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चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर सुप्रीम कोर्ट सख्त “जब फैसला 2:1 से तय है तो निष्पक्षता कहाँ?” — CEC नियुक्ति कानून पर केंद्र से तीखे सवाल

  • rounak group

 

नई दिल्ली/शौर्यपथ।
देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की संवैधानिक व्यवस्था को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार 14 मई 2026 को केंद्र सरकार से बेहद कड़े सवाल पूछे। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति संबंधी मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने चयन समिति की वर्तमान संरचना पर गंभीर चिंता जताई।

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने साफ कहा कि चुनाव आयोग केवल स्वतंत्र होना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि जनता के सामने उसका स्वतंत्र दिखना भी उतना ही आवश्यक है। अदालत ने केंद्र सरकार से पूछा कि जब चयन समिति में प्रधानमंत्री और उनके द्वारा नामित कैबिनेट मंत्री शामिल हैं, तब विपक्ष के नेता की मौजूदगी केवल “औपचारिकता” बनकर क्यों रह जाती है?


“स्वतंत्रता का दिखावा क्यों?”

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि तीन सदस्यीय चयन समिति में दो सदस्य सीधे कार्यपालिका से जुड़े हैं। ऐसे में हर निर्णय 2:1 के बहुमत से सरकार के पक्ष में जाने की संभावना बनी रहती है।

पीठ ने टिप्पणी की कि कोई भी कैबिनेट मंत्री प्रधानमंत्री के निर्णय के खिलाफ जाने की स्थिति में शायद ही दिखाई देगा। अदालत ने पूछा कि फिर विपक्ष के नेता को शामिल कर “स्वतंत्रता का दिखावा” क्यों किया जा रहा है?


“समिति में एक भी निष्पक्ष सदस्य क्यों नहीं?”

अदालत ने अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी से सवाल किया कि इतनी महत्वपूर्ण संवैधानिक नियुक्ति प्रक्रिया में एक भी पूर्णतः निष्पक्ष या न्यूट्रल सदस्य क्यों नहीं रखा गया।

सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई निदेशक की नियुक्ति प्रक्रिया का उदाहरण देते हुए कहा कि जब वहां चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को शामिल किया जा सकता है, तो चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की नियुक्ति प्रक्रिया में उन्हें बाहर क्यों रखा गया?


“कार्यपालिका का वर्चस्व लोकतंत्र के लिए चिंता”

पीठ ने कहा कि वर्तमान व्यवस्था में “Executive Veto” यानी कार्यपालिका का स्पष्ट वर्चस्व दिखाई देता है। इससे विपक्ष के नेता की भूमिका केवल सजावटी (Ornamental) बनकर रह जाती है।

सुप्रीम कोर्ट ने याद दिलाया कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संविधान के Basic Structure यानी मूल ढांचे का हिस्सा हैं। ऐसे में चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया पर जनता का भरोसा सर्वोच्च महत्व रखता है।


केंद्र सरकार की दलील पर कोर्ट असंतुष्ट

केंद्र सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल ने दलील दी कि किसी चुनाव आयुक्त की निष्पक्षता को उसकी नियुक्ति प्रक्रिया से नहीं, बल्कि पद पर रहते हुए उसके कार्यों और निर्णयों से आंका जाना चाहिए।

हालांकि कोर्ट इस तर्क से संतुष्ट नहीं दिखा। पीठ ने स्पष्ट कहा कि निष्पक्षता और स्वतंत्रता की शुरुआत नियुक्ति प्रक्रिया से ही होनी चाहिए, क्योंकि वही संस्था की विश्वसनीयता की नींव तय करती है।


मूल दस्तावेज तलब, 19 मई को अगली सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2024 में इसी कानून के तहत हुए ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू की नियुक्तियों से जुड़े खोज और चयन प्रक्रिया के मूल रिकॉर्ड अदालत में पेश करने के निर्देश दिए हैं।

मामले की अगली सुनवाई 19 मई 2026 को होगी, जिसमें सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता केंद्र सरकार की ओर से आगे की दलीलें पेश करेंगे।


संवैधानिक विशेषज्ञों की नजर में अहम मामला

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता और जनता के भरोसे से भी जुड़ा हुआ है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों ने इस बहस को और गंभीर बना दिया है कि क्या संवैधानिक संस्थाओं की नियुक्तियों में कार्यपालिका का प्रभाव सीमित होना चाहिए।

अब देश की निगाहें 19 मई की सुनवाई पर टिकी हैं, जहाँ यह तय हो सकता है कि चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया में भविष्य में क्या बदलाव संभव हैं।

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शौर्यपथ