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“कुर्सी का मोह”: क्या धीरज बांकलीवाल बदलेंगे संजय कोहले की विपक्षी भूमिका — दुर्ग निगम में सवालों का तंज Featured

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दुर्ग । शौर्यपथ  । नगर निगम में विपक्ष की भूमिका सुचारू रखने और जनता की आवाज़ बनने के दायित्व पर खरा उतरने को लेकर कांग्रेस के भीतर सांबा-सा तनाव स्पष्ट दिखने लगा है। पिछले छह महीनों के आंदोलन और नेता प्रतिपक्ष पद की प्रतीक्षा के बाद जब संजय कोहले को वह आरामदेह ऑफिस-व्यवस्था मिल गई, तो उनसे जुड़ी असंतुष्टि धीरे-धीरे मुखर होती जा रही है। अब कांग्रेस के नव-निर्वाचित जिला अध्यक्ष व पूर्व महापौर धीरज बांकलीवाल के ऊपर यह दायित्व सुलझाने की बड़ी जिम्मेदारी आ खड़ी हुई है — कि वे क्या निगम में सचमुच मजबूत विपक्ष तैयार कर पाएंगे या मामला फिर भी धूल में दफन हो जाएगा।

वृहत आरोप और नगर की बदहाल हालत

पार्टी के अंदरूनी सूत्रों और शहरवासियों के कहे अनुसार पिछले 20 सालों में जिस तरह निगम की हालत वर्तमान में बदहाली के शिखर पर नजर आ रही है, वह पहली बार भयावह रूप में नजर आ रहा है। जल आपूर्ति में अनियमितता, टूटे-फूटे और गड्ढों से भरी सड़कें, अतिक्रमण, रात में अंधेरे वाले रास्ते, बदबूदार वातावरण, कार्यालयों में अधिकारियों का अनुपस्थित होना, सफाई व्यवस्था की विफलता और धनवानों द्वारा अवैध पक्का निर्माण — ये वे मुद्दे हैं जो नागरिकों की रोज की परेशानियों का कारण बने हुए हैं।

इन तमाम समस्याओं के बीच कांग्रेस के दर्जनभर पार्षदों की उम्मीद थी कि उन्हें मिले नेता प्रतिपक्ष संजय कोहले निगम में विपक्षी तीखापन बनाए रखकर जनता की आवाज़ बुलंद करेंगे। पर स्थानीय लोगों और कई पार्षदों का आरोप है कि कोहले पिछले छह महीने में सिर्फ़ एसी-कमरा और कैमरा मिलने के लिए आंदोलन करते रहे; और जैसे ही सुविधाएँ मिलीं, उन्होंने महापौर की प्रशंसा करने वाले व्यवहार में आ धीरे-धीरे विपक्षी भूमिका से दूरी बना ली।

कांग्रेस बनाम भाजपा: संगठनात्मक अनुशासन और जनता की धारणा

असंतुष्टि केवल कांग्रेस पार्षदों तक सीमित नहीं रही — दबी जुबां में भाजपा के कुछ पार्षद भी कहते सुने गए हैं कि जब नेता प्रतिपक्ष ही मौन हो जाए तो उनको किसके खिलाफ आवाज़ उठानी चाहिए। राजनीतिक विश्लेषण यह बताता है कि विपक्ष की सक्रियता ही लोकतंत्र में सत्ता को जवाबदेह बनाती है; और यदि विपक्ष का नेतृत्व स्वयं साइलेंट मोड में चला जाए तो नगर शासन की जवाबदेही कमजोर पड़ती है और प्रशासनिक अनियमितताएँ बढ़ती हैं।

पार्टी कार्यकारिणी के अंदर यह मत बनता जा रहा है कि संगठन द्वारा दी गई ज़िम्मेदारी का यदि निर्वाह ईमानदारी से नहीं हो रहा तो बदलाव अपरिहार्य है। कई कांग्रेस पार्षद अब धीरज बांकलीवाल से यही अपेक्षा रखते हैं कि वे युवा जोश और सशक्त नेतृत्व के साथ नगर निगम में विपक्षी चेहरा बदलकर नए सिरे से सक्रियता दिखाएँ — वरना आरोपों को लेकर अंदरूनी असंतोष और सार्वजनिक धारणा दोनों ही पार्टी के लिए महंगी साबित हो सकती हैं।

धीरज बांकलीवाल पर क्या दबाव है?

धीरज बांकलीवाल, जिनके पास निगम की राजनीति की जानकारी और पूर्व महापौर के नाते अनुभव भी है, के ऊपर अब दो तरह का दबाव है — एक, निगम में अनियमितताओं और जनक्रोध के मुद्दों को उजागर कर एक जिम्मेदार और संघर्षशील विपक्षी नेतृत्व स्थापित करना; और दूसरा, संगठनात्मक संतुलन बनाए रखते हुए ऐसे कदम उठाना कि पार्टी की छवि सुधारे और स्थानीय लोकप्रियता बनी रहे। यदि बांकलीवाल पहले ही कार्यालय आवंटन आदि जैसी सुविधाएँ मिलने के बाद मौन रहने वालों की राह अपनाते हैं, तो कांग्रेस के लिए दीर्घकालिक राजनैतिक कीमत चुकानी पड़ सकती है।

सम्भावित परिणाम और राजनीतिक रणनीति

यदि जिला अध्यक्ष शीघ्र ही कदम नहीं उठाते — जैसे नेता प्रतिपक्ष की भूमिका पर पुनर्विचार, नया चेहरा उतारना, या पारदर्शी सामूहिक रणनीति अपनाना — तो निगम में कांग्रेस का संघर्ष कमजोर दिखेगा और स्थानीय मतदाता वर्ग में निराशा बढ़ेगी। दूसरी तरफ़, सक्रिय विपक्ष और नियमित धरनों, प्रश्न-काल, जन सुनवाइयों और मीडिया-प्रेसर के जरिये मुद्दों को उठाने से निगम प्रशासन पर असर पड़ सकता है और नगर की समस्याओं का समाधान भी तेज़ हो सकता है — यही कांग्रेस पार्षदों की अपेक्षा है।

निष्कर्ष — यह मरीज कौन ठीक करेगा?

कुर्सी का मोह — यह केवल एक व्यक्तिगत दोष का टैग नहीं रह जाता बल्कि जब वह मोह लोकतंत्र के आवश्यक प्रतिस्पर्धी तंत्र को प्रभावित करने लगे, तब मामला गंभीर हो जाता है। आज की सवा-सवाल भरी राजनीति में धीरज बांकलीवाल के सामने यह चुनौती है कि वे क्या संजय कोहले को नए सिरे से सक्रिय कर पाएँगे, या आवश्यकता हुई तो विपक्ष का चेहरा बदलकर निगम में जनता की आवाज़ को फिर से बुलंद कर पाएँगे।

कांग्रेस की अगले कुछ कार्यवाहियों और निगम में उठने वाले सार्वजनिक मुद्दों पर उनके कदम यह तय करेंगे कि क्या दुर्ग नगर निगम में विपक्ष फिर से एक दबंग और जवाबदेह शक्ति बनकर उभरेगा — या कुर्सी का मोह लोकतंत्र की ज़रूरतों पर भारी पड़ जाएगा।

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