महापौर अलका बाघमार और मंत्री गजेंद्र यादव के नेतृत्व वाले सत्ता तंत्र पर उठे सवाल—कर्मचारियों को वेतन के लिए इंतजार, ठेकेदार भुगतान के लिए परेशान, विकास का पहिया आखिर कैसे चले?
दुर्ग। दुर्ग नगर निगम में प्रशासनिक व्यवस्था इन दिनों ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है, जहां आयुक्त की नियुक्ति हो चुकी है, लेकिन आयुक्त की कुर्सी अब भी खाली है। लगभग डेढ़ महीने से अधिक समय से निगम में स्थायी प्रशासनिक मुखिया का अभाव और करीब 10 दिन पहले आईएएस अधिकारी सुश्री लीना कोसम की आयुक्त के रूप में नियुक्ति के बावजूद उनका अब तक पदभार ग्रहण न करना, निगम की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
निगम में फिलहाल प्रभारी आयुक्त के रूप में मोहन्द्र साहू जिम्मेदारी संभाल रहे हैं, लेकिन महत्वपूर्ण प्रशासनिक एवं नीतिगत निर्णयों के मामले में उनके स्तर पर भी स्वाभाविक रूप से सीमाएं दिखाई दे रही हैं। परिणाम यह है कि निगम के कई काम उस गति से आगे नहीं बढ़ पा रहे, जिसकी उम्मीद शहरवासियों को ‘सुशासन’ और विकास के दावों के बीच है।
त्योहार आया, वेतन के लिए इंतजार करना पड़ा
पिछले माह त्योहारों के दौरान निगम कर्मचारियों को वेतन भुगतान में परेशानी का सामना करना पड़ा। कर्मचारियों को वेतन दिलाने के लिए प्रभारी आयुक्त को निर्देशित किया गया, जिसके बाद देर से ही सही, भुगतान किया गया। लेकिन सवाल यह है कि त्योहारों के समय निगम के कर्मचारियों को अपने ही वेतन के लिए इंतजार क्यों करना पड़े?
एक तरफ कर्मचारी समय पर वेतन की उम्मीद लगाए बैठे हैं, दूसरी तरफ निगम के विकास कार्यों की रीढ़ माने जाने वाले ठेकेदारों के भुगतान को लेकर भी स्थिति चिंताजनक बताई जा रही है।
ठेकेदारों का भुगतान अटका तो विकास की रफ्तार पर भी असर
शहर में सड़क, नाली, भवन, सफाई, प्रकाश व्यवस्था और अन्य विकास कार्यों को जमीन पर उतारने में ठेकेदारों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में यदि पिछले डेढ़-दो महीने से ठेकेदारों के भुगतान लंबित हैं, तो इसका सीधा असर उनके आर्थिक संचालन और नए कामों की गति पर पड़ना स्वाभाविक है।
कागजों में विकास की योजनाएं और दावे भले ही लगातार दर्ज होते रहें, लेकिन जब भुगतान का पहिया रुक जाए तो जमीन पर विकास की रफ्तार आखिर कैसे तेज होगी?
खास बात यह है कि अब फिर त्योहारों का दौर सामने है। तीज-पोरा और गणेश चतुर्थी जैसे महत्वपूर्ण पर्व नजदीक हैं। ऐसे समय में यदि निगम के ठेकेदारों के लंबित भुगतान का समाधान नहीं होता, तो एक बार फिर त्योहारी सीजन उनके लिए आर्थिक दबाव लेकर आ सकता है।
जनप्रतिनिधियों के त्योहारों में रंग, कर्मचारी-ठेकेदारों के हिस्से में इंतजार?
यही वह बिंदु है जहां निगम की राजनीतिक व्यवस्था पर भी सवाल खड़े होते हैं। दुर्ग नगर निगम में भाजपा की सरकार है और महापौर अलका बाघमार हैं। दुर्ग विधानसभा क्षेत्र के विधायक गजेंद्र यादव प्रदेश सरकार में स्कूल शिक्षा मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद पर हैं। प्रदेश और केंद्र में भी भाजपा की सरकार है।
अर्थात दुर्ग निगम क्षेत्र में सत्ता का ‘ट्रिपल इंजन’ मौजूद है।
फिर सवाल यही है कि जब वार्ड से लेकर प्रदेश और केंद्र तक सत्ता एक ही दल की है, तो दुर्ग नगर निगम में प्रशासनिक मुखिया की कुर्सी डेढ़-दो महीने से अस्थिर क्यों दिखाई दे रही है?
जनता ने जिन जनप्रतिनिधियों को अपने सुख-दुख में साथ खड़े रहने की उम्मीद से चुना है, क्या उनकी प्राथमिकता में निगम कर्मचारियों का समय पर वेतन और ठेकेदारों का लंबित भुगतान भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना राजनीतिक प्रोटोकॉल और सार्वजनिक कार्यक्रम?
‘मेरी पसंद का अधिकारी’ या शहर के हित का अधिकारी?
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी सुनाई दे रही है कि आयुक्त की नियुक्ति को लेकर पसंद-नापसंद और राजनीतिक समीकरणों को महत्व दिया जा रहा है। हालांकि इन चर्चाओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन यदि ऐसी कोई स्थिति है तो सबसे बड़ा सवाल यही है कि व्यक्तिगत पसंद से ऊपर शहर का प्रशासनिक हित कब आएगा?
जनप्रतिनिधियों को यह नहीं भूलना चाहिए कि उन्हें इस पद तक पहुंचाने वाला वोट किसी व्यक्ति विशेष का नहीं बल्कि दुर्ग शहर की आम जनता का जनादेश है।
चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन जनता की समस्याएं चुनावी कैलेंडर देखकर पैदा नहीं होतीं। वेतन, भुगतान, सड़क, सफाई, नाली, प्रकाश और विकास के काम हर दिन जनता से जुड़े हैं।
विपक्ष भी खामोश, सत्ता को मिला खुला मैदान
इस पूरे मामले में विपक्ष की भूमिका भी सवालों से परे नहीं है। निगम में नेता प्रतिपक्ष संजय कोहले की सक्रियता को लेकर भी राजनीतिक हलकों में चर्चा है। जिस मजबूती से विपक्ष को कर्मचारियों के वेतन, ठेकेदारों के लंबित भुगतान और निगम की प्रशासनिक स्थिति को लेकर आवाज उठानी चाहिए थी, वह प्रभाव फिलहाल नजर नहीं आ रहा।
सत्ता पक्ष की चुप्पी और विपक्ष की निष्क्रियता—दोनों के बीच नुकसान आखिर किसका हो रहा है? जवाब साफ है—दुर्ग शहर का।
1906 में जिला मुख्यालय बना दुर्ग, लेकिन आज प्रशासनिक मुखिया की प्रतीक्षा
दुर्ग लंबे समय से प्रशासनिक और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण शहर रहा है। ऐसे शहर के नगर निगम में आयुक्त जैसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक पद पर नियुक्ति के बावजूद पदभार ग्रहण में देरी होना सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया से आगे का विषय बनता जा रहा है।
नियुक्ति हो चुकी है, आदेश हो चुका है, नाम तय हो चुका है—फिर कुर्सी खाली क्यों है?
यही सवाल अब निगम के कर्मचारियों, ठेकेदारों और शहर के नागरिकों के बीच चर्चा का विषय बनता जा रहा है।
महापौर अलका बाघमार और मंत्री गजेंद्र यादव के नेतृत्व में शहर को विकास और सुशासन की दिशा में आगे बढ़ाने के दावे किए जा रहे हैं। लेकिन इन दावों की असली परीक्षा कागजों में नहीं, बल्कि निगम की रोजमर्रा की प्रशासनिक व्यवस्था में होगी।
क्योंकि प्रोटोकॉल का सम्मान सत्ता के लिए सुविधाजनक हो सकता है, लेकिन कर्मचारी का समय पर वेतन और ठेकेदार का समय पर भुगतान—यही सुशासन की असली कसौटी है।
अब देखना यह होगा कि आईएएस सुश्री लीना कोसम आखिर कब दुर्ग नगर निगम की आयुक्त की कुर्सी संभालती हैं और क्या उनके पदभार ग्रहण के बाद निगम की वर्तमान प्रशासनिक अनिश्चितता खत्म होकर विकास और भुगतान का पहिया वास्तव में गति पकड़ता है?
फिलहाल स्थिति यही है—आयुक्त की नियुक्ति हो चुकी है, लेकिन कुर्सी अब भी खाली है और दुर्ग नगर निगम की प्रशासनिक दिशा पर सवाल कायम हैं।