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तहसील परिसर में संचालित त्रिमूर्ति होटल व वाहन पार्किंग की वैधता पर उठे गंभीर प्रश्न, नोटिस की समय-सीमा समाप्त, दस्तावेजों का इंतज़ार जारी Featured

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दुर्ग। शौर्यपथ विशेष /
तहसील कार्यालय परिसर में “तहसील बाबू संघ” के नाम से संचालित त्रिमूर्ति होटल एवं वाहन पार्किंग की वैधता को लेकर कई गंभीर प्रश्न सामने आए हैं। आश्चर्य की बात यह है कि तहसील में वर्तमान में कार्यरत लगभग 12 से 14 बाबुओं में से अधिकांश को भी यह जानकारी नहीं है कि उक्त होटल और वाहन पार्किंग से प्राप्त किराया राशि आखिर किस संघ या किस खाते में जा रही है।
विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार वर्षों पूर्व तहसील बाबू संघ के लिए कैंटीन संचालन की अनुमति दी गई थी, किंतु वर्तमान परिस्थितियों में न तो उस संघ की स्पष्ट जानकारी उपलब्ध है और न ही संचालन से जुड़े दस्तावेजों की स्थिति स्पष्ट हो पाई है। इस विषय को हमारे समाचार पत्र द्वारा प्रमुखता से प्रकाशित किए जाने के बाद माननीय कलेक्टर महोदय ने मामले को संज्ञान में लिया, जिसके पश्चात तहसीलदार दुर्ग द्वारा संबंधित संचालकों को आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत करने हेतु नोटिस जारी किया गया।
उल्लेखनीय है कि नोटिस की निर्धारित समय-सीमा समाप्त हो चुकी है, किंतु समाचार लिखे जाने तक विभाग को किसी प्रकार का संतोषजनक जवाब या वैध दस्तावेज प्राप्त नहीं हुए हैं। ऐसे में यह प्रश्न और अधिक गंभीर हो जाता है कि क्या किसी पुराने या निष्क्रिय संघ के नाम से वर्तमान समय में भी शासकीय परिसर में होटल और वाहन पार्किंग का संचालन किया जा सकता है।
इसी बीच यह जानकारी भी सामने आ रही है कि इस पूरे मामले में राजनीतिक हस्तक्षेप की संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता। यदि ऐसा है, तो यह विषय केवल एक होटल या पार्किंग तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि शासकीय परिसरों के उपयोग, नियमों की समानता और प्रशासनिक निष्पक्षता से जुड़ा व्यापक प्रश्न बन जाता है।
एक ओर तहसील क्षेत्र में अवैध कब्जों और अतिक्रमण पर सख्त कार्रवाई की बातें की जाती हैं, वहीं दूसरी ओर तहसील कार्यालय परिसर में संचालित गतिविधियों की वैधानिक स्थिति स्पष्ट न होना विभागीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बना हुआ है। विभागीय कर्मचारियों का भी मानना है कि यदि संचालन नियमों के अनुरूप है, तो उसकी प्रक्रिया, टेंडर और स्वीकृति सार्वजनिक व पारदर्शी होनी चाहिए।
प्रदेश सरकार द्वारा सुशासन को जमीनी स्तर पर लागू करने के निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं। ऐसे में यदि शासकीय परिसरों में राजनीतिक पहुंच के आधार पर नियमों से इतर संचालन की स्थिति उत्पन्न होती है, तो यह न केवल प्रशासनिक व्यवस्था बल्कि सरकार की घोषित सुशासन नीति पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि नोटिस की समय-सीमा समाप्त होने के बाद विभाग आगे किस दिशा में कार्रवाई करता है और क्या शासकीय परिसरों के उपयोग को लेकर नियमों का पालन सुनिश्चित किया जाएगा। यह मामला प्रशासनिक पारदर्शिता, जवाबदेही और सुशासन की कसौटी पर एक महत्वपूर्ण परीक्षा के रूप में देखा जा रहा है।

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शौर्यपथ