कृष्णा मंडल । दंन्तेवाड़ा
एक शिक्षक छुट्टी पर, दूसरे को आश्रम का जिम्मा—अब बच्चों को पढ़ाएगा कौन? दंतेवाड़ा की शिक्षा व्यवस्था पर सवाल
अटैचमेंट पर रोक के बाद भी शिक्षक स्कूल से बाहर, आश्रमों में अधीक्षक की जिम्मेदारी; दंतेवाड़ा में शिक्षा व्यवस्था बेपटरी!
दंतेवाड़ा। जिले की शिक्षा व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों के सरकारी स्कूल पहले से ही शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं, ऐसे में स्कूलों में पदस्थ शिक्षकों को आश्रमों की जिम्मेदारी सौंपे जाने से बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होने का मामला सामने आया है।
राज्य सरकार की व्यवस्था के अनुसार प्राथमिक विद्यालयों में 1+1 और माध्यमिक विद्यालयों में 1+3 शिक्षकों की व्यवस्था है। लेकिन शिक्षकों के अवकाश पर रहने की स्थिति में कई स्कूलों में पहले ही उपलब्ध शिक्षक संख्या घट जाती है। ऐसे में यदि बचे हुए शिक्षक को भी आश्रम अधीक्षक का अतिरिक्त दायित्व दे दिया जाए, तो स्कूल में बच्चों की नियमित पढ़ाई किस तरह संचालित होगी, यह बड़ा सवाल है।
दंतेवाड़ा जिले में कई शिक्षक अवकाश पर रहने के कारण स्कूलों में पहले से ही शिक्षकों की कमी बनी रहती है। ऐसे में प्राथमिक विद्यालय में यदि एक शिक्षक अवकाश पर है और दूसरे शिक्षक को आश्रम अधीक्षक की जिम्मेदारी सौंप दी जाती है, तो संबंधित स्कूल में बच्चों को पढ़ाने के लिए शिक्षक ही नहीं बचता। इसका सीधा असर बच्चों की पढ़ाई और उनकी शैक्षणिक प्रगति पर पड़ने की आशंका है।
सबसे अहम सवाल यह है कि जब राज्य सरकार, जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग की ओर से शिक्षकों के अटैचमेंट और आंतरिक व्यवस्था पर रोक की बात कही गई है, तो फिर स्कूल में पदस्थ शिक्षक को वहां की शैक्षणिक व्यवस्था सुनिश्चित किए बिना आश्रम अधीक्षक की जिम्मेदारी कैसे दी जा रही है?
मामले में संबंधित शिक्षक का कहना है कि उन्हें जिला शिक्षा अधिकारी और एसी विभाग की ओर से आश्रम अधीक्षक का दायित्व सौंपा गया है। शिक्षक के मुताबिक उन्होंने स्कूल में पढ़ाई प्रभावित न हो, इसके लिए अतिथि शिक्षक उपलब्ध कराने की मांग भी अधिकारियों से की है।
वहीं, उनका कहना है कि जिले के आश्रमों में अधीक्षक के रूप में कार्यरत कई कर्मचारी मूल रूप से शिक्षक ही हैं। यदि यह व्यवस्था व्यापक स्तर पर लागू है, तो सवाल सिर्फ एक स्कूल का नहीं, बल्कि दंतेवाड़ा जिले के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की उपलब्धता और बच्चों की पढ़ाई की पूरी व्यवस्था का है।
*स्कूलों में पहले शिक्षक चाहिए या फिर शिक्षकों से दूसरे विभागीय दायित्व पूरे कराए जाएंगे?*
*यह सवाल अब जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग से पूछा जा रहा है।*
आदिवासी बहुल दंतेवाड़ा जिले में बच्चों की शिक्षा पहले से ही चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में संचालित होती है। ऐसे में स्कूलों में उपलब्ध शिक्षकों को दूसरे दायित्वों में लगाने से पहले वैकल्पिक शिक्षक की व्यवस्था करना जरूरी है, ताकि बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो।
अब देखना होगा कि जिला प्रशासन, शिक्षा विभाग और राज्य सरकार इस मामले को कितनी गंभीरता से लेते हैं और शिक्षकविहीन हो रहे स्कूलों में तत्काल शिक्षकों की व्यवस्था कब तक की जाती हैं
*आश्रम अधीक्षक का पक्ष*
संबंधित आश्रम अधीक्षक/शिक्षक का कहना है कि उन्हें जिला शिक्षा अधिकारी एवं एसी विभाग द्वारा आश्रम अधीक्षक का दायित्व सौंपा गया है। उन्होंने स्कूल की पढ़ाई प्रभावित न हो, इसके लिए विभागीय अधिकारियों से अतिथि शिक्षक की मांग की है। उनका कहना है कि जिले के कई आश्रमों में अधीक्षक की जिम्मेदारी शिक्षकों के पास ही है।
मुख्य सवाल: जब स्कूल में बच्चों को पढ़ाने के लिए शिक्षक ही उपलब्ध नहीं है, तो क्या वैकल्पिक शिक्षक की व्यवस्था किए बिना शिक्षक को आश्रम अधीक्षक की जिम्मेदारी देना उचित है?