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बस स्टैंड की बेशकीमती जमीन पर कब्जा, बाजार अधिकारी अभ्युदय मिश्रा की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल Featured

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40 लाख की सरकारी जमीन पर कथित कब्जा बरकरार, शिकायत के बावजूद कार्रवाई नहीं—क्या संरक्षण या फिर प्रशासन को गुमराह करने का खेल?

दुर्ग// दुर्ग नगर निगम के नया बस स्टैंड में सरकारी जमीन के इस्तेमाल को लेकर एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने निगम के बाजार विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। राम रसोई के समीप निगम परिसर और राम रसोई के बीच लगभग 1000 वर्गफीट रिक्त शासकीय भूमि पर कथित रूप से एक दुकानदार द्वारा कब्जा कर शेड एवं गुमटी के माध्यम से व्यावसायिक उपयोग किए जाने की चर्चा है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि बेशकीमती सरकारी जमीन पर कथित कब्जे की जानकारी जिम्मेदार अधिकारियों तक पहुंचने के बाद भी कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

बताया जाता है कि बाजार विभाग की व्यवस्था के तहत राम रसोई के लिए भूमि आवंटित किए जाने के बाद बीच में लगभग 1000 वर्गफीट जमीन रिक्त रह गई। इसी जमीन पर अब कथित रूप से दुकानदार ने शेड खड़ा कर और गली में गुमटी रखकर अपना व्यावसायिक उपयोग शुरू कर दिया है। यदि यह भूमि वास्तव में निगम की शासकीय संपत्ति है और उपयोग के लिए कोई वैध अनुमति या आवंटन नहीं हुआ है, तो यह सीधे तौर पर जांच का विषय बन जाता है।

लाखों की जमीन, मुफ्त में कब्जे का सवाल

कलेक्टर गाइडलाइन दर के आधार पर इस क्षेत्र की लगभग 1000 वर्गफीट जमीन की कीमत करीब 40 लाख रुपये बताई जा रही है। खुले बाजार की कीमत इससे कहीं अधिक होने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में इतनी मूल्यवान सरकारी जमीन का बिना वैध आवंटन अथवा अनुमति के व्यावसायिक उपयोग यदि हो रहा है, तो यह केवल अतिक्रमण का मामला नहीं बल्कि निगम की संपत्ति की सुरक्षा और राजस्व हित से जुड़ा गंभीर प्रशासनिक प्रश्न है।

जानकारी के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं?

मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इस कथित कब्जे की जानकारी बाजार अधिकारी अभ्युदय मिश्रा तक पहुंचाए जाने के बावजूद अब तक प्रभावी कार्रवाई नहीं होने का आरोप है। यदि अधिकारी को शिकायत और मौके की वास्तविक स्थिति की जानकारी थी, तो यह सवाल स्वाभाविक है कि स्थल निरीक्षण, दस्तावेजों की जांच, नोटिस या अतिक्रमण हटाने जैसी कार्रवाई क्यों नहीं की गई?

यही स्थिति बाजार अधिकारी की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रही है। आखिर सरकारी जमीन पर कब्जे की शिकायत मिलने के बाद भी विभाग की निष्क्रियता का कारण क्या है?

गुप्त बैठक और लेनदेन की चर्चा—सच क्या है?

बस स्टैंड क्षेत्र में यह चर्चा भी है कि उक्त जमीन पर कब्जे को लेकर बाजार अधिकारी के साथ कथित रूप से कोई गुप्त बैठक हुई थी। इसके साथ ही जमीन पर कब्जा बरकरार रखने के लिए टेबल के नीचे लेनदेन की चर्चाएं भी सामने आ रही हैं। हालांकि इन चर्चाओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और न ही किसी प्रकार के आर्थिक लेनदेन का कोई प्रमाण सार्वजनिक रूप से सामने आया है।

इसलिए इन आरोपों की सच्चाई केवल निष्पक्ष जांच से ही सामने आ सकती है। लेकिन जांच का सवाल इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि सरकारी जमीन के कथित कब्जे की जानकारी के बावजूद कार्रवाई नहीं होने का तथ्य स्वयं कई सवाल खड़े करता है।

क्या बाजार अधिकारी संरक्षण दे रहे हैं या खुद अनजान हैं?

मामले में सबसे बड़ा सवाल नगर निगम के बाजार अधिकारी अभ्युदय मिश्रा की भूमिका को लेकर है। क्या अधिकारी को पूरी जानकारी होने के बावजूद कार्रवाई नहीं की जा रही है? क्या किसी स्तर से कथित कब्जे को संरक्षण प्राप्त है? या फिर बाजार विभाग के अधिकारी और उच्च प्रशासनिक अधिकारियों को वास्तविक स्थिति से अवगत ही नहीं कराया जा रहा?

यदि जमीन निगम की है, कब्जा अवैध है और किसी प्रकार की अनुमति नहीं ली गई है, तो कार्रवाई में देरी की वजह सार्वजनिक होना जरूरी है।

महापौर की सख्ती बनाम सरकारी जमीन पर कथित कब्जा

एक ओर नगर निगम की महापौर अलका बाघमार द्वारा छोटे ठेले-गुमटी संचालकों और अतिक्रमण के खिलाफ सख्ती की बात सामने आती रही है, वहीं दूसरी ओर नया बस स्टैंड जैसी प्रमुख जगह पर लाखों रुपये मूल्य की सरकारी जमीन पर कथित कब्जा लंबे समय तक बना रहना प्रशासनिक कार्रवाई की समानता पर सवाल खड़ा करता है।

सवाल यह भी है कि क्या महापौर को इस पूरे मामले की वास्तविक जानकारी है? यदि जानकारी है तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई और यदि जानकारी नहीं है तो बाजार विभाग द्वारा उच्च स्तर पर वास्तविक स्थिति की जानकारी क्यों नहीं दी गई?

अभ्युदय मिश्रा की कार्यप्रणाली फिर सवालों के घेरे में

दुर्ग नगर निगम के बाजार विभाग को लेकर इससे पहले भी शिकायतें और विवाद सामने आते रहे हैं। अब नया बस स्टैंड की बेशकीमती जमीन का मामला भी बाजार अधिकारी अभ्युदय मिश्रा की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रहा है।

भ्रष्टाचार का आरोप सिद्ध होना जांच का विषय है, लेकिन जब सरकारी संपत्ति से जुड़ी शिकायत सामने आए, मौके पर कथित कब्जा दिखाई दे और जिम्मेदार विभाग द्वारा समय पर कार्रवाई न हो, तो पारदर्शिता के लिए जांच आवश्यक हो जाती है।

अब जांच से ही खुलेगा जमीन के खेल का राज

नगर निगम और जिला प्रशासन को चाहिए कि पूरे मामले में मौके का सीमांकन, भूमि का स्वामित्व, आवंटन/अनुमति के दस्तावेज, संबंधित दुकानदार द्वारा किए जा रहे उपयोग की वैधता तथा शिकायत के बाद बाजार विभाग द्वारा की गई कार्रवाई की निष्पक्ष जांच कराई जाए।

साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि यदि जमीन पर कब्जा अवैध है तो उसे अब तक हटाया क्यों नहीं गया और जिम्मेदार अधिकारी की ओर से क्या कार्रवाई की गई।

बेशकीमती सरकारी जमीन पर कथित कब्जा और कार्रवाई में देरी—इन दोनों सवालों का जवाब अब नगर निगम प्रशासन को देना होगा।

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