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“15 महीनों में बढ़ा विवादों का ग्राफ… क्या दुर्ग की ‘शहर सरकार’ अविश्वास की दहलीज की ओर?” प्रोटोकॉल विवाद से पुलिस एंट्री तक… सत्ता पक्ष के भीतर उठती नाराज़गी ने बढ़ाए राजनीतिक संकेत Featured

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दुर्ग। शौर्यपथ विशेष 
दुर्ग नगर पालिक निगम की महापौर अलका बाघमार के कार्यकाल को 1 मार्च 2025 से वर्तमान समय तक लगभग 15 माह पूर्ण होने जा रहे हैं। लेकिन इन 15 महीनों में जिस तरह विवाद, प्रशासनिक टकराव, संगठनात्मक असंतोष और जनसुविधाओं से जुड़े प्रश्न लगातार सामने आए हैं, उसने अब राजनीतिक गलियारों में एक नए शब्द को जन्म दे दिया है — “अविश्वास”।
हालांकि प्रत्यक्ष प्रणाली से चुनी गई महापौर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए अभी वैधानिक रूप से लगभग 9 माह का समय शेष है, किंतु नगर निगम की सामान्य सभा से लेकर भाजपा संगठन और वार्ड स्तर तक जिस प्रकार की चर्चा दिखाई दे रही है, उसने यह संकेत अवश्य दे दिया है कि शहर सरकार की कार्यप्रणाली अब केवल विपक्ष ही नहीं, बल्कि सत्ता पक्ष के भीतर भी सवालों के घेरे में है।
विवादों की वह श्रृंखला जिसने बढ़ाई राजनीतिक बेचैनी
महापौर के कार्यकाल में कई ऐसे मुद्दे सामने आए जिन्हें लेकर लगातार जनचर्चा बनी रही।
अवैध रूप से संचालित बताए जा रहे “राम रसोई” प्रकरण में कार्रवाई को लेकर उठे प्रश्न।
सड़क पर अतिक्रमण और होटल संचालन संबंधी शिकायतों के बावजूद कठोर कदम नहीं उठाने के आरोप।
चर्चगेट क्षेत्र के सामने कथित अवैध बाजार संचालन पर प्रशासनिक नरमी की चर्चा।
सफाई व्यवस्था को लेकर निगम प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के बीच टकराव।
सत्ता पक्ष के ही वार्डों में सफाई प्रभावित होने के आरोप।
अधिकारियों के साथ समन्वय की कमी और सार्वजनिक विवाद की स्थितियां।
शहर के मध्य क्षेत्र में बदबू और स्वच्छता संकट पर कथित निष्क्रियता।
वार्ड विकास कार्यों के आवंटन में भेदभाव के आरोप।
संगठन, मंत्री और पार्षदों के बीच तालमेल की कमी।
    इन सबके बीच सामान्य सभा की बैठक में सत्ता पक्ष के दो दर्जन से अधिक पार्षदों द्वारा अपनी ही सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाना राजनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
स्थिति तब और चर्चा में आ गई जब सामान्य सभा के सभापति द्वारा भी यह टिप्पणी सामने आई कि कार्यप्रणाली से भारतीय जनता पार्टी की छवि प्रभावित हो रही है।
प्रोटोकॉल बैठक में पुलिस की एंट्री ने बढ़ाई अटकलें
हाल ही में जल संसाधन विभाग के अधिकारियों की प्रोटोकॉल संबंधी बैठक के दौरान दो थाना प्रभारी और नगर पुलिस अधीक्षक स्तर के अधिकारियों की निगम परिसर में उपस्थिति ने राजनीतिक चर्चाओं को और तेज कर दिया।
क्योंकि:
वहां कोई आंदोलन नहीं था,
न ही विरोध प्रदर्शन की स्थिति थी,
न कोई कानून व्यवस्था संकट सार्वजनिक रूप से दिखाई दे रहा था।
ऐसे में सवाल उठने लगे कि आखिर इतनी पुलिस फोर्स निगम परिसर तक क्यों पहुंची?
क्या यह केवल प्रोटोकॉल था या प्रशासनिक अविश्वास का कोई संकेत?
शहर की राजनीतिक फिज़ा में यह घटना “आग में घी” डालने जैसी साबित हुई।
अब चर्चा क्यों हो रही है ‘अविश्वास प्रस्ताव’ की?
राजनीति संभावनाओं पर चलती है।
और जब सत्ता पक्ष के भीतर ही असंतोष की फुसफुसाहट सुनाई देने लगे, तब राजनीतिक समीकरणों की चर्चा स्वाभाविक हो जाती है।
यद्यपि वर्तमान में कानूनी रूप से अविश्वास प्रस्ताव तुरंत संभव नहीं है, लेकिन निगम की आंतरिक परिस्थितियों और बढ़ते असंतोष ने इस विषय को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
कई भाजपा नेता और पार्षद अब दबी जुबान में यह स्वीकार करते नजर आते हैं कि यदि कार्यप्रणाली में सुधार नहीं हुआ, तो आने वाले समय में यह केवल निगम तक सीमित मुद्दा नहीं रहेगा, बल्कि विधानसभा चुनावों तक इसका असर दिखाई दे सकता है।
क्योंकि आम जनता प्रशासनिक और राजनीतिक जिम्मेदारियों की तकनीकी सीमाओं को नहीं देखती —
उसे केवल सड़क, सफाई, बदबू, अतिक्रमण और व्यवस्था का अनुभव दिखाई देता है।
और उसका सीधा राजनीतिक मूल्यांकन सत्ता पक्ष से जुड़ जाता है।
क्या कहता है कानून? — महापौर को हटाने के वैधानिक रास्ते
छत्तीसगढ़ नगरीय निकाय कानूनों के अनुसार प्रत्यक्ष प्रणाली से चुने गए महापौर को हटाने के मुख्यतः दो संवैधानिक रास्ते हैं:
1. पार्षदों द्वारा अविश्वास प्रस्ताव
इसके लिए:
महापौर के पदग्रहण के शुरुआती 2 वर्षों तक अविश्वास प्रस्ताव नहीं लाया जा सकता।
कुल निर्वाचित पार्षदों के कम से कम 1/3 हस्ताक्षर आवश्यक होते हैं।
कलेक्टर विशेष बैठक बुलाते हैं।
बैठक में 3/4 पार्षदों की उपस्थिति आवश्यक होती है।
प्रस्ताव पारित करने के लिए उपस्थित एवं मतदान करने वाले पार्षदों के 2/3 बहुमत की आवश्यकता होती है, जो कुल निर्वाचित सदस्यों के आधे से अधिक होना चाहिए।
अर्थात यह केवल राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि अत्यंत कठिन और संख्या-आधारित संवैधानिक प्रक्रिया है।
2. राज्य सरकार द्वारा बर्खास्तगी
अधिनियम की धारा 19-B के तहत राज्य सरकार विशेष परिस्थितियों में महापौर को पद से हटा सकती है।
इसके आधार हो सकते हैं:
कर्तव्यों में गंभीर लापरवाही,
पद के दुरुपयोग के आरोप,
भ्रष्टाचार या दुराचरण,
वैधानिक दायित्वों का उल्लंघन।
हालांकि इससे पहले सरकार को कारण बताओ नोटिस जारी कर सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य होता है।
राजनीतिक संदेश क्या है?
दुर्ग नगर निगम की वर्तमान परिस्थितियां यह संकेत दे रही हैं कि केवल विपक्ष ही नहीं, बल्कि सत्ता पक्ष के भीतर भी संवाद और समन्वय की चुनौती बढ़ रही है।
यदि आने वाले महीनों में:
संगठन और निगम प्रशासन के बीच तालमेल नहीं सुधरा,
पार्षदों की नाराज़गी कम नहीं हुई,
जनसुविधाओं से जुड़े मुद्दों पर ठोस परिणाम नहीं आए,
तो यह मामला केवल निगम की सीमाओं तक सीमित नहीं रहेगा।
शहरी सरकार की कार्यप्रणाली का सीधा असर आने वाले विधानसभा चुनावों और भविष्य के निगम चुनावों पर भी दिखाई दे सकता है।
और यही कारण है कि आज दुर्ग की राजनीति में सबसे ज्यादा चर्चा किसी विकास योजना की नहीं, बल्कि एक प्रश्न की हो रही है —
“क्या शहर सरकार के भीतर ही अविश्वास की नींव पड़ चुकी है?”

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