नई दिल्ली /शौर्यपथ /सुप्रीम कोर्ट में लोन मोरेटोरियम का फायदा लेने वाले कर्जदारों से ब्याज की वसूली पर रोक का आग्रह करने वाली विभिन्न याचिकओं पर बुधवार को फिर सुनवाई हुई. इस दौरान केंद्र सरकार ने सुनवाई की तारीख आगे बढ़ाने की अपील की. सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अशोक भूषण, आर. सुभाष रेड्डी और एमआर शाह की बेंच ने टर्म लोन पर ब्याज पर ब्याज माफ करने और लोन मोरेटोरियम अवधि बढ़ाने की मांग वाली याचिकाओं पर सुनवाई 14 दिसंबर तक के लिए टाल दी है.
सुप्रीम कोर्ट ने 2 और 8 दिसंबर को भी की थी मामले पर सुनवाई
लोन मोरेटोरियम अवधि के दौरान ब्याज पर ब्याज से जुडे़ मामले पर मंगलवार यानी 8 दिसंबर और 2 दिसंबर को भी सुनवाई हुई थी. कोरोना संकट की वजह से आय प्रभावित होने के कारण लोन मोरेटोरियम सुविधा का लाभ लेने वाले लाखों कर्जदारों की निगाहें सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर लगी हुई हैं. केंद्र ने मंगलवार को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि कोविड-19 के मद्देनजर रिजर्व बैंक की ओर से छह महीने के लिये किस्तों के भुगतान पर अस्थायी रोक योजना के तहत सभी वर्गों को अगर ब्याज माफी दी जाती है तो 6 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा छोड़ने पड़ेंगे. अगर बैकों को यह बोझ उठाना पड़ा तो उन्हें अपनी कुल संपत्ति का बड़ा हिस्सा गंवाना पड़ेगा. इससे ज्यादातर बैंकों के वजूद पर संकट खड़ा हो जाएगा.
एसबीआई को गंवाना होगा 65 साल की संपदा का आधा हिस्सा
केंद्र की ओर से सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि इसी वजह से ब्याज माफी के बारे में सोचा भी नहीं गया. लोगों को राहत देने के लिए सिर्फ किस्त स्थगित करने का प्रावधान किया गया था. उन्होंने कहा कि अगर सभी वर्गों और श्रेणियों के कर्जदारों के कर्ज पर मोरेटोरियम अवधि का ब्याज माफ किया जाए तो यह रकम छह लाख करोड़ रुपये से ज्यादा होगी. उन्होंने कहा कि देश के सबसे बड़े बैंक भारतीय स्टेट बैंक को अगर छह महीने का ब्याज पूरी तरह से माफ करना हो तो इससे करीब 65 साल में जुटाई गई उसकी कुल संपदा का आधे से ज्यादा हिस्सा खत्म हो जाएगा. इंडियन बैंक्स एसोसिएशन के 25 सितंबर 2020 के हलफनामे का जिक्र करते हुए कहा कि एसबीआई के मुताबिक छह महीने के मोरेटोरियम अवधि का ब्याज करीब 88,078 करोड़ होता है, जबकि जमाकर्ताओं को इस अवधि के लिए देय ब्याज करीब 75,157 करोड़ होता है.
बैंकिंग सेक्टर ज्यादा वित्तीय दबाव को नहीं कर पाएगा सहन
एसजी मेहता ने कहा कि इस मामले में किसी भी तरह की ब्याज माफी देश की अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदायक होगी. भारतीय अर्थव्यवस्था या बैंकिंग सेक्टर इस वित्तीय दबाव को सहन नहीं कर सकेगा. दरअसल, रिजर्व बैंक ने कोरोना संकट के मद्देनजर छह महीने के लिए मोरेटोरियम सुविधा दी थी. इसमें कर्जदारों को किस्त नहीं चुकाने की छूट दी गई थी. अब सरकार ने भी इस बात पर सहमति जता दी है कि वह 2 करोड़ रुपये तक के लोन की बकाया किस्त पर कंपाउंड इंटरेस्ट का भुगतान करने को तैयार है. आरबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर करते हुए बैंकों और नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों को कहा था कि अगर उन्होंने कर्जदारों से कंपाउंड इंटरेस्ट लिया है तो उसे 5 नवंबर तक लौटाना होगा.