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“कब्जों के साये में दुर्ग का बाजार: नियमों पर निर्माण भारी, जवाबदेही पर खामोशी” लाखों की जमीन पर निर्माण, विस्थापन अधूरा—सिस्टम पर उठे गंभीर सवाल Featured

  • rounak group

 

दुर्ग। शौर्यपथ 
शहर के प्रमुख बस स्टैंड और आसपास का बाजार क्षेत्र इन दिनों अव्यवस्था, अतिक्रमण और विवादित निर्माणों के कारण चर्चा में है। जमीनी हालात और उपलब्ध तस्वीरें संकेत देती हैं कि विस्थापन की प्रक्रिया पूरी हुए बिना ही नए निर्माण कार्य आगे बढ़ रहे हैं, जिससे न सिर्फ नियमों के पालन पर सवाल उठ रहे हैं बल्कि यातायात और पार्किंग व्यवस्था पर भी दबाव बढ़ने की आशंका है।


मामला क्या है?

  • बस स्टैंड क्षेत्र में पुराने शौचालय के पास स्थित दुकानों को हटाकर बसों के लिए स्थान विकसित करने की योजना प्रस्तावित है।
  • विभागीय कर्मचारियों की माने तो यह योजना अभी प्रक्रियाधीन बताई जा रही है, लेकिन इसी दौरान पास के हिस्से में नई दुकान का निर्माण शुरू/जारी होने की बात सामने आई है।
  • निर्माण स्थल पर मटेरियल (गिट्टी/रेत) का ढेर और ढांचा खड़ा होना संकेत देता है कि काम आगे बढ़ चुका है।
  • वार्ड के इंजिनियर एवं EE भी नहीं दे पारहे है संतुष्टि पूर्ण जवाब 
  • अन्य विस्थापितों से चर्चा पर ज्ञात हुआ कि अन्य विस्थापितों को अभी तक नहीं मिली निर्माण की अनुमति 

स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि यह निर्माण बिना अंतिम स्वीकृति/विस्थापन पूर्ण हुए हो रहा है, तो यह नियमों की अनदेखी का मामला बन सकता है।


पुरानी दुकानें—कार्रवाई अधूरी, स्थिति यथावत

दूसरी ओर, जिन दुकानों को हटाने/शिफ्ट करने की बात है, वहां शटर बंद हैं लेकिन अंतिम कार्रवाई और स्पष्ट आवंटन/पुनर्वास की स्थिति सामने नहीं आई
इससे यह सवाल उठ रहा है कि एक तरफ नई दुकान बन रही है, वहीं पुरानी प्रक्रिया अधूरी क्यों है?


पार्किंग और यातायात पर असर

बस स्टैंड क्षेत्र पहले से ही भीड़भाड़ वाला है।

  • पार्किंग एरिया पर दबाव पहले से अधिक है
  • अवैध रूप से संचालित राम रसोई पर कार्यवाही का ना होना और शिकायत पर बाजार अधिकारी का जवाब ना देना आशंका का विषय 
  • बस स्टंट में लगातार अवैध कब्ज़े पर कार्यवाही का न होना बाजार अधिकारी की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल 
  • सड़क किनारे निर्माण/मटेरियल से आवागमन प्रभावित होने की आशंका
  • बाहर से आने वाले यात्रियों के लिए असुविधा बढ़ने का खतरा

शहरी योजना के मानकों के अनुसार, ऐसे संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण यातायात आकलन और स्पष्ट लेआउट के बाद ही होना चाहिए।


इंदिरा मार्केट का उदाहरण: पुरानी फाइलें, अधूरा समाधान

इंदिरा मार्केट की पार्किंग में वर्षों पहले बने विवादित दुकानों का मामला आज भी पूरी तरह सुलझा नहीं है।

  • एक दुकान पर ताला लगा, लेकिन अंतिम निपटारा/आवंटन स्पष्ट नहीं
  • संबंधित मामलों में सूचना का अभाव और पारदर्शिता पर सवाल

यह उदाहरण बताता है कि निर्णय लेने और उन्हें अंतिम रूप देने के बीच बड़ा गैप है।


जवाबदेही पर सवाल, लेकिन आधिकारिक पक्ष जरूरी

मामले में स्थानीय स्तर पर बाजार विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
साथ ही, जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों की भूमिका को लेकर भी चर्चा है।

हालांकि, इन आरोपों पर संबंधित अधिकारियों/जनप्रतिनिधियों का आधिकारिक पक्ष सामने आना आवश्यक है

  • क्या निर्माण को अनुमति दी गई है?
  • क्या विस्थापन की वैकल्पिक व्यवस्था तय हो चुकी है?
  • क्या यह अस्थायी ढांचा है या स्थायी निर्माण?

इन सवालों के स्पष्ट जवाब से ही स्थिति साफ हो सकेगी।


नियम क्या कहते हैं? (संक्षेप में)

  • नगर निगम क्षेत्र में निर्माण से पहले स्वीकृत नक्शा/अनुमति अनिवार्य
  • सार्वजनिक/यातायात क्षेत्रों में निर्माण हेतु विशेष अनुमोदन और सुरक्षा मानक
  • अतिक्रमण/अनधिकृत निर्माण पर नोटिस, सीलिंग/हटाने की कार्रवाई

  

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