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मैट्रिक पास चंद्रिका ने मेडिकल छात्रों के लिए देहदान किया, लोगों ने तेरहवीं में खर्च न कर स्मारक बनवाया

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रायपुर /शौर्यपथ/ 

आपने शहीदों, स्वतंत्रता सेनानियों और राजनेताओं के स्मारक देखे-सुने होंगे, लेकिन राजधानी से महज 103 किमी दूर मुंगेली के फंदवानी-कांपा में लोगों ने देहदान करने वाले गांव के एक समाजसेवी का स्मारक बनवा दिया है। यह स्मारक है चंद्रिका आर्य का, जिनका हाल में 49 वर्ष की आयु में निधन हुआ और उनके ही नहीं, बल्कि आसपास के कई गांवों के लोगों के बीच वे बेटियों की शिक्षा का अलख जगाने वाले समाजसेवी के रूप में जाने जाते रहे।

चंद्रिका ने देहदान की घोषणा काफी अरसा पहले कर दी थी। मृत्यु के बाद परिजनों और ग्रामीणों ने तय किया कि दशगात्र-तेरहवीं में पैसे खर्च न कर गांव में चंद्रिका का स्मारक बनवाया जाए। देहदानी चंद्रिका प्रसाद आर्य की तस्वीर के साथ इस स्मारक का अनावरण 19 दिसंबर को हुआ। यह ऐसी मिसाल बना कि आसपास के कई गांवों के 100 से ज्यादा लोगों ने देहदान का संकल्प ले लिया, ताकि मेडिकल छात्रों की पढ़ाई में आसानी हो। यह मामला सिर्फ देहदान से नहीं बल्कि ग्रामीण इलाकों में फैली कई तरह की भ्रांतियों में से एक को तोड़नेवाला भी है।

चंद्रिका ने मृत्यु से पहले ही अपनी बेटियों, बेटों व भाईयों से कह दिया था कि उनके शव को न जलाया जाए, न दफनाया जाए। बल्कि मेडिकल कॉलेज के छात्रों को पढ़ाई के लिए दान किया जाए। 9 दिसंबर 2021 को मौत के बाद परिजनों व ग्रामीणों ने चंद्रिका की इच्छा के अनुरूप सिम्स बिलासपुर को उनका शवदान कर दिया। सबने मिलकर निर्णय लिया कि तेरहवीं-दशगात्र में पैसा खर्च करने से अच्छा है कि चंद्रिका के नाम से स्मारक बनाया जाए, ताकि सदियों तक लोग उनके इस दान को याद रखें।

बेटियों की शिक्षा का अलख
चंद्रिका के भाई एमडी आर्य ने बताया कि उनके भाई गांव के पहले मैट्रिक पास व्यक्ति थे। पढ़ाई के प्रति उनकी इतनी रुचि थी कि उन्होंने अपनी चारों बेटियों के साथ-साथ 2 बेटों की शिक्षा में कोई कसर नहीं छोड़ी, बल्कि जीवनभर पूरे गांव को बेटियों की शिक्षा के लिए प्रेरित करते रहे। चंद्रिका ने कृषक होते हुए शिक्षा गारंटी के तहत 1 साल तक स्कूलों में पढ़ाया। यही नहीं, गुरु घासीदास सेवादार संगठन के तहत गांव के विकास कार्यों से भी जुड़े रहे।

देहदान इसलिए महत्वपूर्ण, 10 छात्रों के बीच एक बॉडी

छत्तीसगढ़ में 7 शासकीय, 3 निजी मेडिकल कॉलेज और 1 एम्स को मिलाकर एमबीबीएस की 1300 से अधिक सीटें हैं। एनएमसी गाइडलाइन के मुताबिक 10 छात्रों के बीच डिसेक्शन के लिए 1 बॉडी चाहिए, लेकिन यहां 50 छात्रों में एक देह का औसत है। दरअसल, केवल रायपुर मेडिकल कालेज ही ऐसा है जहां 180 सीटों के लिए साल में कभी 7 तो कभी 8 बॉडी दान में मिल जाती हैं। इसे दूसरे मेडिकल कालेज उधार भी ले जाते हैं।

 

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