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दुर्ग बस स्टैंड बना “बेख़ौफ़ कब्ज़ों का अड्डा”, सत्ता सुख में मग्न महापौर बाघमार ! Featured

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दुर्ग। शौर्यपथ।

दुर्ग जिले के सबसे बड़े बस स्टैंड की तस्वीर आज शहर की बदहाल व्यवस्था का आईना बन चुकी है। पार्किंग स्थल से लेकर आसपास के क्षेत्रों तक अव्यवस्था, अवैध कब्जे और आम जनता के साथ दुर्व्यवहार की शिकायतें लगातार बढ़ रही हैं। लेकिन इन सबके बीच दुर्ग नगर निगम की महापौर अलका बाघमार की चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही है।

पार्किंग क्षेत्र में अराजकता, जनता त्रस्त

बस स्टैंड के पार्किंग क्षेत्र में अवैध कब्जाधारियों की भरमार है। वाहन चालकों को व्यवस्थित पार्किंग सुविधा के बजाय अव्यवस्था, विवाद और अतिरिक्त वसूली का सामना करना पड़ रहा है। पार्किंग ठेकेदार के कर्मचारियों द्वारा आम नागरिकों से बदसलूकी की घटनाएँ आम हो चुकी हैं। कई बार विवाद की स्थिति भी बन चुकी है, लेकिन निगम प्रशासन की ओर से ठोस कार्रवाई नदारद है।

“राम रसोई” पर मेहरबानी क्यों?

बस स्टैंड जैसे अति व्यस्त सार्वजनिक स्थल पर संचालित “राम रसोई” के संचालन को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। नगर निगम से हुए अनुबंध के पालन पर प्रश्नचिह्न हैं, फिर भी संचालक चतुर्भुज राठी के साथ मंच साझा करना और निगम की प्रेस विज्ञप्ति में उन्हें समाजसेवी बताना कई तरह की चर्चाओं को जन्म दे रहा है।

क्या यह महज संयोग है, या फिर रसूखदारों के प्रति नरम रवैया?

पिछली सरकार पर ठीकरा कब तक?

महापौर अलका बाघमार बार-बार पिछली सरकार की कमियों को गिनाकर वर्तमान अव्यवस्था को उचित ठहराने की कोशिश करती नजर आती हैं। लेकिन जनता का सवाल साफ है—

अगर पिछली सरकार की नीतियां ही गलत थीं, तो बदलाव के नाम पर मिला जनादेश आखिर किस लिए था?

वित्त आयोग के फंड बनाम जमीनी सच्चाई

हर वर्ष आने वाले वित्त आयोग के फंड को उपलब्धि बताकर प्रचार किया जा रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है। शहर का मुख्य बस स्टैंड, जो जिले की पहचान होना चाहिए, आज बदहाली और अव्यवस्था का प्रतीक बन गया है।

जनता पूछ रही है जवाब

पार्किंग क्षेत्र में फैली अव्यवस्था पर कार्रवाई कब?

अवैध कब्जों पर निगम का बुलडोजर कब चलेगा?

अनुबंध की शर्तों का उल्लंघन करने वालों पर सख्ती क्यों नहीं?

रसूखदारों के साथ मंच साझा करना क्या संदेश देता है?

आज दुर्ग की जनता अव्यवस्था, विवाद और अवैध कब्जों के बीच पिस रही है। सवाल यह नहीं कि समस्या है—सवाल यह है कि समस्या पर कार्रवाई कब होगी?

महापौर अलका बाघमार को अब यह तय करना होगा कि वे जनता के जनादेश के प्रति जवाबदेह बनेंगी या फिर सत्ता के सुख में ही व्यस्त रहेंगी।

कटाक्ष यही है—

“शहर बदहाल है, पर सत्ता खुशहाल है!”

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