इंदिरा मार्केट से चार महीने में भी नहीं हटा कब्ज़ा, महापौर अलका बाघमार की नाकामी पर उठ रहे सवाल
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रविवार 14 सितंबर को वार्ड 60 पुष्पक नगर निरीक्षण में महापौर ने वेज ठेले लगाने की अनुमति दी और नॉनवेज ठेले हटाने का फरमान सुनाया।
सवाल उठ रहा है कि क्या यह फैसला निष्पक्ष है या भेदभाव का प्रतीक?
सुराना कॉलेज, समृद्धि बाजार, पुलगांव चौक, जिला अस्पताल—हर जगह ठेले और गुमटियों की “फौज” ने सड़कों को पाट दिया है।
महापौर निवास के आसपास भी अवैध ठेले, लेकिन निगम चुप।
दुर्ग। शौर्य पथ विशेष रिपोर्ट
दुर्ग की जनता आज यह सोचने पर मजबूर है कि नगर निगम महापौर अलका बाघमार वास्तव में शहर को अतिक्रमण मुक्त करना चाहती हैं या अतिक्रमण युक्त? रविवार 14 सितंबर को वार्ड क्रमांक 60 पुष्पक नगर में निरीक्षण के दौरान महापौर ने शाकाहारी खाद्य सामग्री के ठेले लगाने की अनुमति दी और नॉनवेज ठेले तत्काल हटाने का फरमान सुना दिया।
लेकिन सवाल यह है कि क्या यह निर्णय शहर की समस्या का हल है, या फिर नए विवादों को जन्म देने वाला कदम?
महापौर के दोहरे मानदंड
कुछ माह पहले तक महापौर बाघमार शहर को अतिक्रमण मुक्त करने की बातें करती रहीं। परंतु आज हालात यह हैं कि सुराना कॉलेज, समृद्धि बाजार, जिला अस्पताल, पुलगांव चौक से लेकर गौरव पथ तक, ठेले–गुमटियों की “फौज” ने सड़कों पर कब्जा जमा लिया है। यातायात व्यवस्था पूरी तरह चरमराई हुई है और प्रशासन की चुप्पी इस बदहाली को और गहरा रही है।
महापौर निवास के पास भी अवैध ठेले वालों की भरमार है। सवाल उठता है—अगर जनता को रास्ते पर चलने में तकलीफ़ हो रही है तो यह अनुमति और मौन सहमति आखिर किसके हित में है?
इंदिरा मार्केट: चार महीने से ‘हारती’ महापौर
सबसे बड़ा कटाक्ष यह है कि इंदिरा मार्केट के जूता-चप्पल लाइन और कपड़ा लाइन पर एक समुदाय विशेष द्वारा वर्षों से जमे अतिक्रमण को हटाने में महापौर बाघमार लगातार चार महीने से नाकाम साबित हो रही हैं।
जिस स्थान को शहर का सबसे बड़ा व्यावसायिक आकर्षण बनना चाहिए था, वहां अब यह अतिक्रमण “प्रबंधन” की तरह खड़ा है—मानो नगर निगम ने खुद इसकी स्थायी दुकानदारी को वैध मान लिया हो।
शहरवासी कह रहे हैं—“अगर महापौर जी इंदिरा मार्केट से 100 मीटर अतिक्रमण नहीं हटा पा रहीं, तो पूरे शहर से क्या हटाएंगी?”
भेदभाव का आरोप
नॉनवेज ठेले हटाने और वेज ठेले को अनुमति देने का फैसला भी महापौर की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर रहा है। छोटे व्यापारी चाहे वेज बेचें या नॉनवेज—दोनों अपने परिवार का भरण–पोषण कर रहे हैं। ऐसे में एकतरफा फैसला भेदभावपूर्ण ही माना जाएगा।
शहर की सफाई व्यवस्था बदहाल
अतिक्रमण की समस्या से परे, शहर की असली तस्वीर और भी भयावह है। गंदगी का अंबार, टूटी सड़कों की बदहाली, अंधेरे में डूबी स्ट्रीट लाइटें, उजड़े उद्यान और आवारा मवेशियों की भरमार—यही है आज का दुर्ग। प्रदेश सरकार जहां गोधन की रक्षा और गौमाता की सेवा की बड़ी-बड़ी बातें करती है, वहीं शहर में चरागाह की जमीन पर निजी बिल्डरों का कब्जा है और महापौर इस पर मौन साधे हुए हैं।
जनता की अपेक्षाएं टूटीं
जनता ने अलका बाघमार को भारी मतों से विजयी इसलिए बनाया था ताकि शहर की स्थिति सुधरे। लेकिन आज हालात यह हैं कि शहरी सरकार की कार्यशैली पर हर तरफ उंगलियां उठ रही हैं। स्वास्थ्य प्रभारी नितेश अग्रवाल की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। सफाई व्यवस्था की बदहाली और बदबूदार वातावरण पर न तो निगम प्रशासन को परवाह है और न ही जिम्मेदारों को शर्म।
“पोस्टर सरकार” बनाम “जमीनी हकीकत”
पोस्टर-बैनरों और सोशल मीडिया पर “स्वच्छ दुर्ग, सुंदर दुर्ग” के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि शहर की व्यवस्था हर दिन चरमरा रही है। इंदिरा मार्केट से लेकर समृद्धि बाजार और पुलगांव चौक तक अतिक्रमण का साम्राज्य फैला हुआ है।
तीखी बात :
कभी डॉ. सरोज पांडे जैसी महापौर ने शहर हित में सख्त फैसले लेने का दम दिखाया था। लेकिन आज की शहरी सरकार सिर्फ बयानों और अनुमति देने की राजनीति में उलझी है। जनता अब पूछ रही है—
“महापौर जी, आप शहर को अतिक्रमण मुक्त कर रही हैं, या फिर अतिक्रमण युक्त?”