2400 लाइट 8-10 वार्ड में बांटे जाने के आरोप से बढ़ा सवाल—बाकी वार्डों का नंबर कब आएगा?
दुर्ग। दुर्ग नगर निगम की सामान्य सभा में विद्युत विभाग से जुड़े एक सवाल ने विभागीय जानकारी और पारदर्शिता को लेकर सवाल खड़े कर दिए। भारतीय जनता पार्टी के पार्षद आशीष चंद्राकर ने विद्युत विभाग के प्रभारी ज्ञानेश्वर ताम्रकार से लाइटों के वितरण को लेकर सवाल किया, लेकिन उन्हें अपेक्षित विस्तृत जानकारी नहीं मिल सकी।
आशीष चंद्राकर ने जानना चाहा कि नगर निगम ने लाइटें किस विभाग/एजेंसी से, किस दर पर और कितनी संख्या में खरीदीं तथा उन्हें शहर के किन-किन वार्डों में वितरित किया गया। सामान्य सभा में प्रस्तुत जवाब में इन महत्वपूर्ण बिंदुओं की पूरी जानकारी सामने नहीं आने पर उन्होंने विद्युत प्रभारी से जवाब-तलब किया।
सवाल-जवाब के दौरान विद्युत प्रभारी ज्ञानेश्वर ताम्रकार ने स्वीकार किया कि अधिकारियों द्वारा उन्हें अधूरी जानकारी दी गई है और उन्होंने शाम 5 बजे तक पूरी जानकारी उपलब्ध कराने की बात कही।
सवाल जवाब का नहीं, व्यवस्था की जवाबदेही का है
मामला केवल एक पार्षद को अधूरी जानकारी मिलने तक सीमित नहीं है। सामान्य सभा नगर निगम की महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक और विभागीय जवाबदेही की व्यवस्था है, जहां पार्षदों द्वारा पूछे गए सवालों पर विभाग से तथ्यात्मक और पूर्ण जानकारी अपेक्षित होती है।
ऐसे में सवाल यह है कि जब सामान्य सभा में ही किसी विभाग के प्रभारी को अपने ही विभाग की खरीदी और वितरण से संबंधित पूरी जानकारी उपलब्ध नहीं हो, तो नगर निगम की खरीद और वितरण व्यवस्था की निगरानी आखिर किस स्तर पर हो रही है?
2400 लाइट सिर्फ चंद वार्ड में? आरोप की पुष्टि जरूरी
सामान्य सभा में पार्षद आशीष चंद्राकर ने यह भी आरोप लगाया कि अकेले 8-10 वार्ड में लगभग 2400 लाइट वितरित की जा चुकी हैं। हालांकि इस दावे की आधिकारिक पुष्टि होना अभी बाकी है।
यदि विभागीय रिकॉर्ड में वास्तव में इतनी बड़ी संख्या में लाइटें किसी एक वार्ड में वितरित होना दर्ज है, तो स्वाभाविक रूप से नगर निगम से यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि कुल कितनी लाइटें खरीदी गईं, किस वार्ड को कितनी लाइटें मिलीं और वितरण का आधार क्या था?
अब जनता के सामने आने चाहिए ये आंकड़े
नगर निगम की ओर से यदि शाम 5 बजे तक पूरी जानकारी उपलब्ध कराई जाती है, तो उसमें कम से कम इन सवालों का स्पष्ट उत्तर होना चाहिए—
कुल कितनी लाइटों की खरीदी हुई?
किस एजेंसी से खरीदी गई?
प्रति लाइट कितनी कीमत चुकाई गई?
खरीद की कुल लागत कितनी रही?
किस तारीख को और किस प्रक्रिया के तहत खरीद हुई?
वार्डवार कितनी लाइटें वितरित की गईं?
किस वार्ड में वास्तव में कितनी लाइटें दी गईं?
वितरण के लिए क्या कोई निर्धारित मापदंड था?
किन वार्डों में कितनी लाइटें अभी लंबित हैं?
आखिर लाइटें नगर निगम की संपत्ति हैं और उनका पैसा जनता के संसाधनों से आता है। इसलिए खरीदी से लेकर वार्डवार वितरण तक की पूरी जानकारी सार्वजनिक होना केवल पार्षदों का सवाल नहीं, बल्कि शहर की जनता के जानने का अधिकार भी है।
अब निगाहें विद्युत विभाग द्वारा शाम 5 बजे तक दिए जाने वाले उस जवाब पर हैं, जिससे यह स्पष्ट होगा कि सामान्य सभा में उठे सवालों का जवाब केवल समय मांगकर टाला गया या वास्तव में वार्डवार और खरीदवार पूरा रिकॉर्ड जनता के सामने रखा जाएगा।