मर्यादा पुरुषोत्तम के नाम पर अवैध व्यापार, गरीबों पर बुलडोजर और रसूखदारों पर मौन—क्या यही है सुशासन?
दुर्ग / शौर्यपथ विशेष /
राम के नाम पर तैरते पत्थर की कथा श्रद्धा का विषय है, लेकिन राम के नाम पर सड़क पर अवैध कब्जा—यह न श्रद्धा है, न भक्ति, बल्कि प्रभु श्री राम के नाम का खुला अपमान है। विडंबना यह है कि जिस भारतीय जनता पार्टी ने राजनीति में राम के नाम को अपना सबसे बड़ा वैचारिक आधार बनाया, आज उसी पार्टी से जुड़े लोग राम के नाम का इस्तेमाल कर कानून, मर्यादा और प्रशासन—तीनों को ठेंगा दिखाते नजर आ रहे हैं।
दुर्ग विधानसभा क्षेत्र के हृदय स्थल, इंदिरा मार्केट स्थित गणेश मंदिर के ठीक सामने, सार्वजनिक सड़क पर ‘राम रसोई’ के नाम से होटल का संचालन खुलेआम किया जा रहा है। यह निर्माण न तो भारत सरकार से पंजीकृत किसी संस्था का है और न ही छत्तीसगढ़ शासन से। इसके बावजूद न कोई नोटिस, न कोई कार्यवाही—बस सत्ता का संरक्षण और प्रशासन की चुप्पी।
प्रभु श्री राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा गया है—सिद्धांत, त्याग और न्याय की जीवंत मिसाल। लेकिन उन्हीं के नाम पर आम रास्ते पर कब्जा कर व्यापार करना न सिर्फ धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाता है, बल्कि भाजपा की घोषित राम-भक्ति पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
गरीब पर कार्रवाई, रसूखदार पर रहम?
दुर्ग नगर निगम का दोहरा चरित्र किसी से छिपा नहीं है। गरीबों की गुमटियां हटाने के लिए निगम पूरी फौज, पुलिस बल और मशीनरी लेकर पहुंचता है। नोटिस, जब्ती और ध्वस्तीकरण—सब कुछ तत्काल।
लेकिन जब बात राम के नाम पर अवैध कब्जा करने वाले रसूखदारों की आती है, तो निगम आयुक्त सुमित अग्रवाल की कलम सूख जाती है, फाइलें थम जाती हैं और कार्रवाई ठहर जाती है।
सूत्रों में यह चर्चा भी आम है कि इस मौन के पीछे “पर्दे के पीछे लेन-देन” की गूंज सुनाई देती है। यह सच है या नहीं—यह जांच का विषय है, लेकिन यह भी निर्विवाद सच है कि अवैध कब्जा आज भी कायम है और
प्रशासन आज भी मौन।
मौन की त्रिमूर्ति
इस पूरे मामले में
निगम आयुक्त सुमित अग्रवाल मौन,
महापौर अलका बाघमार मौन,
भाजपा जिला अध्यक्ष सुरेंद्र कौशिक मौन।
क्या यह मौन इसलिए है क्योंकि कब्जाधारी का संबंध भाजपा से है?
अगर यही पैमाना है, तो कल कोई भी राम के नाम पर होटल, गुमटी या संस्था खोलकर सड़क पर कब्जा करेगा—और प्रशासन हाथ पर हाथ धरे बैठा रहेगा।
जिला प्रशासन के लिए सीधा सवाल
अब सवाल जिला प्रशासन और कलेक्टर महोदय से है—
क्या प्रभु राम का नाम केवल चुनावी मंचों और योजनाओं तक सीमित है?
या फिर राम के नाम पर हो रहे इस अवैध कब्जे पर भी प्रशासन संज्ञान लेगा?
यदि आज यह अवैध कब्जा नहीं रोका गया, तो यह न केवल शासन की साख पर दाग होगा, बल्कि हिंदू आस्था के सबसे पवित्र नाम को भी बाजारू और विवादित बना देगा।
राम मर्यादा हैं, राम कानून हैं—
और राम के नाम पर अराजकता, सत्ता और प्रशासन—तीनों के लिए कलंक है।