बिलासपुर / शौर्यपथ / तैश में आपराधिक कृत्य हो जाना और ठंडे दिमाग से षडय़ंत्र पूवर्क आपराधिक मामले को अंजाम देने के बीच बहुत अंतर है। एक षडय़ंत्र कैसे किसी मध्यमवर्गीय परिवार की जिंदगी भुचाल ले आता है और पुरा परिवार गहरे संकट में फस जाता है। इसका उदाहरण 19 अक्टुबर 2019 के दिन निराला नगर निवासी भुपेन्द्र शर्मा द्वारा की गई आत्महत्या है। मृतक जो की विद्युत मंडल का सेवा निवृत्त कर्मचारी था। असामाजिक तत्वों के चक्कर में पड़ कर अपनी बड़ी धन राशि 30 लाख रुपये से अधिक गवा बैठा था और उस पर इस बात के लिए दबाव था कि वह निराला नगर के जिस मकान में रहता है उसका भी मुख्तियार नामा उन्हीं लोगो के पक्ष में लिख दे जिन्होंने उससे छल पूवर्क 30 लाख रुपये ले लिया है। मृतक ने जिन लोगो का नाम अपने सोसाईट नोट में लिखा उन्में शैलेन्द्र सिंह, नवीन तिवारी, जयपाल पंजवानी, प्रमोद यादव और अवधेश शामिल है। असल में भुपेन्द्र शर्मा ने अपनी जान देने के पूर्व दो सोसाईट नोट लिखे थे।
मृतक का बेटा सौम्यदीप युके्रन में डॉक्टरी की पढ़ाई करता था। किन्तु पढ़ाई अधुरी छोड़ कर वापस आ गया था और गलत संगत में फस गया था। उसी के साथ अवधेश नाम का एक और व्यक्ति था सोम्यदीप की बरबादी में अवधेश का बड़ा हाथ था। एक तरफ बेटा जेल जा रहा था और दुसरी तरफ ब्याज के रुपये देनदारी के मसले में शहर के आदतन गुंडे भुपेन्द्र को अपने षडय़ंत्र में फसा चुके थे। सोम्यदीप दिपावली के वक्त घर आया और सरकंडा थाने की पुलिस ने उसे पकड़ लिया। अवधेश साहू ने सरकंडा थाने में शिकायत दर्ज कराया था कि सोम्यदीप ने उसकी मां के नाम की संपत्ती फर्जी पॉवर ऑफ अर्टनी से बेच दी। ऐसी शिकायते शहर में कई होती है। किन्तु कुछ मामलों में भ्रष्ट पुलिस जांच किए बिना ही किसी को हिरासत में लेकर जेल भेज देते है। 10 दिन की जेल उसी दौरान पिता द्वारा आत्महत्या बहनों का गृहस्थ जीवन लगभग बरबाद। किन्तु व्यवस्था के सामने समाज के कथित नेता चुप रहे। सौम्यदीप ने जेल से बाहर निकलने के बाद प्रदेश के डीजीपी को शिकायत की थी। डीजीपी ने शिकायत पर जांच की जिम्मेदारी कोतवाली सीएसपी निमेश बरैया को दी। सरकंडा थाना भी उन्ही के अंतर्गत आता है। जांच में उन्होंने पाया की सौम्यदीप को जो पावर ऑफ अर्टनी मिली है उसमें हेमो देवी और सकलदेव साहू को कोई आपत्ती नही है। रजीस्ट्री के समय भी पंजीयक के कार्यालय में दोनो उपस्थित थे रजीस्ट्री 7 अगस्त 2015 को हुई थी। सकलदेव ने गवाही में हस्ताक्षर भी किया। जांच में ऐसा पाया गया की जांच अधिकारी सब इंसपेक्टर राम आश्रय यादव ने एक लंबी रकम 90 हजार लेकर बिना दस्तावेजों के जांचे सौम्यदीप को अंदर करवा दिया। इस प्रकरण में कबूतर बाजी भी जुड़ी है, और उसमें बिलासपुर के एक निजी अस्पताल के डॉक्टर का नाम भी सामने आता है किन्तु उस ओर जांच नही हुई। प्रभाव शाली लोग इसी तरह बचते है। युके्रन में डॉक्टरी पढ़ाने के लिए भुपेंद्र शर्मा ने कुछ पैसा बिजली ठेकेदारों से लिया था।
बिजली विभाग में कर्मचारियों और ठेकेदारों के पास आसान रुपयों की भरमार है। यही कारण है कि ब्याज का काम बिजली विभाग से जड़ चुका है। कुल मिलाकर बढ़ते दबाव ने भुपेन्द्र शर्मा को आत्महत्या के बाध्य किया और उस मामले में भी बहुत गहनता से जांच नही हुई। बिलासपुर में जांच एजेंसिया गैर व्यवसायिक तरीके से काम करने की आदि है। इसलिए भुपेन्द्र शर्मा जैसे प्रकरण होते रहते है, और इन पर कोई नोटिस भी नही लेता। शैलेन्द्र सिंह, नवीन तिवारी, पंजवानी, प्रमोद यादव जैसे चहरे जेल जाना अपने ट्रेक रिर्काड में अर्वाड पाना मानते है। जब तक समाज ऐसे लोगो को हेय दृष्टि से नही देखेगा भुपेन्द्र शर्मा जैसे संस्काराी लोग आत्महत्या करते रहेंगे।