“राम के नाम पर कब्ज़ा… और सुशासन के नाम पर मौन! दुर्ग निगम में ‘चयनात्मक बुलडोज़र नीति’ पर उठे सवाल”
दुर्ग / शौर्यपथ / शहर की व्यस्ततम सड़क और सरकारी भूमि पर बने राम रसोई के कथित अवैध निर्माण ने अब दुर्ग नगर निगम की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। आश्चर्य यह है कि यह अवैध कब्ज़ा न तो निगम के अतिक्रमण विभाग की नज़र में आता है और न ही महापौर श्रीमती अलका बाघमार एवं आयुक्त सुमित अग्रवाल की सक्रियता में कोई हलचल पैदा करता है—जबकि दोनों के पास इस अवैध निर्माण/अनिबंध की संपूर्ण जानकारी उपलब्ध होने की पुष्टि जनप्रतिनिधियों और नागरिकों द्वारा की जा रही है।
स्थानीय लोग सवाल उठा रहे हैं कि—
“क्या किसी बड़े लाभ या दबाव के कारण निगम प्रशासन इस अवैध निर्माण पर मौन साधे हुए है?”
सुशासन की दुहाई, पर कार्रवाई का अभाव
चुनाव के दौरान सुशासन लाने की बात कहकर जनता के सामने हाथ जोड़कर वोट मांगने वाली महापौर अलका बाघमार आज उसी सुशासन की रक्षा करने में कहीं दिखाई नहीं दे रहीं।
वहीं आयुक्त सुमित अग्रवाल के विभाग पर आरोप है कि—
गरीबों की ठेले-गुमटी पर तुरंत बुलडोज़र चल जाता है,पर सरकारी ज़मीन पर बने अवैध होटल पर कार्रवाई की फाइल तक नहीं हिलती।निगम के इस दोहरे रवैए ने प्रशासनिक निष्पक्षता पर भारी सवाल खड़े कर दिए हैं।
भगवान राम के नाम पर होटल व्यापार और निगम की चुप्पी
स्थानीय नागरिकों व व्यापारियों का कहना है कि “भगवान राम के नाम पर होटल व्यवसाय करने वालों का अवैध कब्ज़ा निगम प्रशासन के संरक्षण में फलफूल रहा है।”यह भी आरोप है कि सड़क और भूमि दोनों पर किए गए कब्ज़े से प्रतिदिन बड़े पैमाने पर यातायात प्रभावित होता है, पर निगम प्रशासन इस पर चुप्पी साधे हुए है।
सुशासन मंत्री की छवि पर भी असर
नगरीय निकाय मंत्री व उपमुख्यमंत्री अरुण साव के सुशासन अभियान को भी दुर्ग निगम के अधिकारी और जनप्रतिनिधि ठेंगा दिखाते नजर आ रहे हैं। एक ओर मंत्री के जन्मदिन पर पोस्टर लगाने की होड़ लगी,
वहीं दूसरी ओर उन्हीं मंत्री की सुशासन नीतियों को दुर्ग निगम के जिम्मेदार लोग पूरी तरह नकार रहे हैं।
जनता कह रही—वायदे कागज़ों में, कार्रवाई कहीं नहीं
दुर्ग निगम की वर्तमान स्थिति को लेकर जनता में गहरी नाराज़गी है। चुनावी वादे आज पूरी तरह बेमानी दिखाई दे रहे हैं और प्रशासनिक लापरवाही के कारण यह सवाल लगातार उठ रहा है कि—
“क्या दुर्ग में कानून केवल गरीबों पर ही लागू होता है?”
निगम प्रशासन का यह मौन न सिर्फ सुशासन की अवधारणा पर चोट है बल्कि जनप्रतिनिधियों व अधिकारियों की निष्पक्षता और ईमानदारी पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।