इंदिरा मार्केट में दो घंटे का निरीक्षण और सख्त चेतावनी; शहर के दूसरे कथित अतिक्रमणों पर कार्रवाई का इंतजार—बाजार अधिकारी की कार्यप्रणाली पर भाजपा पार्षद भी उठा चुके हैं सवाल
शौर्यपथ विशेष
दुर्ग। त्योहारी सीजन में शहर के हृदयस्थल इंदिरा मार्केट की व्यवस्था सुधारने महापौर अलका बाघमार का सड़क पर उतरना और दुकानदारों को अतिक्रमण हटाने की चेतावनी देना अच्छी पहल है। आखिर बाजार में नागरिकों को सुगम आवागमन मिलना चाहिए और सड़क पर सामान फैलाकर रास्ता रोकने वालों पर कार्रवाई भी होनी चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि अतिक्रमण के नियमों की तलवार छोटे पसरा संचालकों पर ही क्यों चमकती दिखाई देती है? शहर के दूसरे हिस्सों में कथित कब्जों को लेकर शिकायतें, दस्तावेज और सवाल मौजूद हैं, तो वहां कार्रवाई का बुलडोजर कब चलेगा?
महापौर ने करीब दो घंटे तक इंदिरा मार्केट के फूल चौक से कुआं चौक होते हुए इंदिरा गांधी प्रतिमा के आसपास निरीक्षण किया। दुकानदारों को दुकान की सीमा में सामान रखने, सड़क पर अतिक्रमण करने पर जब्ती और जुर्माने की कार्रवाई की चेतावनी दी गई। बाजार अधिकारी और कर्मचारियों को चूने से सीमांकन कराने तथा नियमित निगरानी के निर्देश भी दिए गए। प्रेस विज्ञप्ति में निगम की मंशा स्पष्ट है—सड़क खाली रहे, नागरिकों को परेशानी न हो और बाजार व्यवस्थित बने।
लेकिन शहर में उठ रहे सवाल इस मंशा के क्रियान्वयन को लेकर हैं। जब अतिक्रमण हटाने की बात आती है, तो क्या निगम का पैमाना सभी के लिए एक है या कार्रवाई की सख्ती दुकानदार की हैसियत देखकर तय होती है?
ओम ज्वेलर्स से बूट हाउस तक, शिकायतों का हिसाब कौन देगा?
शहर के विभिन्न स्थानों पर कथित अतिक्रमण और सार्वजनिक जगहों के उपयोग को लेकर शिकायतें किए जाने तथा दस्तावेज उपलब्ध होने की बात सामने आई है। इनमें ओम ज्वेलर्स के कथित अवैध कब्जे, बूट हाउस और आसपास की दुकानों के बरामदों तक किए गए कब्जे, गणेश मंदिर के सामने चतुर्भुज राठी द्वारा सड़क पर कथित अवैध निर्माण और बस स्टैंड स्थित राम रसोई के अनुबंध की अवधि समाप्त होने के बाद भी कब्जे की स्थिति जैसे मामले शामिल हैं।
इसी तरह सुराना कॉलेज के सामने सड़क किनारे फल दुकानों के जमावड़े से यातायात प्रभावित होने और मंत्री गजेंद्र यादव के सेवा सदन के सामने गुमठियों के आवंटन तथा सड़क तक वाहनों के खड़े होने को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। इन मामलों में शिकायतें और दस्तावेज होने के बावजूद कार्रवाई की वर्तमान स्थिति को लेकर निगम प्रशासन को स्पष्ट जवाब देना चाहिए।
इन आरोपों का समाधान किसी प्रेस विज्ञप्ति से नहीं, बल्कि स्थल निरीक्षण, दस्तावेजों की जांच और नियमों के अनुसार की गई कार्रवाई से होगा। यदि इन स्थानों पर अतिक्रमण नहीं है, तो निगम तथ्य सार्वजनिक करे; यदि नियमों का उल्लंघन है, तो संबंधित लोगों के विरुद्ध भी उसी निष्पक्षता से कार्रवाई होनी चाहिए, जिसका संदेश इंदिरा मार्केट के निरीक्षण से दिया गया है।
बाजार अधिकारी की कार्यप्रणाली पर भाजपा पार्षदों के सवाल भी चर्चा में
इस पूरे मामले में बाजार विभाग के जिम्मेदार अधिकारी अभ्युदय मिश्रा की कार्यप्रणाली को लेकर उठे सवाल भी महत्वपूर्ण हैं। जानकारी के अनुसार, नगर निगम की सामान्य सभा में भाजपा के पार्षदों ने ही बाजार अधिकारी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए थे और उन्हें पद से हटाने की मांग भी की थी। ऐसे में यह विषय केवल विपक्ष की राजनीतिक आलोचना तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि निगम के भीतर उठी आपत्तियों और बाजार व्यवस्था की जवाबदेही से भी जुड़ता है।
यदि बाजार विभाग की कार्यप्रणाली पर सत्तापक्ष के पार्षदों ने भी सवाल उठाए हैं, तो महापौर और निगम प्रशासन को इन आपत्तियों की समीक्षा कर कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। क्या शिकायतों की जांच हुई? क्या संबंधित अधिकारी से जवाब मांगा गया? क्या जिम्मेदारी तय की गई? और क्या बाजार व्यवस्था में सुधार के लिए कोई ठोस कार्ययोजना बनी? इन सवालों पर चुप्पी से संदेह बढ़ेंगे, जबकि तथ्य सार्वजनिक करने से स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
महापौर को जानकारी है, तो कार्रवाई की समान कसौटी कहां है?
शिकायतकर्ताओं का दावा है कि संबंधित मामलों के दस्तावेज उपलब्ध हैं, शिकायतें पहले ही की जा चुकी हैं और इन प्रकरणों की जानकारी महापौर तक भी पहुंच चुकी है। यदि ऐसा है, तो अब सवाल केवल अतिक्रमण की मौजूदगी का नहीं, बल्कि शिकायतों पर हुई कार्रवाई का है। महापौर को बताना चाहिए कि किन मामलों में जांच पूरी हुई, कहां नोटिस जारी हुए, किन मामलों में कब्जा हटाया गया और किन प्रकरणों में कार्रवाई लंबित है।
शहर में कानून और नियमों का पालन सुनिश्चित करना नगर निगम की जिम्मेदारी है। इस जिम्मेदारी का निर्वहन करते हुए छोटे दुकानदारों पर कार्रवाई करना गलत नहीं, लेकिन उसी नियम को बड़े प्रतिष्ठानों, प्रभावशाली लोगों और अन्य कब्जाधारियों पर लागू नहीं करना निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर सकता है। इसलिए जरूरी है कि निगम सभी शिकायतों की स्थिति सार्वजनिक करे और कार्रवाई के लिए समान मानदंड अपनाए।
प्रेस विज्ञप्ति से नहीं, जमीन पर कार्रवाई से बनेगी छवि
त्योहारी सीजन में बाजारों को व्यवस्थित करना जरूरी है। मगर शहर की जनता यह भी देखना चाहती है कि प्रशासनिक सख्ती केवल निरीक्षण, चेतावनी और प्रेस विज्ञप्ति तक सीमित है या उसका असर पूरे शहर में दिखाई देगा। यदि नियम सभी के लिए समान हैं, तो कार्रवाई भी सभी पर समान होनी चाहिए।
महापौर अलका बाघमार के सामने अब सीधा सवाल है—इंदिरा मार्केट में छोटे दुकानदारों को चेतावनी देने के साथ शहर के अन्य कथित अतिक्रमणों पर कार्रवाई की समय-सीमा कब तय होगी? बाजार अधिकारी की कार्यप्रणाली पर उठे सवालों की समीक्षा कब होगी? और शिकायतों के निपटारे की जानकारी जनता के सामने कब रखी जाएगी?
दुर्ग की जनता को केवल व्यवस्थित बाजार का आश्वासन नहीं, बल्कि निष्पक्ष कार्रवाई का भरोसा चाहिए। शहर की सरकार की साख इस बात से तय होगी कि नियमों की कसौटी सबके लिए समान रखी जाती है या नहीं। अतिक्रमण के खिलाफ अभियान तभी विश्वसनीय होगा, जब कार्रवाई में न गरीब और रसूखदार का फर्क दिखे, न शिकायतों के निपटारे में पक्षपात की गुंजाइश रहे।