गृह वार्ड में ‘चयनात्मक कार्रवाई’ के आरोप: क्या दुर्ग में अतिक्रमण नीति सबके लिए समान है?
दुर्ग।
शासन-प्रशासन जब किसी शासकीय अधिकारी पर पद के दुरुपयोग का आरोप पाता है, तो निलंबन और बर्खास्तगी जैसी कड़ी कार्रवाइयाँ दिखाई देती हैं। सुशासन की दुहाई दी जाती है। लेकिन सवाल तब उठता है जब यही कसौटी जनप्रतिनिधियों पर लागू होती नहीं दिखती। दुर्ग नगर पालिका निगम के वार्ड क्रमांक 59—जो स्वयं महापौर श्रीमती अलका बाघमार का गृह वार्ड है—में हालिया अतिक्रमण कार्रवाई को लेकर भेदभावपूर्ण व्यवहार के गंभीर आरोप सामने आए हैं।
वार्ड में एक ऐसी दुकान पर कार्रवाई की गई, जिसके संबंध में न तो यातायात अवरोध की शिकायतें थीं और न ही सड़क जाम जैसी स्थिति। दुकान संचालक रोहित जैन का आरोप है कि महापौर के पदभार ग्रहण करने के बाद से ही उन पर निजी द्वेष के तहत लगातार दबाव बनाया जा रहा है। उनका कहना है कि बीते 6–7 महीनों से विभिन्न नीतिगत हथकंडों के जरिए दुकान खाली कराने का प्रयास हो रहा है, यहाँ तक कि खुले तौर पर कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई।
बुधवार, 21 जनवरी, को नगर निगम की टीम ने दुकान के सामने सड़क से काफी दूरी पर लगे शेड को अतिक्रमण बताकर तोड़ने की कार्रवाई की। हैरानी इस बात की है कि इसी दौरान शहर के कई अन्य इलाकों में स्पष्ट और प्रत्यक्ष अतिक्रमण प्रशासन की निगाहों से ओझल बने रहे।
स्थानीय लोगों के अनुसार,
महापौर निवास कार्यालय से मात्र 100 मीटर दूर साईं द्वार के पास बढ़ता अतिक्रमण,
चर्च रोड का अवैध बाजार,
समृद्धि बाजार के सामने हालिया कब्जे,
और गणेश मंदिर के सामने सड़क पर कब्जा कर संचालित राम रसोई—
इन सब पर कोई सख्त कार्रवाई न होना कई सवाल खड़े करता है।
आरोप यह भी है कि सड़क पर कब्जा कर राम रसोई चलाने वाले व्यापारी को निगम की प्रेस विज्ञप्ति में ‘समाजसेवी’ बताकर प्रस्तुत किया गया, जबकि नियमों का उल्लंघन प्रत्यक्ष है। यदि अतिक्रमण वास्तव में जनहित और यातायात के आधार पर हटाया जाना है, तो नीति सबके लिए समान क्यों नहीं दिखती?
यह पूरा प्रकरण केवल एक दुकान या एक वार्ड तक सीमित नहीं रह जाता। यह नगर निगम की कार्यप्रणाली, प्रशासनिक मुखिया सुमित अग्रवाल और जनप्रतिनिधि नेतृत्व की निष्पक्षता पर सीधा प्रश्नचिह्न लगाता है। शहर के विकास के दावे तब खोखले प्रतीत होते हैं, जब कार्रवाई चयनात्मक और व्यक्तिगत पसंद-नापसंद के आधार पर होती दिखाई दे।
राज्य में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की सरकार सुशासन की बात करती है। ऐसे में दुर्ग नगर निगम में सामने आ रही यह तस्वीर कहीं सरकार के लिए “काला अध्याय” न बन जाए—यह चिंता स्वाभाविक है। शहर की जनता आज यही पूछ रही है:
क्या कानून केवल कुछ के लिए है, या सबके लिए समान?
यदि जवाब दूसरा है, तो फिर निष्पक्ष, पारदर्शी और नियमसम्मत कार्रवाई की शुरुआत गृह वार्ड से क्यों नहीं होती?