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By- नरेश देवांगन
जगदलपुर, शौर्यपथ। बस्तर जिले में अवैध खनिज उत्खनन और परिवहन पर लगाम कसने के लिए खनिज विभाग द्वारा लगातार सख्त और प्रभावी कार्रवाई की जा रही है। संचालक खनिज एवं बस्तर कलेक्टर के निर्देश पर चलाए जा रहे विशेष अभियान के तहत जिला खनिज जांच उड़नदस्ता दल ने विभिन्न क्षेत्रों में औचक निरीक्षण कर अवैध कारोबारियों पर बड़ी कार्रवाई करते हुए 36 वाहनों को जब्त किया है।
खनिज विभाग की इस सक्रियता को जिले में प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा और राजस्व संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। विभागीय टीम ने उपनपाल, देवड़ा, कोडेनार, बड़ेआमाबाल, कोरपाल, बेलगांव, धरमपुरा, जगदलपुर, कुम्हरावंड, पिपलावंड, बजावंड, बडांजी, तारापुर और बनियागांव सहित कई क्षेत्रों में लगातार निरीक्षण किया। जांच के दौरान अवैध रूप से रेत एवं चुना पत्थर का उत्खनन, परिवहन और भंडारण करते पाए जाने पर संबंधित लोगों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की गई।
कार्रवाई के दौरान जब्त किए गए सभी वाहनों को पुलिस अभिरक्षा में सौंप दिया गया है, वहीं चार भंडारणकर्ताओं के खिलाफ भी प्रकरण दर्ज कर आगे की कार्रवाई की जा रही है। खनिज विभाग ने स्पष्ट किया है कि अवैध खनिज गतिविधियों में संलिप्त लोगों के खिलाफ छत्तीसगढ़ गौण खनिज नियमावली 2015 एवं खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम 1967 के तहत कठोर दंडात्मक कार्रवाई जारी रहेगी।
खनिज विभाग की इस मुहिम से अवैध खनिज कारोबारियों में हड़कंप मचा हुआ है, वहीं आम लोगों में प्रशासन की सक्रियता को लेकर सकारात्मक संदेश गया है। विभागीय अधिकारियों की सतर्कता और मैदान स्तर पर लगातार निगरानी से यह साफ संकेत मिला है कि प्राकृतिक संसाधनों की लूट अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
इस अभियान में खनि अधिकारी शिखर चेरपा, सहायक खनि अधिकारी जागृत गायकवाड, खनि निरीक्षक अंकित पुरी, अनि सिपाही डिकेश्वर खरे, नगर सैनिक विजय कश्यप, कृष्णा बघेल एवं सहदेव बघेल सहित जिला खनिज जांच उड़नदस्ता दल के सदस्यों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
कोंडागांव, शौर्यपथ। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद कोंडागांव जिला 2012 से जिला घोषित हो गया था जिसके बाद से अब तक जिले में सभी जिलेवासियों को शासन की सभी योजनाओं को पूरा किया जा रहा है । मगर एक तरफ ध्यान दिया जाए तो एक बड़ी बात सामने आती है देश एक कठनाई से गुजर रहा है जहाँ पेट्रोल व डीजल की किल्लत देखा जा रहा है।
वही अगर बात करे कोंडागांव की तो
न्यायालय कैदियों को जगदलपुर या नारायणपुर जेल भेजती है जो कोंडागांव मुख्यालय से 60 से 50 किलोमीटर दूर पड़ता है जहाँ रोजना कैदियों को लाने में मशक्कत की जाती है अगर कोंडागांव जिला मुख्यालय में भी एक जेल या उप जेल बन जाए तो पुलिस को राहत मिलेगी।
समस्या क्या है?
कोंडागांव को 2012 में जिला घोषित किया गया था
इसके बावजूद यहां अभी तक जिला जेल/उप-जेल नहीं है
कोर्ट (न्यायालय) से कैदियों को जगदलपुर या नारायणपुर भेजा जाता है
यह दूरी लगभग 50–60 किलोमीटर है
इससे क्या दिक्कतें हो रही हैं?
पुलिस को रोज कैदियों को ले जाने में अधिक मेहनत और संसाधन खर्च
पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों के बीच आर्थिक बोझ
सुरक्षा जोखिम भी बढ़ता है (लंबी दूरी पर ट्रांजिट)
कैदियों और उनके परिजनों को असुविधा
अब देखने वाली बात होगी कि शौर्यपथ की इस खबर से जिला प्रशासन व शासन क्या कदम उठाएगी।
सुकमा , /सुकमा जिले के कोंटा विकासखंड स्थित ग्राम पंचायत एर्राबोर में आयोजित ‘सुशासन तिहार’ शिविर ग्रामीणों के लिए राहत और खुशियों का केंद्र बन गया। कलेक्टर श्री अमित कुमार के मार्गदर्शन में आयोजित इस शिविर में बड़ी संख्या में ग्रामीण शामिल हुए और विभिन्न शासकीय योजनाओं का लाभ प्राप्त किया।
शिविर का उद्देश्य शासन की योजनाओं और सेवाओं को सीधे ग्रामीणों तक पहुंचाना था। प्रशासनिक अधिकारियों ने मौके पर उपस्थित रहकर लोगों की समस्याएं सुनीं और त्वरित समाधान की प्रक्रिया शुरू की।
शिविर में विद्यार्थियों को जाति प्रमाण पत्र वितरित किए गए। वहीं गर्भवती महिलाओं की गोद भराई और 6 माह के बच्चों का अन्नप्राशन कार्यक्रम भी आयोजित किया गया। इससे कार्यक्रम में सामाजिक और मानवीय जुड़ाव का वातावरण देखने को मिला।
ग्रामीणों की सुविधा के लिए शिविर में राशन कार्ड ई-केवाईसी, महतारी वंदन योजना ई-केवाईसी, नया आधार कार्ड पंजीयन एवं अपडेट, बी-1 और किसान किताब वितरण तथा एग्री स्टेक पंजीयन जैसी जरूरी सेवाएं भी मौके पर उपलब्ध कराई गईं।
शिविर के दौरान विभिन्न विभागों को कुल 250 आवेदन प्राप्त हुए। इनमें पंचायत विभाग के 165, कृषि विभाग के 22, विद्युत विभाग के 14 तथा राजस्व और लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के 11-11 आवेदन शामिल रहे। सभी आवेदनों पर त्वरित कार्रवाई की जा रही है।
कार्यक्रम में स्थानीय सरपंच श्रीमती लक्ष्मी कट्टम, पूर्व सरपंच, पंचगण, जनप्रतिनिधि, अधिकारी और बड़ी संख्या में ग्रामीण उपस्थित रहे। सुशासन तिहार के माध्यम से प्रशासन और ग्रामीणों के बीच विश्वास और सहभागिता को नई मजबूती मिली है।
कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी अमित शुक्ला के निधन से शोक की लहर
बस्तर सहित पूरे पुलिस महकमे के लिए अत्यंत दुःखद समाचार सामने आया है।
बस्तर के विभिन्न थानों में अपनी सेवाएं देने वाले पुलिस अधिकारी श्री अमित शुक्ला का असमय निधन हो गया। उनके निधन की खबर से पुलिस विभाग, सहयोगियों और क्षेत्रीय नागरिकों में गहरा शोक व्याप्त है।
श्री अमित शुक्ला अपने शांत स्वभाव, कर्तव्यनिष्ठ कार्यशैली और जनता के प्रति संवेदनशील व्यवहार के लिए जाने जाते थे। बस्तर जैसे संवेदनशील क्षेत्र में उन्होंने कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए पुलिस विभाग में अपनी अलग पहचान बनाई थी।
उनकी कार्यशैली में अनुशासन के साथ मानवीय संवेदनाएं भी स्पष्ट दिखाई देती थीं, यही कारण रहा कि वे अपने साथियों और आम नागरिकों के बीच सम्मानित अधिकारी के रूप में पहचाने जाते थे।
उनका असमय निधन केवल एक अधिकारी की विदाई नहीं, बल्कि पुलिस महकमे के लिए ऐसी क्षति है जिसकी भरपाई लंबे समय तक संभव नहीं होगी।
विभाग के अनेक अधिकारियों और कर्मचारियों ने उनके निधन पर गहरा दुःख व्यक्त करते हुए इसे व्यक्तिगत क्षति बताया है।
शोक संदेशों का सिलसिला लगातार जारी है।
सहकर्मियों का कहना है कि अमित शुक्ला ने अपने सेवा काल में कठिन परिस्थितियों के बीच भी कर्तव्य को सर्वोपरि रखा और सदैव ईमानदारी एवं समर्पण के साथ अपनी जिम्मेदारियां निभाईं।
ईश्वर से प्रार्थना है कि दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें तथा शोकाकुल परिवार को यह असीम दुःख सहने की शक्ति प्रदान करें।
ॐ शांति ?
कोंडागांव /
मदर्स डे के पावन अवसर पर शांति फाउंडेशन में आयोजित एक भावनात्मक सम्मान समारोह ने मानवता, सेवा और मातृत्व के प्रति सम्मान का अनूठा संदेश दिया। इस विशेष अवसर पर उन माताओं का सम्मान किया गया, जिन्हें कभी सड़क से रेस्क्यू कर शांति फाउंडेशन के पुनर्वास केंद्र में लाया गया था और आज उपचार, देखभाल एवं अपनत्व के सहारे उन्हें नई जिंदगी मिली है।
कार्यक्रम में शांति फाउंडेशन के संचालक यतेंद्र “छोटू” सलाम एवं फाउंडेशन की नींव रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले तुषार जी विशेष रूप से उपस्थित रहे। दोनों ने माताओं के साथ समय बिताया और उन्हें सम्मानित कर मदर्स डे की शुभकामनाएं दीं।
कार्यक्रम के दौरान सभी माताओं के साथ केक काटा गया। पूरा परिसर खुशी, आत्मीयता और सम्मान के भाव से सराबोर दिखाई दिया। माताओं के चेहरों पर मुस्कान और आंखों में छलकती भावनाएं वहां मौजूद हर व्यक्ति को भावुक कर रही थीं।
इस आयोजन को सफल बनाने में मोनी, मदन कुमारी, आशा खान, फूल कुंवर साहू, बिंद्राबाई, सरला, दशा बाई, कांतम, केशवम सहित शांति फाउंडेशन के समस्त स्टाफ एवं प्रभुजनों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
कार्यक्रम के दौरान राजस्थान निवासी मदन कुमारी उर्फ मोनी अम्मा जी की कहानी ने सभी को भावुक कर दिया। उन्हें शांति फाउंडेशन द्वारा रेस्क्यू कर पुनर्वास केंद्र लाया गया था, जहां लगातार उनका उपचार कराया गया।
स्वास्थ्य में सुधार होने के बाद काउंसलिंग के दौरान उन्होंने अपना घर राजस्थान में बताया। फाउंडेशन की टीम ने उनके बेटे से संपर्क किया, लेकिन बेटे ने अपनी मां को साथ रखने में असमर्थता जताते हुए कहा कि उसकी जिम्मेदारी अब पत्नी और बेटी हैं।
यह घटना वहां मौजूद लोगों के लिए बेहद मार्मिक पल बन गई और समाज में बढ़ती संवेदनहीनता पर कई सवाल छोड़ गई।
शांति फाउंडेशन में रह रहीं आयशा खान अम्मा जी की कहानी भी लोगों की आंखें नम कर गई। मानसिक रूप से अस्वस्थ अवस्था में उन्हें रेस्क्यू कर पुनर्वास केंद्र लाया गया था। लगातार इलाज और देखभाल के बाद जब उनकी स्थिति में सुधार हुआ तो उन्होंने अपने गांव का नाम दुर्ग बताया।
इसके बाद से शांति फाउंडेशन की टीम उनके परिवार की तलाश में लगातार जुटी हुई है। आयशा खान अक्सर अपने बच्चों को याद कर भावुक हो जाती हैं। लगभग सात वर्षों से वह शांति फाउंडेशन में रहकर जीवन बिता रही हैं और आज भी अपने परिवार से मिलने की उम्मीद लगाए बैठी हैं।
कार्यक्रम के दौरान शांति फाउंडेशन परिवार ने कहा—
“मां केवल एक रिश्ता नहीं, बल्कि भगवान का सबसे सुंदर रूप होती है। मां पूरी जिंदगी अपने बच्चों के लिए त्याग करती है, लेकिन वृद्धावस्था में उन्हें सबसे ज्यादा अपनापन और सहारे की जरूरत होती है।”
फाउंडेशन ने समाज से अपील करते हुए कहा कि अपने माता-पिता और परिवारजनों को कभी बेसहारा न छोड़ें।
शांति फाउंडेशन लगातार असहाय, बेसहारा और मानसिक रूप से अस्वस्थ लोगों की सेवा एवं पुनर्वास के लिए कार्य कर रहा है। मदर्स डे पर आयोजित यह कार्यक्रम केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि समाज को संवेदनशीलता, सेवा और पारिवारिक मूल्यों का संदेश देने वाला प्रेरणादायी आयोजन बन गया।
By- नरेश देवांगन
जगदलपुर, शौर्यपथ। डिमरापाल आयुष औषधालय में नियमित उपस्थिति को लेकर शिकायत के बाद अब मामले में एक नया पहलू सामने आया है। विभागीय सूत्रों एवं संबंधित पक्षों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, शिकायत के बाद जिला आयुष अधिकारी द्वारा संबंधित चिकित्सा अधिकारी से चर्चा की गई, जिसमें कथित रूप से नियमित उपस्थिति प्रभावित होने के पीछे “अत्यधिक गर्मी” एवं व्यक्तिगत कारणों का उल्लेख किया गया।
सूत्रों के अनुसार, संबंधित चिकित्सा अधिकारी ने चर्चा के दौरान कहा कि अत्यधिक तापमान के कारण लंबे समय तक अस्पताल में बैठने में कठिनाई होती है। इस पर जिला आयुष अधिकारी ने कथित तौर पर नाराजगी व्यक्त करते हुए यह कहा कि शासकीय सेवा में निर्धारित समय तक उपस्थित रहकर मरीजों को सेवाएं देना आवश्यक दायित्व है और अन्य अधिकारी-कर्मचारी भी समान परिस्थितियों में कार्य कर रहे हैं।
बताया जा रहा है कि इसके बाद संबंधित चिकित्सा अधिकारी द्वारा पारिवारिक परिस्थितियों, विशेषकर अपनी स्कूली बेटी की देखभाल का उल्लेख करते हुए नियमित उपस्थिति में कठिनाई होने की बात कही गई। साथ ही यह भी चर्चा में आया कि उनकी व्यक्तिगत परिस्थितियों की जानकारी विभागीय स्तर पर होने के कारण उन्हें ऐसे स्थान पर पदस्थ किया गया, जहां आवागमन अपेक्षाकृत सुगम हो। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या सरकारी अस्पताल “व्यक्तिगत सुविधा केंद्र” बनते जा रहे हैं? यदि व्यक्तिगत कारणों और मौसम को आधार बनाकर नियमित ड्यूटी प्रभावित होगी, तो दूरदराज के मरीज आखिर किस भरोसे सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों की ओर देखें?
सबसे हैरान करने वाली बात यह बताई जा रही है कि बातचीत के दौरान उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि अनुपस्थित रहने के बावजूद हाजिरी में अनुपस्थिति दर्ज नहीं होती। हालांकि, इन बिंदुओं की आधिकारिक पुष्टि विभागीय जांच के बाद ही संभव होगी।
अब मुख्य प्रश्न यह है कि यदि सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में नियमित सेवाएं प्रभावित होती हैं, तो इसका सीधा असर ग्रामीण मरीजों पर पड़ता है। ऐसे में आमजन की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि विभाग इस मामले में तथ्यात्मक जांच कर क्या निष्कर्ष निकालता है और नियमानुसार क्या कदम उठाए जाते हैं।
By- नरेश देवांगन
जगदलपुर, शौर्यपथ। सरकार आयुर्वेद को बढ़ावा देने के लिए भरसक प्रयास कर रही है, योजनाएं बन रही हैं, बजट खर्च हो रहा है—लेकिन जमीनी स्तर पर कुछ गैर-जिम्मेदार अधिकारी-कर्मचारियों की कार्यशैली इन प्रयासों पर सवाल खड़े करती दिख रही है। हालात ऐसे बनते दिख रहे हैं मानो जनता का पैसा और सरकारी मंशा, दोनों ही कागज़ों में बेहतर और जमीन पर कमजोर पड़ रहे हों। सबसे चिंताजनक यह है कि जिन अधिकारियों को जिले में निरीक्षण और निगरानी की जिम्मेदारी दी गई है, उन्हें भी यह सब या तो दिखाई नहीं दे रहा, या फिर प्राथमिकता में नहीं है।
इसी क्रम में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र काकलूर से सामने आई जानकारियों ने व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय स्तर पर यह बात सामने आई है कि केंद्र में पदस्थ आयुर्वेद चिकित्सा अधिकारी द्वारा नियमित रूप से ड्यूटी का निर्वहन नहीं किया जा रहा है, जिससे मरीजों को निरंतर सेवाएं मिल पाना प्रभावित हो रहा है।
मामले को और गंभीर बनाते हुए विभागीय सूत्रों का दावा है कि संबंधित महिला चिकित्सा अधिकारी महीने में एक बार आ जाएं तो ही “बहुत” माना जाता है, जबकि कभी-कभार तो वे लंबे समय तक अनुपस्थित रहती हैं। सूत्र यह भी बताते हैं कि उनके पति—जो स्वयं अन्य स्थान पर पदस्थ बताए जाते हैं—सप्ताह में एक बार आकर उपस्थिति रजिस्टर, ओपीडी रजिस्टर सहित अन्य आवश्यक प्रविष्टियां भरते नजर आते हैं। यदि यह तथ्यात्मक रूप से सही है, तो यह व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
सूत्रों के अनुसार, यह सब संभव होने के पीछे स्थानीय स्तर पर “संरक्षण” की चर्चा भी है, जिसमें विकासखंड चिकित्सा अधिकारी की भूमिका को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। हालांकि, यह पहलू जांच का विषय है और आधिकारिक पुष्टि के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकारी स्वास्थ्य संस्थान अब जिम्मेदारी से अधिक “व्यवस्था के भरोसे” चल रहे हैं? और क्या निगरानी तंत्र केवल कागज़ों तक सीमित रह गया है? यदि आरोपों में सच्चाई पाई जाती है, तो यह न केवल सेवा नियमों का उल्लंघन है, बल्कि आमजन के विश्वास के साथ भी गंभीर समझौता है।
अब देखना यह होगा कि जिम्मेदार अधिकारी इस मामले में क्या रुख अपनाते हैं—क्या पारदर्शी जांच और कार्रवाई होगी, या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में ही सिमट कर रह जाएगा।
कोंडागांव / शौर्यपथ समाचार
कोंडागांव जिले के बनियागांव क्षेत्र में अवैध प्लाटिंग का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। कुछ दिन पूर्व शौर्यपथ समाचार द्वारा इस गंभीर मुद्दे को प्रमुखता से उठाया गया था, जिसमें फर्जी नक्शे के आधार पर जमीन की बिक्री और नियमों की खुलेआम अनदेखी का खुलासा किया गया था। लेकिन हैरानी की बात यह है कि खबर प्रकाशित होने के बाद भी जिला प्रशासन की ओर से अब तक कोई ठोस कार्रवाई या जांच प्रतिवेदन सामने नहीं आया है।
गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ विधानसभा में धमतरी और कांकेर में अवैध प्लाटिंग के मामलों को लेकर गंभीर चर्चा हुई थी, जिसके बाद एक विशेष जांच समिति का गठन किया गया था। इसी कड़ी में कोंडागांव के बनियागांव में हो रही अवैध प्लाटिंग का मामला भी सामने आया। उम्मीद थी कि समिति इस पर शीघ्र कार्रवाई करेगी, लेकिन अब तक न तो जांच की प्रगति स्पष्ट है और न ही कोई आधिकारिक रिपोर्ट सार्वजनिक की गई है।
स्थानीय स्तर पर आरोप हैं कि जमीन दलालों ने स्कूल मैदान के बीच का फर्जी नक्शा दिखाकर प्लॉट बेचे हैं। यह मामला टाउन एंड कंट्री प्लानिंग के नियमों के सीधे उल्लंघन का संकेत देता है। आरोप यह भी हैं कि इस पूरे प्रकरण में राजस्व अमले—विशेष रूप से आरआई और पटवारी—की मिलीभगत से इन गतिविधियों को बढ़ावा मिल रहा है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है, लेकिन जांच में देरी से संदेह और गहराता जा रहा है।
शौर्यपथ समाचार द्वारा लगातार इस मुद्दे को उठाए जाने के बावजूद प्रशासन की निष्क्रियता कई सवाल खड़े कर रही है। विधानसभा में मामला उठने और जांच टीम गठित होने के बाद भी यदि कार्रवाई नहीं होती, तो यह न केवल प्रशासनिक सुस्ती को दर्शाता है, बल्कि अवैध कारोबार में लगे तत्वों के हौसले भी बढ़ा सकता है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रशासन इस गंभीर मामले में निष्पक्ष जांच कर दोषियों पर कार्रवाई करेगा, या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा। आने वाले दिनों में प्रशासन की कार्रवाई इस पूरे मामले की दिशा तय करेगी।
नरेश देवांगन
जगदलपुर, शौर्यपथ। आयुर्वेद को बढ़ावा देने के लिए सरकारी घोषणाएं तेज़ हैं, मगर डिमरापाल में तस्वीर कुछ और ही कहानी कहती दिख रही है। सवाल सीधा है—जब अस्पताल ही नियमित रूप से संचालित न हो, तो मरीज इलाज कहां कराएं? योजनाओं की चमक और ज़मीनी हकीकत के बीच यह फासला न सिर्फ व्यवस्थाओं पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि आयुर्वेद की साख पर भी असर डाल सकता है। और सबसे दिलचस्प बात—निगरानी तंत्र को जैसे यह सब दिखता ही नहीं, या दिखता है तो दर्ज नहीं होता।
इसी कड़ी में शासकीय आयुर्वेद औषधालय डिमरापाल चर्चा में है, जहां सेवाएं कथित तौर पर “हफ्ते में एक-दो दिन” तक सिमट गई हैं। ग्रामीणों का कहना है कि डॉक्टर की नियमित अनुपस्थिति के चलते उन्हें छोटे-छोटे इलाज के लिए भी इधर-उधर भटकना पड़ता है, जबकि रजिस्टरों में सब कुछ ‘समय पर’ और ‘नियमित’ बताया जाता है।
“शौर्यपथ” टीम के निरीक्षण में सोमवार से बुधवार तक चिकित्सा अधिकारी मौजूद नहीं मिलीं। गुरुवार—सियान जतन —पर अस्पताल में उपस्थिति दर्ज कर सेवाएं दी जाती दिखीं। ग्रामीणों के शब्दों में, “यहां इलाज नहीं, हाजिरी का कैलेंडर चलता है।”
सूत्रों के अनुसार, उपस्थिति और ओपीडी आंकड़ों के बीच अंतर की आशंका जताई जा रही है। संबंधित चिकित्सा अधिकारी ने अनौपचारिक बातचीत में पारिवारिक कारणों—विशेषकर छोटे बच्चों की देखभाल—का हवाला देते हुए बताया कि वे प्रतिदिन उपस्थित नहीं हो पातीं। साथ ही यह भी संकेत दिया कि मरीजों की संख्या कम होने के बावजूद नियमित आंकड़े प्रस्तुत करने का दबाव रहता है, जिसके चलते प्रविष्टियों में अंतर आ सकता है। सवाल यह है कि अगर आंकड़े ही इलाज बन जाएं, तो मरीज का भरोसा किस पर टिका रहेगा?
मामले की सूचना जिला आयुर्वेद अधिकारी को दिए जाने पर त्वरित कार्रवाई का आश्वासन मिला और 20 दिन पहले शिकायत भी सौंपी गई। लेकिन “तत्काल” शब्द फिलहाल फाइलों में ही सक्रिय नजर आता है—स्थानीय स्तर पर किसी ठोस कार्रवाई की पुष्टि अब तक सामने नहीं आई है। ऐसे में यह भी सवाल उठ रहा है कि क्या व्यवस्था में ‘सब ठीक है’ मान लेना ही नई कार्यप्रणाली बन गई है?
अब नजरें इस बात पर हैं कि क्या जिम्मेदार अधिकारी इस प्रकरण की निष्पक्ष जांच कर आवश्यक कार्रवाई करेंगे, या फिर डिमरापाल का औषधालय यूं ही कागज़ों में रोज़ खुलता रहेगा और ज़मीन पर हफ्ते में एक-दो दिन ही दिखाई देगा।
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
