बिलासपुर / दुर्ग / शौर्यपथ /
छत्तीसगढ़ के एक नगर निगम से जुड़ा बेहद चौंकाने वाला और नजीर बन सकने वाला मामला अब छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के दरवाजे तक पहुँच गया है। नगर निगम कमिश्नर द्वारा एक कर्मचारी के विरुद्ध की गई अनुशासनात्मक कार्यवाही को लेकर दायर रिट याचिका पर हाई कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए फिलहाल पूरी कार्यवाही पर रोक लगा दी है।
मामले की सुनवाई जस्टिस पी.पी. साहू की एकलपीठ में हुई। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने जांच प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए कहा कि जांच अधिकारी ने आरोपों को साबित करने के लिए आरोप पत्र में दर्ज किसी भी गवाह से पूछताछ तक नहीं की, फिर भी दंड प्रस्तावित कर दिया गया, जो न्यायसंगत प्रक्रिया पर प्रश्नचिन्ह लगाता है।
याचिकाकर्ता कर्मचारी की ओर से आरोप लगाया गया कि उससे निजी कार्य कराए गए, जैसे—
लाल अंगूर लाने,
10 किलो जांफुल चावल खरीदने,
धुरंधर फिल्म की कॉर्नर सीट की टिकट दिलाने,
तथा घरों में विभिन्न निजी व्यवस्थाएँ कराने जैसे निर्देश दिए गए।
आरोप यह भी है कि जब कर्मचारी ने इन आदेशों को लेकर असहमति जताई, तो उसके विरुद्ध नौकरी से बाहर करने की तैयारी शुरू कर दी गई।
याचिका में बताया गया कि जांच अधिकारी ने बिना ठोस साक्ष्य और बिना किसी गवाह के बयान लिए सीधे दंड प्रस्तावित कर दिया, जो न केवल प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है, बल्कि कर्मचारी को पूर्वाग्रहपूर्ण तरीके से प्रताड़ित करने जैसा है।
कोर्ट ने यह भी माना कि जांच अधिकारी द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया गंभीर सवाल खड़े करती है, क्योंकि जांच रिपोर्ट में केवल आरोपों का उल्लेख है, उन्हें प्रमाणित करने का कोई वैधानिक प्रयास नहीं किया गया।
हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता के खिलाफ जारी अनुशासनात्मक कार्यवाही पर अगली सुनवाई तक रोक लगाते हुए सभी पक्षकारों को नोटिस जारी किया है।
कोर्ट ने नगर निगम कमिश्नर सहित राज्य शासन को तीन सप्ताह के भीतर जवाब पेश करने के निर्देश दिए हैं।
मामले की अगली सुनवाई 23 फरवरी को निर्धारित की गई है।
याचिकाकर्ता ने नगर निगम कमिश्नर द्वारा 18 सितंबर 2025 को जारी आरोप पत्र तथा दुर्ग नगर निगम के आयुक्त द्वारा 6 अक्टूबर 2026 को प्रस्तुत जांच रिपोर्ट को भी चुनौती दी है। याचिका में यह भी उल्लेख है कि कर्मचारी की नियुक्ति 8 अगस्त 2014 को चपरासी पद पर हुई थी तथा बाद में 21 नवंबर 2019 को उसे सहायक ग्रेड-3 के पद पर पदोन्नति मिली, इसके बावजूद बिना विभागीय पदोन्नति समिति की अनुशंसा के उसे निलंबित कर दिया गया।
अब यह मामला न केवल एक कर्मचारी की सेवा शर्तों का, बल्कि प्रशासनिक सत्ता, निजी आदेशों और जांच प्रक्रिया की निष्पक्षता पर भी बड़ा सवाल बनकर सामने आया है।
हाई कोर्ट का यह हस्तक्षेप स्पष्ट संकेत देता है कि “फल-मिठाई की जांच” कानून की कसौटी पर टिक नहीं सकती।