विस्थापन के नाम पर आवंटन, फिर किराए और बिक्री का खेल! बाजार विभाग को सब पता, फिर भी कार्रवाई शून्य
दुर्ग नगर निगम का गुमटी आवंटन मामला: भ्रष्टाचार की फाइलों में दबा सच या कार्रवाई से बचते जिम्मेदार?
दुर्ग / शौर्यपथ विशेष /
दुर्ग नगर निगम क्षेत्र में पूर्ववर्ती कांग्रेस शासनकाल के दौरान जिला अस्पताल परिसर के सामने और चर्चगेट मार्ग पर एनयूएलएम विभाग के माध्यम से गुमटियों का आवंटन किया गया था। उस समय इसे स्ट्रीट वेंडरों के पुनर्वास और शहर की यातायात व्यवस्था को व्यवस्थित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया गया था। मगर आज वही योजना गंभीर सवालों के घेरे में खड़ी दिखाई दे रही है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि गुमटी आवंटन के दौरान लाखों रुपये के कथित लेनदेन का कोई स्पष्ट रिकॉर्ड आखिर निगम प्रशासन के पास क्यों नहीं है? यदि राशि ली गई थी तो वह किस मद में जमा हुई, किस खाते में गई और उसका लेखा-जोखा कहां है? यह सवाल आज भी जवाब मांग रहा है।
विस्थापन के नाम पर दुकान, फिर किराए और बिक्री का खेल
शासन की मंशा स्पष्ट थी कि जिन स्ट्रीट वेंडरों को पुनर्वास के तहत गुमटी दी जाए, वे स्वयं उसका संचालन करें ताकि सड़क किनारे अतिक्रमण कम हो और यातायात व्यवस्था बेहतर बने। मगर वर्तमान स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत नजर आती है।
कई ऐसे मामले सामने आ रहे हैं जहां गुमटी आवंटन प्राप्त करने वाले व्यक्ति आज भी सड़कों पर व्यवसाय कर रहे हैं, जबकि आवंटित गुमटियां किराए पर चल रही हैं या कथित रूप से बेची जा चुकी हैं। यदि ऐसा है तो यह योजना की मूल भावना के साथ सीधा खिलवाड़ नहीं तो और क्या है?
जानकारी होने के बाद भी कार्रवाई क्यों नहीं?
सबसे आश्चर्यजनक पहलू यह है कि नगर निगम के बाजार विभाग को इन शिकायतों और दस्तावेजों की जानकारी होने के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई दिखाई नहीं देती।
बाजार अधिकारी अभ्युदय मिश्रा और बाजार प्रभारी शेखर चंद्राकर की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि दस्तावेज सामने आने के बाद भी जांच या निरस्तीकरण जैसी कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई।
जिम्मेदारी पिछली सरकार की या वर्तमान प्रशासन की?
इस मामले पर चर्चा के दौरान बाजार प्रभारी द्वारा जिम्मेदारी पूर्ववर्ती सरकार पर डाले जाने की बात सामने आई। लेकिन सवाल यह है कि यदि भ्रष्टाचार पूर्व सरकार के समय हुआ था, तो वर्तमान व्यवस्था का दायित्व क्या है?
आखिर जनता ने नई शहरी सरकार को इसलिए चुना था कि पुरानी व्यवस्थाओं की खामियां दूर हों, न कि उन्हें फाइलों में दबाकर छोड़ दिया जाए।
महापौर और आयुक्त के सामने बड़ी चुनौती
शहर की प्रथम नागरिक महापौर अलका बाघमार लगातार विकास कार्यों और नई परियोजनाओं की बात करती रही हैं। वहीं निगम आयुक्त सुमित अग्रवाल प्रशासनिक पारदर्शिता और सुशासन के पक्षधर माने जाते हैं।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या गुमटी आवंटन से जुड़े दस्तावेजों और आरोपों की निष्पक्ष जांच कराई जाएगी? क्या अवैध रूप से किराए पर दी गई अथवा बेची गई गुमटियों के आवंटन निरस्त होंगे? और क्या लाखों रुपये के कथित लेनदेन की जांच होगी?
शौर्यपथ का सवाल
यदि दस्तावेज मौजूद हैं, यदि अनियमितताओं की जानकारी अधिकारियों को है, यदि नियमों का उल्लंघन स्पष्ट दिखाई दे रहा है, तो फिर कार्रवाई में देरी क्यों?
दुर्ग की जनता जानना चाहती है कि आखिर गुमटी आवंटन योजना गरीब और जरूरतमंद स्ट्रीट वेंडरों के पुनर्वास के लिए थी या फिर कुछ लोगों के लिए कमाई का जरिया बन गई?
अब निगाहें महापौर, आयुक्त और नगर निगम प्रशासन पर टिकी हैं। देखना यह है कि यह मामला भी अन्य फाइलों की तरह धूल खाता रहेगा या फिर भ्रष्टाचार और अनियमितताओं पर वास्तव में कोई कठोर कार्रवाई होगी।
कटाक्ष
"विकास के दावे बुलंद हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या भ्रष्टाचार की फाइलें भी विकास की चमक में कहीं दब तो नहीं गईं?"