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गया नगर की पुसई डबरी पर कब्ज़ा – लोकतंत्र पर भ्रष्टाचार के ‘पक्के निर्माण’

  • rounak group

    दुर्ग / शौर्यपथ / दुर्ग नगर निगम के वार्ड नंबर 4 में कभी एक खूबसूरत तालाब पुसई डबरी के नाम से बसा करता था, जो न केवल जल संरक्षण का स्रोत था बल्कि आसपास के लोगों के लिए जीवन रेखा भी था। आज यह जगह टूटी हुई ईंटों, अधूरे मकानों और कचरे के ढेर में बदल गई है। यह केवल एक तालाब की कहानी नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही, राजनीतिक गठजोड़ और भ्रष्टाचार के उस सिस्टम का जीता-जागता उदाहरण है, जो संविधान और कानून को पैसों व सत्ता के नीचे कुचल देता है।
सरकारी योजनाओं के विपरीत जमीनी सच्चाई
   राज्य और केंद्र सरकार तालाबों के संरक्षण के लिए करोड़ों रुपये की योजनाएं चला रही हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका उल्टा हो रहा है। करोड़ों की कीमत वाली शासकीय भूमि खसरा नंबर 838 को भरकर भूखंडों में बांट दिया गया और अब यहाँ अवैध निर्माण धड़ल्ले से जारी है। निगम प्रशासन ने यहां सरकारी बोर्ड लगाकर चेतावनी दी, लेकिन कब्जाधारियों ने उसे उखाड़ फेंका — जैसे इस भूमि पर लिखे कानून को भी मिटा दिया हो।

 

कार्रवाई पर लगाम डालता राजनीतिक दबाव
  निगम कर्मचारी जब भी यहाँ तोड़फोड़ और कब्जा हटाने पहुंचते हैं, कहीं न कहीं से राजनीतिक दबाव आकर उनकी कार्रवाई रोक देता है। ट्रिपल इंजन वाली सरकार के इस इलाके में सत्ता पक्ष पर ही संरक्षण देने का आरोप लग रहा है। सवाल यह है कि जब सरकारी कर्मचारी ही राजनीतिक दबाव के डर से कार्रवाई नहीं कर पा रहे, तब आम नागरिक कैसे न्याय की उम्मीद करे?
जनप्रतिनिधियों की चुप्पी, कब्जाधारियों का हौसला
स्थानीय जनप्रतिनिधि, जो मंचों पर सुशासन और विकास के वादे करते हैं, इस मामले में मौन हैं। उनका यह मौन ही भ्रष्टाचारियों के हौसले को ऊंचा कर रहा है। तालाब की जमीन पर अवैध कॉलोनी खड़ी हो रही है और प्रशासन का रवैया मानो यह संदेश दे रहा है: “पैसा और राजनीतिक ताकत हो तो कानून को झुकाया जा सकता है।”
संविधान की शक्ति बनाम भ्रष्ट ताकतें
यह मामला केवल एक अवैध कब्ज़े का नहीं, बल्कि संविधान और लोकतंत्र की बुनियाद के सामने खड़ी होती भ्रष्ट ताकतों का परीक्षण है। अगर आज इस पुसई डबरी को बचाने और दोषियों को सज़ा दिलाने की पहल नहीं हुई, तो यह उदाहरण आने वाले वर्षों में और दर्जनों सरकारी भूमि हथियाने का रास्ता खोल देगा।
बड़ा सवाल
क्या सरकार, प्रशासन और जनप्रतिनिधि मिलकर इस ऐतिहासिक तालाब को उसके मूल स्वरूप में वापस लाकर यह संदेश देंगे कि “संवैधानिक शक्तियां सबसे ऊपर हैं”, या फिर सत्ता और पैसे का गठजोड़ इस तालाब को हमेशा के लिए निगल जाएगा?
यह केवल गया नगर का सवाल नहीं — यह पूरे प्रदेश के सुशासन की असल परीक्षा है।

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