दुर्ग। जिले में पिछले कुछ महीनों के दौरान अवैध गुटखा निर्माण और नशीले पदार्थों से जुड़े अवैध कारोबारों के खिलाफ पुलिस प्रशासन ने जिस सक्रियता और तत्परता का परिचय दिया है, उसने एक ओर कानून व्यवस्था के प्रति पुलिस की प्रतिबद्धता को सामने रखा है, वहीं दूसरी ओर खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग की कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
ताजा मामला ग्राम जेवरा का है, जहां पुलिस ने अवैध गुटखा निर्माण से जुड़े एक बड़े नेटवर्क का पर्दाफाश करते हुए मशीनें, कच्चा माल और अन्य सामग्री जब्त की है। इससे पहले अंडा थाना क्षेत्र में वाशिंग पाउडर निर्माण की आड़ में संचालित अवैध गुटखा फैक्ट्री का भी खुलासा हो चुका है। इन कार्रवाइयों ने यह साबित किया है कि जिले में अवैध गुटखा कारोबार केवल छोटे स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि संगठित तरीके से संचालित हो रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब पुलिस लगातार ऐसे मामलों का खुलासा कर रही है, तब खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग की निगरानी व्यवस्था आखिर कहां है? जिले में विभाग की जिम्मेदारी वरिष्ठ अधिकारियों के नेतृत्व में संचालित है, लेकिन अब तक जिन मामलों का खुलासा पुलिस ने किया, उनमें विभाग की कोई उल्लेखनीय भूमिका सामने नहीं आई।
जानकार बताते हैं कि कुछ समय पूर्व खाद्य एवं औषधि प्रशासन की केंद्रीय टीम भी दुर्ग पहुंची थी, लेकिन उसके बाद भी किसी बड़ी अवैध गुटखा फैक्ट्री पर विभागीय स्तर पर प्रभावी कार्रवाई सामने नहीं आई। इसके विपरीत पुलिस लगातार अवैध कारोबारियों तक पहुंच रही है और कार्रवाई को अंजाम तक पहुंचा रही है।
पुराने मामलों की फाइलों में दबे सवाल
कोनारी में पूर्व में हुई कार्रवाई के बाद आगे क्या हुआ, इसकी स्पष्ट जानकारी आज तक सार्वजनिक नहीं हो सकी। नगपुरा क्षेत्र के पास भी अवैध गुटखा निर्माण सामग्री बड़ी मात्रा में मिलने का मामला सामने आया था, लेकिन परिसर खाली मिलने के बाद आगे की कार्रवाई किस दिशा में बढ़ी, यह भी आज तक स्पष्ट नहीं हो पाया।
इसी प्रकार वर्षों पहले मोहन नगर थाना क्षेत्र में बड़ी मात्रा में कथित रूप से अवैध "सितार गुटखा" पकड़ा गया था। उस समय पुलिस की कार्रवाई के बाद उम्मीद थी कि मामले में कठोर कदम उठाए जाएंगे, लेकिन बाद में विभागीय जांच रिपोर्ट में सामग्री को वैध बताते हुए उसे वापस सौंपे जाने की चर्चा लंबे समय तक होती रही। यह मामला आज भी प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है।
वहीं करोड़ों रुपये के चर्चित जीएसटी प्रकरण में भी कुछ नाम सामने आए थे, लेकिन उन मामलों की वर्तमान स्थिति क्या है, यह भी आम जनता की जानकारी से दूर है। इससे यह धारणा मजबूत होती जा रही है कि कई बड़े मामलों की जांच और कार्रवाई फाइलों तक सीमित होकर रह जाती है।
त्योहारी सीजन में मिठाइयों पर सख्ती, लेकिन नशा परोसने वालों पर नरमी क्यों?
हर वर्ष त्योहारी सीजन के दौरान खाद्य विभाग बाजारों में मिठाई, नमकीन और खाद्य सामग्री की जांच अभियान चलाता है। यह कार्रवाई आवश्यक भी है, लेकिन नागरिकों का सवाल है कि जब युवाओं और समाज के स्वास्थ्य को सीधे प्रभावित करने वाले अवैध गुटखा कारोबार की बात आती है, तब विभाग की सक्रियता उसी स्तर पर क्यों दिखाई नहीं देती?
जब पुलिस लगातार अवैध गुटखा फैक्ट्रियों तक पहुंच रही है, मशीनें जब्त कर रही है और नेटवर्क का खुलासा कर रही है, तब संबंधित विभाग का केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित दिखाई देना स्वाभाविक रूप से प्रश्नों को जन्म देता है।
पुलिस की सक्रियता बनी उम्मीद
वर्तमान में जिले में पुलिस प्रशासन द्वारा की जा रही लगातार कार्रवाई ने यह संदेश दिया है कि यदि इच्छाशक्ति हो तो अवैध कारोबारों तक पहुंचना और उन पर प्रभावी प्रहार करना संभव है। जेवरा और अंडा जैसे मामलों ने यह साबित कर दिया है कि अवैध गुटखा कारोबार पर अंकुश लगाया जा सकता है।
अब आवश्यकता इस बात की है कि खाद्य एवं औषधि प्रशासन भी उतनी ही गंभीरता और जवाबदेही के साथ मैदान में उतरे। केवल नमूने लेने और कागजी प्रक्रिया पूरी करने से समस्या का समाधान नहीं होगा। अवैध गुटखा निर्माण, भंडारण और वितरण के पूरे नेटवर्क को ध्वस्त करने के लिए विभागीय स्तर पर भी ठोस, पारदर्शी और परिणामकारी कार्रवाई जरूरी है।
बड़ा सवाल
जब पुलिस प्रशासन लगातार अवैध गुटखा कारोबारियों तक पहुंच रहा है, तो क्या खाद्य एवं औषधि प्रशासन की जिम्मेदारी केवल कार्रवाई के बाद दस्तावेज तैयार करने तक सीमित रह गई है?
दुर्ग की जनता अब जवाब चाहती है। क्योंकि यह मामला केवल कानून उल्लंघन का नहीं, बल्कि युवाओं के भविष्य, सार्वजनिक स्वास्थ्य और प्रशासनिक जवाबदेही से भी जुड़ा हुआ है।