वैशाली नगर विधायक रिकेश सेन ने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को पत्र लिखकर सुरक्षा में तैनात जवानों की संख्या कम करने का किया आग्रह; दुर्ग में पूर्व जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा और शासकीय आवासों के उपयोग की व्यवस्था पर भी चर्चा तेज
दुर्ग। जनप्रतिनिधियों को मिलने वाली शासकीय सुविधाओं और उन पर खर्च होने वाली सरकारी राशि को लेकर दुर्ग जिले में एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं। वैशाली नगर विधायक रिकेश सेन ने शासन को पत्र लिखकर अपनी सुरक्षा में तैनात शासकीय सुरक्षा कर्मियों की संख्या कम करने और उन जवानों को प्रदेश की कानून-व्यवस्था मजबूत करने में लगाने का आग्रह किया है। उनके इस निर्णय ने जनप्रतिनिधियों को मिलने वाली सुरक्षा, सरकारी संसाधनों के उपयोग और सार्वजनिक धन की बचत जैसे मुद्दों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
‘जनता ही मेरी सबसे बड़ी सुरक्षा’, मुख्यमंत्री को लिखा पत्र
विधायक रिकेश सेन ने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को प्रेषित पत्र में कहा है कि वे जनता द्वारा चुने गए जनप्रतिनिधि हैं और जनता ही उनकी सबसे बड़ी सुरक्षा है। पत्र में उन्होंने भाजपा की राष्ट्रीय महामंत्री एवं छत्तीसगढ़ प्रदेश प्रभारी स्मृति ईरानी की कार्यशैली से प्रेरित होकर शासकीय सुरक्षा कर्मियों की संख्या कम करने की इच्छा जताई है।
उन्होंने मुख्यमंत्री से अनुरोध किया है कि उनकी सुरक्षा में तैनात जवानों की संख्या घटाकर उन्हें प्रदेश की कानून-व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए उपयोग में लिया जाए। विधायक की इस पहल को सरकारी संसाधनों के अधिक प्रभावी उपयोग की दृष्टि से देखा जा रहा है।
एक निर्णय से उठे कई सवाल
रिकेश सेन के इस पत्र के बाद अब चर्चा केवल उनकी सुरक्षा तक सीमित नहीं है। दुर्ग जिले में यह सवाल भी उठ रहा है कि जिन पूर्व जनप्रतिनिधियों के पास वर्तमान में कोई संवैधानिक या निर्वाचित पद नहीं है, उन्हें कौन-कौन सी शासकीय सुविधाएं मिल रही हैं और उनका खर्च किस आधार पर जारी है?
पूर्व जनप्रतिनिधियों को सुरक्षा उपलब्ध कराने का निर्णय खतरे के आकलन और निर्धारित नियमों के आधार पर लिया जाता है। इसलिए किसी पूर्व विधायक या अन्य व्यक्ति को सुरक्षा मिलना अपने आप में नियमों का उल्लंघन नहीं माना जा सकता। लेकिन ऐसी सुरक्षा की समय-समय पर समीक्षा, उसकी आवश्यकता और उस पर होने वाले सरकारी खर्च की पारदर्शिता निश्चित रूप से महत्वपूर्ण विषय हैं।
पूर्व विधायक अरुण वोरा की सुरक्षा भी चर्चा में
दुर्ग के पूर्व विधायक अरुण वोरा की सुरक्षा में जवानों की तैनाती को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। इस संबंध में यह स्पष्ट होना जरूरी है कि उन्हें सुरक्षा किस श्रेणी में, किस आधार पर और कितनी अवधि के लिए प्रदान की गई है। यदि सुरक्षा की समीक्षा निर्धारित प्रक्रिया के तहत होती है, तो उसके निष्कर्षों के आधार पर ही आगे का निर्णय लिया जाना चाहिए।
सवाल किसी व्यक्ति विशेष को सुरक्षा देने या हटाने का नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने का है कि शासकीय सुरक्षा कर्मियों की तैनाती वास्तविक आवश्यकता के अनुरूप हो और कानून-व्यवस्था के लिए उपलब्ध मानव संसाधनों का प्रभावी उपयोग किया जाए।
स्वर्गीय हेमचंद यादव के सरकारी आवास पर भी उठ रहे सवाल
दुर्ग के सिविल लाइन स्थित उस शासकीय आवास का मुद्दा भी चर्चा में है, जिसका उपयोग पूर्व मंत्री स्वर्गीय हेमचंद यादव करते थे। उनके निधन के वर्षों बाद भी उनके परिवार के पास इस आवास का उपयोग जारी होने की बात कही जा रही है।
इस मामले में यह जानना आवश्यक है कि आवास वर्तमान में किस वैधानिक अनुमति या आवंटन के आधार पर उपयोग किया जा रहा है, क्या इसकी अवधि बढ़ाई गई है और क्या इसके लिए निर्धारित किराया अथवा अन्य शुल्क जमा किया जा रहा है। यदि आवास का उपयोग बिना वैध अनुमति के जारी है, तो शासन को नियमों के अनुसार कार्रवाई करनी चाहिए। वहीं, यदि कोई वैध अनुमति प्रभावी है, तो उसकी शर्तों और अवधि की जानकारी सार्वजनिक होना पारदर्शिता की दृष्टि से उचित होगा।
सरकारी धन की बचत के लिए व्यवस्था की समीक्षा जरूरी
शासकीय सुरक्षा कर्मियों की तैनाती, सरकारी आवासों का आवंटन और पूर्व जनप्रतिनिधियों को मिलने वाली सुविधाएं सार्वजनिक संसाधनों से जुड़ी व्यवस्थाएं हैं। इनका उद्देश्य आवश्यकता के अनुरूप सुविधा उपलब्ध कराना है, न कि अनिश्चितकाल तक बिना समीक्षा के संसाधनों का उपयोग सुनिश्चित करना।
यदि सुरक्षा की समीक्षा और शासकीय आवासों के आवंटन की नियमित जांच की जाए, तो अनावश्यक व्यय पर नियंत्रण लगाने के साथ सरकारी संसाधनों का बेहतर उपयोग किया जा सकता है। इससे कानून-व्यवस्था के लिए जवानों की उपलब्धता बढ़ाने और सार्वजनिक धन की जवाबदेही सुनिश्चित करने में भी मदद मिल सकती है।
क्या रिकेश सेन की पहल बनेगी व्यापक समीक्षा का आधार?
वैशाली नगर विधायक की ओर से सुरक्षा कर्मियों की संख्या कम करने का आग्रह एक व्यक्तिगत निर्णय है। अब देखना होगा कि राज्य सरकार इस पत्र पर क्या निर्णय लेती है और क्या इसके साथ ही पूर्व जनप्रतिनिधियों को उपलब्ध कराई जा रही सुरक्षा तथा शासकीय आवासों के उपयोग की व्यवस्था की भी समीक्षा होती है।
बड़ा सवाल यही है कि क्या शासन सभी संबंधित मामलों में नियमों के अनुरूप पारदर्शी समीक्षा कर सार्वजनिक संसाधनों का उचित उपयोग सुनिश्चित करेगा, या रिकेश सेन की यह पहल केवल एक व्यक्तिगत उदाहरण बनकर रह जाएगी? जनहित में जरूरी है कि सुरक्षा की आवश्यकता का आकलन निष्पक्ष हो, शासकीय संपत्तियों का उपयोग नियमों के अनुसार हो और सरकारी धन के प्रत्येक व्यय की जवाबदेही तय की जाए।