बिना निविदा लगातार कार्य दिए जाने का आधार क्या था? NULM कर्मचारी अपर्णा क्षत्रिय और पूर्व प्लेसमेंट अधिकारी मुक्तेश की भूमिका भी जांच के घेरे में; दो रेन बसेरों की अनियमितताओं की शिकायतें लंबित होने के बावजूद नई निविदा में ‘5 साल के अनुभव’ का आधार क्यों?
शौर्यपथ विशेष /
दुर्ग। जिला अस्पताल परिसर स्थित आश्रय स्थल की हालिया निविदा प्रक्रिया अब केवल एक संस्था की पात्रता का मामला नहीं रह गई है, बल्कि पिछले तीन वर्षों से चली आ रही कथित प्रक्रिया और पारदर्शिता के सवाल भी इसके केंद्र में आ गए हैं। शहर के कई महिला स्व-सहायता समूहों द्वारा पिछले लगभग तीन वर्षों से राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन (NULM) की कर्मचारी अपर्णा क्षत्रिय तथा पूर्व प्लेसमेंट अधिकारी मुक्तेश से आश्रय स्थल के संचालन और निविदा संबंधी जानकारी मांगे जाने की बात सामने आई है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि अन्य महिला समूह लगातार निविदा की जानकारी मांग रहे थे, तो पिछले तीन वर्षों के दौरान सार्थक महिला स्व-सहायता समूह को किस प्रक्रिया, आदेश अथवा प्राधिकरण के आधार पर लगातार कार्य दिया जाता रहा?
यदि उस अवधि में विधिवत निविदा आमंत्रित नहीं की गई थी तो कार्य आवंटन का आधार क्या था? और यदि निविदा प्रक्रिया हुई थी तो उसकी सूचना अन्य इच्छुक महिला समूहों तक क्यों नहीं पहुंची? इन दोनों प्रश्नों का उत्तर संबंधित अभिलेखों से ही स्पष्ट हो सकता है।
तीन साल की चुप्पी के बाद अचानक ‘5 साल का अनुभव’ क्यों महत्वपूर्ण?
हालिया निविदा में सार्थक महिला स्व-सहायता समूह के पांच वर्ष के अनुभव को पात्रता के आधार के रूप में नोटशीट में स्वीकार किए जाने की बात सामने आई है। यहां प्रशासनिक जांच का महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि संबंधित पांच वर्षों के अनुभव का दस्तावेजी और भौतिक सत्यापन किस स्तर पर किया गया।
क्या संबंधित वर्षों के कार्यादेश, अनुबंध, भुगतान अभिलेख, कर्मचारी उपस्थिति, वेतन भुगतान, PF, दुर्घटना बीमा, शिफ्टवार ड्यूटी और आश्रयार्थियों के रजिस्टर की जांच की गई?
यदि जांच की गई है तो उसका निरीक्षण प्रतिवेदन कहां है?
और यदि जांच नहीं की गई तो केवल अनुभव के दावे के आधार पर पात्रता निर्धारित करने का आधार क्या था?
पिछले तीन साल से दूसरे समूह पूछते रहे—निविदा कहां है?
यह मामला इसलिए और गंभीर हो जाता है क्योंकि उपलब्ध जानकारी के अनुसार कई महिला समूहों द्वारा लगातार निविदा संबंधी जानकारी मांगी जाती रही। यदि इच्छुक समूहों ने तीन वर्षों तक निविदा प्रक्रिया के बारे में जानकारी चाही, तो निगम और NULM के रिकॉर्ड में उनके आवेदन, पत्राचार और अधिकारियों द्वारा दिए गए जवाब उपलब्ध होने चाहिए।
अब यह जांच का विषय है कि—
पिछले तीन वर्षों में आश्रय स्थल के संचालन के लिए किस प्रकार की प्रक्रिया अपनाई गई?
किस आदेश के आधार पर सार्थक महिला स्व-सहायता समूह को कार्य जारी रखा गया?
क्या प्रत्येक वर्ष कार्य विस्तार अथवा संचालन जारी रखने का लिखित आदेश था?
क्या किसी सक्षम समिति अथवा अधिकारी ने इसकी स्वीकृति बिना निविदा के किस आधार पर दी?
अन्य इच्छुक महिला समूहों को समान अवसर देने के लिए कोई प्रक्रिया अपनाई गई?
यदि निविदा नहीं हुई तो उसका प्रशासनिक कारण क्या था?
और यदि निविदा हुई तो उसके दस्तावेज सार्वजनिक अथवा संबंधित आवेदकों को उपलब्ध क्यों नहीं कराए गए?
इन सवालों के जवाब के बिना हालिया निविदा में पांच वर्ष के अनुभव को आधार बनाए जाने की प्रक्रिया पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
दो रैन बसेरों की शिकायतें भी बाजार विभाग में लंबित
मामले का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सार्थक महिला स्व-सहायता समूह द्वारा शहर के दो लाइन बसेरों के संचालन को लेकर भी कई अनियमितताओं की शिकायतें बाजार विभाग के समक्ष लंबित होने की बात सामने आई है।
यदि किसी संस्था के पूर्व कार्यों के संबंध में शिकायतें लंबित थीं तो नई निविदा में उसी संस्था के अनुभव को पात्रता के महत्वपूर्ण आधार के रूप में स्वीकार करने से पहले उन शिकायतों का परीक्षण किया गया या नहीं—यह सवाल भी जांच का विषय होना चाहिए।
यहां प्रशासनिक दृष्टि से मूल प्रश्न यह नहीं है कि संस्था दोषी है या निर्दोष, बल्कि यह है कि उसके पूर्व कार्यों से संबंधित शिकायतों का निस्तारण किए बिना उसके अनुभव को पात्रता के आधार के रूप में स्वीकार करने से पहले संबंधित अधिकारियों ने क्या सत्यापन किया?
अपर्णा क्षत्रिय और पूर्व अधिकारी मुक्तेश से भी मांगा जाना चाहिए रिकॉर्ड
पिछले तीन वर्षों में निविदा की जानकारी मांगने वाले महिला समूहों के आवेदन, उनके जवाब, संबंधित फाइलों की नोटशीट और अधिकारियों के बीच हुआ पत्राचार अब इस पूरे मामले में महत्वपूर्ण दस्तावेज बन सकते हैं।
NULM से जुड़ी कर्मचारी अपर्णा क्षत्रिय तथा पूर्व प्लेसमेंट अधिकारी मुक्तेश के कार्यकाल से संबंधित रिकॉर्ड में यह स्पष्ट होना चाहिए कि आश्रय स्थल के संचालन के संबंध में कौन-कौन से प्रस्ताव आए, किन संस्थाओं ने जानकारी मांगी, उन्हें क्या जवाब दिया गया और सार्थक महिला स्व-सहायता समूह का कार्य किस आधार पर जारी रखा गया।
यदि तीन वर्षों तक किसी वैकल्पिक निविदा प्रक्रिया के बिना कार्य जारी रहा है, तो उसकी प्रशासनिक वैधता और सक्षम स्वीकृति की जांच आवश्यक है।
रात की ड्यूटी से लेकर मैनेजर तक—सिर्फ प्रमाणपत्र नहीं, जमीन पर सत्यापन जरूरी
आश्रय स्थल के संचालन में पूर्णकालिक मैनेजर, शिफ्टवार केयरगिवर, महिला निवासियों के लिए महिला कर्मचारी, कर्मचारियों के भुगतान, PF, दुर्घटना बीमा और उपस्थिति जैसे विषय केवल कागजी औपचारिकताएं नहीं हैं।
इसलिए पिछले चार-पांच वर्षों का—
मैनेजर → केयरगिवर → शिफ्ट ड्यूटी → उपस्थिति → वेतन भुगतान → PF → बीमा → आश्रयार्थी रजिस्टर → प्रवेश-निकासी रिकॉर्ड → रात्रिकालीन सुरक्षा → भौतिक निरीक्षण
का पूरा रिकॉर्ड जांच के दायरे में आना चाहिए।
यदि रिकॉर्ड में कर्मचारी दर्ज हैं तो क्या वे वास्तव में ड्यूटी पर उपस्थित थे? यदि रात्रिकालीन चौकीदार की व्यवस्था थी तो उसका नाम, ड्यूटी चार्ट और भुगतान अभिलेख क्या कहते हैं? यदि आश्रय स्थल में महिलाओं के ठहरने की व्यवस्था थी तो पिछले वर्षों में कितनी महिलाएं वहां रुकीं?
इन प्रश्नों का उत्तर कागज और मौके की वास्तविकता के मिलान से ही मिल सकता है।
अब मामला केवल निविदा का नहीं, तीन साल की पूरी प्रक्रिया का है
पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा प्रशासनिक प्रश्न यही बनता है कि यदि तीन वर्षों से महिला समूह निविदा की जानकारी मांग रहे थे, तो उस अवधि में पारदर्शी प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया क्यों नहीं दिखाई देती? और यदि प्रक्रिया नियमों के अनुरूप थी तो उसके दस्तावेज संबंधित समूहों और जांच के लिए उपलब्ध क्यों नहीं हैं?
इसी तरह दो लाइन बसेरों के संचालन से संबंधित शिकायतें यदि बाजार विभाग में लंबित हैं, तो उनका परीक्षण किए बिना उसी संस्था के पूर्व अनुभव को नई निविदा में कितना और किस आधार पर महत्व दिया गया—यह भी स्पष्ट किया जाना आवश्यक है।
निगम आयुक्त लीना कोसाम के सामने अब पूरी फाइल खोलने का सवाल
दुर्ग नगर निगम की आयुक्त IAS लीना कोसाम के समक्ष अब इस मामले में केवल हालिया निविदा की जांच पर्याप्त नहीं होगी। निष्पक्ष जांच के लिए पिछले तीन वर्षों की पूरी प्रक्रिया, सभी निविदा/कार्यादेश, विस्तार आदेश, भुगतान, शिकायतें, निरीक्षण रिपोर्ट, अनुभव प्रमाणपत्र, कर्मचारी व्यवस्था और आश्रयार्थियों के रजिस्टर को एक साथ देखा जाना चाहिए।
साथ ही यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि बाजार विभाग के अधिकारी अभ्युदय मिश्रा ने हालिया निविदा में पांच वर्ष के अनुभव को स्वीकार करने से पहले कौन-कौन से दस्तावेज स्वयं जांचे और NULM स्तर पर अपर्णा क्षत्रिय द्वारा किस प्रकार का सत्यापन किया गया।
यदि अधिकारियों ने निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया है तो दस्तावेज उन्हें सही साबित करेंगे। यदि प्रक्रिया में कमी रही है तो वही रिकॉर्ड जिम्मेदारी तय करने का आधार बन सकता है।
आश्रय स्थल गरीब और बेघर लोगों के लिए है। इसलिए उसकी निविदा और संचालन में सबसे महत्वपूर्ण कसौटी किसी समूह का नाम या अनुभव प्रमाणपत्र नहीं, बल्कि पारदर्शिता, पात्रता, वास्तविक सेवा और सार्वजनिक धन का जवाबदेह उपयोग होना चाहिए।
अब दुर्ग नगर निगम प्रशासन के सामने मूल प्रश्न यही है—
तीन साल से निविदा की जानकारी मांगने वाले महिला समूहों को जवाब क्यों नहीं मिला, बिना स्पष्ट निविदा प्रक्रिया के कार्य जारी रखने का आधार क्या था और लंबित शिकायतों के बीच ‘पांच साल के अनुभव’ को किस स्तर पर सत्यापित किया गया?