दुर्ग । शौर्यपथ
जहाँ आम नागरिकों से एक-एक दस्तावेज के लिए नियमों और प्रक्रियाओं का कड़ाई से पालन कराया जाता है, वहीं दुर्ग तहसील कार्यालय परिसर के भीतर वर्षों से दो निजी व्यावसायिक प्रतिष्ठान बिना किसी स्पष्ट वैधानिक अनुमति के संचालित होने का मामला सामने आया है। यह स्थिति न केवल गंभीर प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करती है, बल्कि एक बड़े संभावित घोटाले की ओर भी इशारा कर रही है।
तहसील परिसर में स्थित त्रिमूर्ति होटल और तहसील कार्यालय के अंदर संचालित वाहन पार्किंग से प्रतिदिन हजारों रुपये की वसूली की जा रही है। चौंकाने वाली बात यह है कि इन प्रतिष्ठानों का ठेका किसे, कब और किन शर्तों पर दिया गया—इसकी स्पष्ट जानकारी स्वयं विभागीय अधिकारियों के पास भी उपलब्ध नहीं है।
ठेका कब और कैसे—कोई रिकॉर्ड नहीं
जब इस संबंध में तहसील के जिम्मेदार अधिकारियों से जानकारी मांगी गई, तो अलग-अलग और विरोधाभासी जवाब सामने आए। किसी अधिकारी ने कहा कि "सालों पहले ठेका हुआ था, उसके बाद कभी नया टेंडर नहीं हुआ", जबकि एक अन्य अधिकारी ने स्वीकार किया कि त्रिमूर्ति होटल को नोटिस तो जारी किया गया था, लेकिन उसके बाद की कार्रवाई से संबंधित कोई फाइल या रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। यानी नोटिस जारी हुआ, पर कार्रवाई का कोई ठोस प्रमाण नहीं।
सूत्रों और प्रशासन के बयान में टकराव
होटल प्रबंधन का दावा है कि "हर साल ठेका होता है", लेकिन विभागीय अधिकारी इस दावे को सिरे से नकार रहे हैं। यदि हर वर्ष ठेका हुआ है, तो उसके टेंडर दस्तावेज, अनुबंध, रसीदें और राजस्व रिकॉर्ड कहाँ हैं? और यदि ठेका नहीं हुआ, तो सरकारी परिसर के भीतर निजी होटल का संचालन आखिर किसके आदेश पर हो रहा है—यह बड़ा सवाल बना हुआ है।
पार्किंग से वसूली, शासन को शून्य लाभ
तहसील परिसर की पार्किंग में प्रतिदिन सैकड़ों वाहनों से शुल्क वसूला जाता है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि इस वसूली की राशि का कोई हिस्सा सरकारी खजाने में जमा हो रहा है या नहीं। न तो विधिवत रसीद दी जाती है, न ही ठेके या लेखा-जोखे का कोई सार्वजनिक रिकॉर्ड उपलब्ध है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर यह पैसा जा कहाँ रहा है।
प्रशासनिक संरक्षण या लापरवाही?
होटल, पार्किंग और एटीएम—तीनों निजी प्रतिष्ठान एक ही सरकारी तहसील परिसर के भीतर संचालित हो रहे हैं और किसी को यह स्पष्ट जानकारी नहीं है कि इन्हें अनुमति किसने दी। यह स्थिति केवल लापरवाही नहीं, बल्कि प्रशासनिक संरक्षण में चल रही एक समानांतर अर्थव्यवस्था की आशंका को भी जन्म देती है।
अब निगाहें तहसीलदार पर
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या तहसीलदार इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराएंगे? क्या सभी टेंडर, अनुबंध और राजस्व वसूली की निष्पक्ष ऑडिट होगी, या फिर यह मामला भी फाइलों में दबा दिया जाएगा? क्योंकि यह साफ है कि तहसील परिसर में वर्षों से लाखों रुपये की कमाई हो रही है, जबकि सरकार को कोई स्पष्ट लाभ नहीं मिल रहा। यह केवल भ्रष्टाचार का मामला नहीं, बल्कि सरकारी संपत्ति की खुली लूट का गंभीर आरोप है।