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इंदिरा मार्केट में निगम के नियम बेअसर! दुकानों की मूल संरचना से छेड़छाड़, बरामदों पर कब्जा—बाजार अधिकारी मौन, महापौर की कार्रवाई गरीबों तक सीमित? Featured

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दुर्ग के सबसे पुराने बाजार में नियमों की अनदेखी पर सवाल; बड़े व्यापारियों की मनमानी से पार्किंग, यातायात और आम जनता की परेशानी बढ़ने का खतरा

शौर्यपथ विशेष
दुर्ग। शहर के सबसे पुराने और प्रमुख व्यावसायिक केंद्र इंदिरा मार्केट में नगर पालिक निगम की बाजार व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। निगम के स्वामित्व वाली सैकड़ों दुकानों वाले इस बाजार में कहीं दुकानों की मूल संरचना में कथित तौर पर मनमाने बदलाव किए जा रहे हैं, तो कहीं दुकानों के सामने बने बरामदों और सड़कों तक व्यापार फैलाकर आम लोगों के आवागमन के लिए उपलब्ध जगह पर कब्जा किया जा रहा है। वहीं, निगम की आवंटन शर्तों के विपरीत दुकानों को किराए पर दिए जाने की शिकायतें भी बाजार व्यवस्था की निगरानी पर सवाल उठाती हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इन गतिविधियों पर जिम्मेदार अधिकारियों की नजर क्यों नहीं पड़ रही है?

निगम की संपत्ति में बदलाव की छूट किसने दी?

इंदिरा मार्केट की कई दुकानें वर्षों पुरानी हैं। समय के साथ इनके रखरखाव और सुरक्षा की जरूरत बढ़ी है, लेकिन बाजार में कुछ दुकानों की मूल संरचना में बदलाव किए जाने की शिकायतें सामने आ रही हैं। यदि दुकानदारों ने सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के बिना दीवारों, पिलर, छत या अन्य संरचनात्मक हिस्सों में परिवर्तन किया है, तो यह केवल बाजार की व्यवस्था का नहीं, बल्कि भवन की सुरक्षा और निगम की संपत्ति के संरक्षण का भी गंभीर विषय है।

नगर निगम की दुकानों का आवंटन निर्धारित शर्तों के अधीन होता है। ऐसे में मूल संरचना में बदलाव, अतिरिक्त निर्माण या दुकान के निर्धारित क्षेत्र से बाहर कब्जे के प्रत्येक मामले की नियमानुसार जांच आवश्यक है। सवाल यह है कि बाजार विभाग ने अब तक ऐसी दुकानों का सर्वेक्षण कराया है या नहीं? यदि कराया है, तो नियम विरुद्ध पाए गए निर्माणों पर क्या कार्रवाई हुई? और यदि कार्रवाई नहीं हुई, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है?

सहायक ग्रेड-3 अभ्युदय मिश्रा की भूमिका पर सवाल

नगर निगम के बाजार विभाग की जिम्मेदारी बाजार में व्यवस्था बनाए रखने, आवंटन शर्तों के पालन की निगरानी करने और सार्वजनिक स्थानों पर अतिक्रमण रोकने से जुड़ी है। इसके बावजूद इंदिरा मार्केट में दुकानों के सामने बरामदों और सड़कों तक व्यापार फैलने तथा दुकानों की मूल संरचना में बदलाव की शिकायतें बनी हुई हैं।

बाजार विभाग की जिम्मेदारी संभाल रहे सहायक ग्रेड-3 अभ्युदय मिश्रा की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। आखिर बाजार में नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए क्या नियमित निरीक्षण हो रहा है? क्या आवंटित दुकानों का भौतिक सत्यापन किया जा रहा है? क्या किराए पर दी गई दुकानों और निर्धारित सीमा से बाहर संचालित व्यापार की जांच की गई है?

यदि इन गतिविधियों की जानकारी विभाग को है, तो कार्रवाई का विवरण सार्वजनिक होना चाहिए। और यदि जानकारी नहीं है, तो यह बाजार निगरानी व्यवस्था की गंभीर कमजोरी मानी जाएगी। हालांकि, किसी अधिकारी की व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय करने से पहले संबंधित अभिलेखों और कार्रवाई की स्थिति की पुष्टि आवश्यक है।

बड़े व्यापारियों के लिए अलग नियम, गरीबों के लिए सख्ती?

इंदिरा मार्केट की व्यवस्था को लेकर सबसे तीखा सवाल कार्रवाई में समानता का है। एक ओर बड़े व्यापारी वाहन पार्किंग और यातायात की समस्या को लेकर अधिकारियों से शिकायत करते हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ दुकानदारों द्वारा बरामदों और सड़कों तक व्यापार फैलाने की शिकायतें भी सामने आती हैं। यदि सार्वजनिक आवागमन के लिए बने बरामदों पर सामान रखकर या दुकान बढ़ाकर कब्जा किया जा रहा है, तो इससे पैदल चलने वाले नागरिकों को परेशानी होती है और यातायात व्यवस्था भी प्रभावित हो सकती है।

ऐसे में निगम प्रशासन को यह स्पष्ट करना होगा कि अतिक्रमण के विरुद्ध कार्रवाई सभी के लिए समान है या नहीं। नियमों का उल्लंघन करने वाला व्यक्ति छोटा पसरा संचालक हो या बड़ा दुकानदार, कार्रवाई का आधार उसकी आर्थिक हैसियत नहीं, बल्कि नियमों का उल्लंघन होना चाहिए।

महापौर अलका बाघमार की जवाबदेही भी तय हो

दुर्ग की महापौर श्रीमती अलका बाघमार सार्वजनिक मंचों और प्रेस विज्ञप्तियों के माध्यम से शहर की व्यवस्था सुधारने तथा अतिक्रमण के विरुद्ध कार्रवाई की बात करती रही हैं। लेकिन इंदिरा मार्केट की स्थिति के बीच यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या बाजार की बदहाली दूर करने के लिए केवल बयान पर्याप्त हैं?

यदि छोटे व्यापारियों और सड़क किनारे पसरा लगाने वालों के विरुद्ध कार्रवाई की जा सकती है, तो निगम की दुकानों के सामने सार्वजनिक रास्तों पर कब्जे, कथित अवैध निर्माण और आवंटन शर्तों के उल्लंघन के मामलों में भी उसी तत्परता से कदम उठाए जाने चाहिए। महापौर के नेतृत्व वाली शहरी सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि बाजार व्यवस्था सुधारने का अभियान किसी एक वर्ग तक सीमित न रहे।

त्योहारों से पहले नहीं चेते तो बढ़ेगी परेशानी

त्योहारों के मौसम में इंदिरा मार्केट में खरीदारी करने वालों की आवाजाही बढ़ना स्वाभाविक है। ऐसे समय में यदि दुकानों के सामने सामान फैलाकर रखा गया, बरामदों पर कब्जा बना रहा और पार्किंग व यातायात व्यवस्था दुरुस्त नहीं की गई, तो आम नागरिकों की परेशानी और बढ़ सकती है।

निगम प्रशासन को बाजार की दुकानों का भौतिक सर्वेक्षण कराना चाहिए, मूल संरचना में हुए बदलावों की अनुमति की जांच करनी चाहिए, आवंटन शर्तों के उल्लंघन पर नियमानुसार कार्रवाई करनी चाहिए और सार्वजनिक बरामदों तथा सड़कों को अतिक्रमण मुक्त कराने के लिए समान नीति लागू करनी चाहिए।

अब सवाल साफ है—इंदिरा मार्केट में नियमों का राज चलेगा या मनमानी का? बाजार अधिकारी अभ्युदय मिश्रा और महापौर अलका बाघमार के सामने यह केवल बाजार प्रबंधन की चुनौती नहीं, बल्कि निगम की संपत्ति की सुरक्षा, सार्वजनिक रास्तों की उपलब्धता और आम नागरिकों के हितों से जुड़ा मामला है। दुर्ग की जनता को प्रेस विज्ञप्तियों से आगे बढ़कर जमीन पर दिखाई देने वाली कार्रवाई का इंतजार है।

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