आजीवन कानूनी छूट, मतदाता सूची और नियुक्ति प्रक्रिया पर उठे बड़े सवाल**
नई दिल्ली |
भारतीय लोकतंत्र की निष्पक्षता की प्रहरी मानी जाने वाली संस्था भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक साथ कई अहम संवैधानिक सवालों पर सुनवाई चल रही है। जनवरी 2026 के दूसरे सप्ताह में हुई सुनवाइयों ने चुनाव आयोग की स्वतंत्रता, जवाबदेही और निष्पक्षता को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
चुनाव आयुक्तों को ‘आजीवन कानूनी छूट’ पर सुप्रीम कोर्ट का नोटिस
12–13 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी करते हुए CEC और अन्य चुनाव आयुक्तों को दी गई आजीवन कानूनी छूट (Immunity) पर जवाब मांगा है।
याचिका में CEC एवं अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें) अधिनियम 2023 की धारा 16 को चुनौती दी गई है, जिसके तहत आयुक्तों को उनके कार्यकाल के दौरान किए गए फैसलों के लिए सिविल और आपराधिक कार्रवाई से सुरक्षा दी गई है।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह प्रावधान संविधान के समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14) और जवाबदेही के सिद्धांत के खिलाफ है।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इस धारा पर रोक लगाने से इनकार किया है, लेकिन इसकी संवैधानिक वैधता की गहन समीक्षा करने पर सहमति जताई है।
मतदाता सूची और नागरिकता जांच पर गंभीर सवाल
13 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सहित अन्य राज्यों में चल रहे ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR)’ के तहत मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के मामलों पर सुनवाई की।
कोर्ट ने चुनाव आयोग से स्पष्ट पूछा कि —
“क्या कोई निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (ERO) केंद्र सरकार के अंतिम निर्णय से पहले ही किसी व्यक्ति की नागरिकता पर संदेह के आधार पर उसका नाम मतदाता सूची से हटा सकता है?”
कोर्ट ने संकेत दिया कि मताधिकार एक संवैधानिक अधिकार है और इसमें किसी भी प्रकार की प्रशासनिक जल्दबाजी लोकतंत्र को नुकसान पहुंचा सकती है।
नियुक्ति प्रक्रिया पर भी न्यायिक जांच
सुप्रीम कोर्ट उस 2023 के कानून की भी समीक्षा कर रहा है, जिसके तहत चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को हटाकर एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल किया गया है।
याचिकाकर्ताओं और विपक्षी दलों का कहना है कि इससे निर्वाचन आयोग की स्वायत्तता कमजोर हो सकती है और कार्यपालिका का प्रभाव बढ़ सकता है।
मार्च 2023 का ऐतिहासिक फैसला फिर चर्चा में
गौरतलब है कि मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि जब तक संसद कानून न बनाए, तब तक चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति
प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और भारत के मुख्य न्यायाधीश की समिति द्वारा की जाए।
बाद में केंद्र सरकार ने कानून बनाकर CJI को इस समिति से बाहर कर दिया, जिसे अब फिर से सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।
लोकतंत्र के भविष्य से जुड़ा मामला
विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट में चल रही यह सुनवाई केवल कानूनी मुद्दा नहीं, बल्कि भारत के लोकतांत्रिक ढांचे और चुनावी निष्पक्षता के भविष्य से जुड़ा अहम पड़ाव है।