी को 10 हजार रुपये की रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार किया है। कार्रवाई के बाद शिक्षा विभाग में हड़कंप मच गया है।
जानकारी के अनुसार, कोंटा विकासखंड शिक्षा कार्यालय में पदस्थ खंड शिक्षा अधिकारी चंद्र कुमार यारदा पर एक महिला कर्मचारी से एरियर्स की राशि निकलवाने के एवज में रिश्वत मांगने का आरोप है। महिला कर्मचारी ने इसकी शिकायत जगदलपुर की टीम एंटी करप्शन ब्यूरो से की थी।
शिकायत के सत्यापन के बाद जगदलपुर की ACB की टीम ने योजना के तहत कार्रवाई की। बताया जा रहा है कि जैसे ही महिला कर्मचारी ने अधिकारी को 10 हजार रुपये की रिश्वत दी, मौके पर पहुंची ACB की टीम ने चंद्र कुमार यारदा को रिश्वत की रकम के साथ रंगे हाथों गिरफ्तार कर लिया।
ACB की टीम द्वारा आरोपी अधिकारी के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जा रही है। इस कार्रवाई के बाद सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार को लेकर एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं।
दंतेवाड़ा के दूरस्थ छिंदनार में पहली बार पूरे गांव ने सुनी प्रधानमंत्री की ‘मन की बात’; मंत्री, सांसद और विधायक भी रहे मौजूद
दंतेवाड़ा/ शौर्यपथ / नक्सलवाद के साए से बाहर निकलते बस्तर की बदलती तस्वीर रविवार को दंतेवाड़ा के सुदूर वनांचल छिंदनार में नजर आई। कुछ समय पहले तक जहां धमाकों की आवाज लोगों में दहशत पैदा करती थी, वहीं आज उसी गांव में ग्रामीण उत्साह के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘मन की बात’ सुनने के लिए एकत्र हुए। गांव के कई लोगों के लिए यह पहला अवसर था, जब उन्होंने प्रधानमंत्री को रेडियो पर सुना।
ग्रामीणों के साथ वन एवं पर्यावरण मंत्री केदार कश्यप, बस्तर सांसद महेश कश्यप और दंतेवाड़ा विधायक चैतराम अटामी ने भी कार्यक्रम सुना। प्रधानमंत्री के संदेश को ग्रामीणों ने बेहद तल्लीनता से सुना और इसे देश को एक सूत्र में जोड़ने वाला कार्यक्रम बताया। ग्रामीणों का कहना था कि ‘मन की बात’ देश के विभिन्न हिस्सों में हो रहे सकारात्मक कार्यों, नवाचारों और जनभागीदारी की पहल को सामने लाकर लोगों को प्रेरित करती है।
बदलते बस्तर की नई तस्वीर
छिंदनार में ग्रामीणों का इस तरह एकत्र होकर प्रधानमंत्री का कार्यक्रम सुनना केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि बस्तर में बदलते माहौल का प्रतीक माना जा रहा है। नक्सल हिंसा से प्रभावित रहे क्षेत्रों में अब सरकार सड़क, मोबाइल कनेक्टिविटी, स्कूल, अस्पताल और अन्य बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करने पर जोर दे रही है।
दशकों तक विकास से दूर रहे दुर्गम गांवों तक शासन की योजनाएं और नागरिक सुविधाएं पहुंचाने के प्रयास तेज किए गए हैं। ऐसे में छिंदनार की तस्वीर यह संदेश देती नजर आई कि जहां कभी बंदूक और धमाकों का भय था, वहां अब विकास, संवाद और रेडियो की आवाज सुनाई दे रही है।
धमाकों से ‘मन की बात’ तक का यह सफर बदलते बस्तर की सबसे बड़ी कहानी है।
प्रशिक्षु डीएसपी के गनमैन विजय जेना ने घर में उठाया खौफनाक कदम, कंधे को छूते हुए निकल गई गोली; महारानी अस्पताल में उपचार जारी
नरेश देवांगन की खास रिपोर्ट
जगदलपुर / शौर्यपथ / शहर के पथरागुड़ा इलाके में सोमवार दोपहर उस समय हड़कंप मच गया, जब प्रशिक्षु डीएसपी के गनमैन के रूप में तैनात आरक्षक विजय जेना (30 वर्ष) ने अपने ही घर में अपनी सर्विस INSAS रायफल से खुद को गोली मार ली। गोली कंधे को छूते हुए बाहर निकल गई, जिससे आरक्षक गंभीर रूप से घायल हो गया। घटना की सूचना मिलते ही पुलिस महकमे में खलबली मच गई और कोतवाली थाना प्रभारी सहित पुलिस के अधिकारी एवं अन्य स्टाफ तत्काल मौके पर पहुंचे। घायल आरक्षक को तत्काल उपचार के लिए महारानी अस्पताल ले जाया गया, जहां उसका उपचार जारी है। अधिकारियों के अनुसार फिलहाल उसकी हालत खतरे से बाहर बताई जा रही है।
कई दिनों से पारिवारिक विवाद को लेकर था परेशान
प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक आरक्षक विजय जेना पिछले कुछ दिनों से अपने घर में चल रहे पारिवारिक विवाद को लेकर मानसिक रूप से परेशान था। बताया जा रहा है कि उसने अपने विभाग के कुछ कर्मचारियों को भी इस पारिवारिक तनाव की जानकारी दी थी। सोमवार को घर में एक बार फिर विवाद हुआ, जिसके बाद विजय कथित तौर पर इस कदर टूट गया कि उसने अपने पास मौजूद सर्विस रायफल से स्वयं को गोली मार ली।
बताया गया कि विजय जेना प्रशिक्षु डीएसपी सुमित चंद्रा के गनमैन के रूप में तैनात है। ड्यूटी से संबंधित सर्विस रायफल उसके पास थी। घटना के समय वह अपने घर में मौजूद था।
कंधे पर रायफल टिकाकर चलाई गोली
पुलिस अधिकारियों के अनुसार प्रथम दृष्टया सामने आया है कि विजय जेना ने अपनी रायफल को कंधे की ओर टिकाकर गोली चलाई। गोली कंधे को छूते हुए बाहर निकल गई। गोली चलने की आवाज सुनकर परिवार के सदस्यों और आसपास के लोगों को घटना की जानकारी हुई। इसके बाद घायल विजय को तत्काल अस्पताल पहुंचाया गया।
घटना की जानकारी मिलते ही पुलिस विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी मामले को गंभीरता से लेते हुए अस्पताल पहुंचकर स्थिति की जानकारी ली। आला अधिकारियों की टीम महारानी अस्पताल में मौजूद है और चिकित्सकों से लगातार घायल आरक्षक के स्वास्थ्य की जानकारी ले रही है।
पुलिस ने शुरू की मामले की जांच
अधिकारियों ने प्रारंभिक तौर पर घटना के पीछे पारिवारिक विवाद को कारण बताया है। हालांकि पुलिस द्वारा घटना के सभी पहलुओं की जांच की जा रही है। सर्विस रायफल से गोली चलने की परिस्थितियों और घटना से जुड़े अन्य तथ्यों की भी जांच की जा रही है।
फिलहाल विजय जेना का महारानी अस्पताल में उपचार जारी है और चिकित्सकों की निगरानी में उसकी स्थिति बताई जा रही है। पुलिस महकमा भी लगातार उसके स्वास्थ्य पर नजर बनाए हुए है।
स्वतंत्रता दिवस पर शहीदों के स्मारक पर तिरंगा नहीं फहरने से उठे सवाल, प्रशासन की चुप्पी पर भी सवालिया निशान
नरेश देवांगन की खास रिपोर्ट
जगदलपुर, शौर्यपथ। स्वतंत्रता दिवस… वह दिन जब पूरा देश तिरंगे के रंग में रंग जाता है। जब आसमान में लहराता राष्ट्रध्वज हमें उन अनगिनत बलिदानों की याद दिलाता है, जिनकी वजह से आज हम आजाद हवा में सांस ले रहे हैं। लेकिन जगदलपुर के लालबाग में शनिवार को एक ऐसा दृश्य भी सामने आया, जिसने कई संवेदनशील नागरिकों को सवालों के बीच खड़ा कर दिया।
लालबाग मैदान में उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा ने पूरे सम्मान के साथ राष्ट्रीय ध्वज फहराया। देशभक्ति के नारों और तिरंगे की शान के बीच स्वतंत्रता दिवस का मुख्य आयोजन हुआ। लेकिन इसी लालबाग मैदान से महज कुछ कदम की दूरी पर स्थित झीरम घाटी शहीद स्मारक में तिरंगा नजर नहीं आने की स्थिति सामने आई।
वह स्मारक… जहां पत्थरों पर केवल नाम नहीं लिखे हैं, बल्कि उन परिवारों की अधूरी कहानियों की स्मृतियां जुड़ी हैं, जिनके अपने 25 मई 2013 को झीरम की धरती पर हुए नक्सली हमले में जान गंवा बैठे।
किसी मां ने अपना बेटा खोया था…
किसी पत्नी ने अपना सुहाग…
किसी बच्चे ने अपने पिता…
और देश ने लोकतंत्र के प्रहरी।
झीरम की वह शाम आज भी बस्तर के इतिहास के सबसे दर्दनाक अध्यायों में गिनी जाती है। गोलियों की आवाज में कई सपने हमेशा के लिए खामोश हो गए। कई घरों के चिराग बुझ गए। लेकिन उनकी शहादत ने लोकतंत्र की लौ को बुझने नहीं दिया।
इसी बलिदान को चिरस्थायी बनाने और आने वाली पीढ़ियों को लोकतंत्र तथा देशप्रेम का संदेश देने के उद्देश्य से लालबाग में झीरम घाटी शहीद स्मारक बनाया गया। परिसर में विशाल राष्ट्रीय ध्वज भी स्थापित किया गया है।
स्मारक परिसर में लगे बोर्ड पर उल्लेख है कि इन शहीदों ने लोकतंत्र की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी और उनका बलिदान आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनेगा।
फिर सवाल उठता है—
जिस दिन पूरा देश तिरंगे को सलाम कर रहा था, उसी दिन झीरम के शहीदों की याद में बने स्मारक पर तिरंगा क्यों नहीं लहराया गया?
क्या यह महज प्रशासनिक चूक थी? क्या कार्यक्रम की तैयारियों में यह स्मारक शामिल नहीं हो सका? क्या संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों का ध्यान इस ओर नहीं गया? या फिर इसके पीछे कोई अन्य प्रशासनिक कारण रहा?
इन सवालों का जवाब संबंधित प्रशासन ही स्पष्ट कर सकता है। बिना आधिकारिक स्पष्टीकरण के किसी राजनीतिक मंशा या जानबूझकर की गई कार्रवाई का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। मगर सवाल उठना इसलिए जरूरी है, क्योंकि शहादत का सम्मान किसी दल, विचारधारा या राजनीति की सीमा में नहीं बंधना चाहिए।
झीरम में जान गंवाने वालों में जनप्रतिनिधि, आम नागरिक और सुरक्षा में तैनात जवान भी शामिल थे। उनके खून का रंग एक था… उनकी अंतिम पहचान एक थी—भारतीय। उनकी शहादत पर राजनीति नहीं होनी चाहिए।
तिरंगा भी किसी पार्टी का नहीं है। वह उस मां का है, जिसने अपना बेटा देश के लिए खोया। वह उस पत्नी का है, जिसने अपने जीवनसाथी को खो दिया। वह उस बच्चे का है, जिसने अपने पिता को तस्वीरों में ही देखा। और वह उन शहीदों का है, जिन्होंने लोकतंत्र की रक्षा के लिए अपनी जिंदगी कुर्बान कर दी।
लालबाग मैदान में तिरंगा शान से लहरा रहा था। हवा में राष्ट्रगान की गूंज थी। लोगों के चेहरों पर देशभक्ति थी। लेकिन कुछ ही कदम दूर… झीरम के शहीद स्मारक पर तिरंगा नजर नहीं आया। झीरम के शहीदों का स्मारक मौन था।
शायद वह मौन ही सबसे बड़ा सवाल पूछ रहा था—
“क्या हमें आज याद नहीं किया जाना था?”
“क्या हमारी शहादत इतनी जल्दी भुला दी गई?”
“जिस लोकतंत्र के लिए हमने अपनी जान दी, क्या उसी लोकतंत्र के राष्ट्रीय पर्व पर हमारे स्मारक पर तिरंगे के लिए भी जगह नहीं थी?”
ये सवाल किसी व्यक्ति या राजनीतिक दल पर आरोप नहीं हैं। ये उस संवेदनशील भावना से जुड़े सवाल हैं, जो शहीदों के सम्मान को लेकर समाज के मन में उठना स्वाभाविक है।
इन सवालों का कोई राजनीतिक जवाब नहीं होना चाहिए। इनका जवाब संवेदना और जिम्मेदारी के साथ दिया जाना चाहिए।
स्वतंत्रता दिवस हर भारतीय का पर्व है और शहीद हर भारतीय की विरासत।
जनता की भावुक अपील— अगली बार जब 15 अगस्त आए और लालबाग मैदान में तिरंगा शान से लहराए, तो उसकी एक झलक झीरम के शहीद स्मारक तक भी पहुंचे। जिस धरती ने लोकतंत्र की रक्षा के लिए अपने बेटे खोए हैं, वहां राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान भी उसी गरिमा के साथ होना चाहिए। शहीदों के परिवारों के जख्म शायद कभी नहीं भरेंगे, लेकिन तिरंगे की छांव उन्हें यह एहसास जरूर करा सकती है कि देश अपने शहीदों को भूला नहीं है।
क्योंकि शहीदों की तस्वीरों पर भले वक्त की धूल जम जाए, लेकिन उनकी शहादत पर देश की याद कभी धुंधली नहीं होनी चाहिए।क्योंकि शहीद किसी दल के नहीं होते… शहीद सिर्फ देश के होते हैं। और शायद यही झीरम के शहीदों को स्वतंत्रता दिवस पर दी जा सकने वाली सबसे सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
