धमधा नाका और पुलगांव में कचरे के पहाड़, सड़कों पर अंधेरा-गड्ढे और बाजारों में अव्यवस्था बरकरार; निर्माण कार्यों में चहेते ठेकेदारों पर मेहरबानी और भुगतान में भेदभाव के आरोपों ने बढ़ाए सवाल
दुर्ग। शौर्यपथ। दुर्ग शहर की जनता बदबू, गंदगी, गड्ढों और अव्यवस्थित यातायात से परेशान है, लेकिन जब शहर में केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय सहित प्रदेश के दिग्गज नेताओं का आगमन हुआ तो कचरे के पहाड़ों के सामने हरे पर्दे लगाकर शहर की बदहाल तस्वीर छिपाने की कोशिश चर्चा का विषय बन गई। 30 अक्टूबर को आयोजित भाजपा की लोकतंत्र बचाओ पदयात्रा के दौरान शहर की व्यवस्थाओं को लेकर एक बड़ा सवाल खड़ा हुआ कि क्या नगर निगम की प्राथमिकता समस्याओं का स्थायी समाधान करना है या वीआईपी आगमन पर कुछ घंटों के लिए बदहाली पर पर्दा डालना? महापौर श्रीमती अलका बाघमार की कार्यप्रणाली अब इसी कसौटी पर सवालों के घेरे में है।
कचरे के पहाड़ और हरे पर्दे, आखिर स्वच्छता की यह कैसी तस्वीर?
शहर के प्रवेश द्वार धमधा नाका और पुलगांव स्थित जलाराम वाटिका के समीप कचरे के विशाल ढेर लंबे समय से सफाई व्यवस्था की पोल खोल रहे हैं। त्योहारों के मौसम में भी बदबू और गंदगी से नागरिकों को राहत नहीं मिल रही। ऐसे में मंत्रियों के आगमन पर कचरे के सामने हरे पर्दे लगाने की व्यवस्था ने निगम की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े कर दिए हैं। पर्दे लगाकर कचरा नजरों से छिपाया जा सकता है, लेकिन उससे उत्पन्न बदबू और जनता की परेशानी कैसे छिपेगी? सबसे बड़ा सवाल स्वास्थ्य विभाग प्रभारी नीलेश अग्रवाल की कार्यप्रणाली को लेकर है। आखिर सफाई व्यवस्था की जिम्मेदारी संभालने वाले विभाग की नियमित समीक्षा क्यों नहीं हो रही और महापौर कब तक इस व्यवस्था की जवाबदेही तय करने से बचेंगी?
बड़े कब्जों पर खामोशी, छोटे कारोबारियों पर सख्ती क्यों?
नगर निगम की 3.50 एकड़ से अधिक जमीन पर बिल्डरों के कथित कब्जे की शिकायतें भी गंभीर जांच की मांग करती हैं। सवाल यह है कि सार्वजनिक जमीन पर कब्जे के मामलों में निगम कितनी सक्रियता दिखा रहा है? एक ओर छोटे व्यापारी दो बाई दो फीट की जगह पर कारोबार करते हैं तो कार्रवाई की तलवार लटक जाती है, वहीं प्रभावशाली लोगों के कथित कब्जों पर अपेक्षित कार्रवाई क्यों नहीं दिखाई देती? महापौर को निगम की जमीन का सीमांकन कराकर कब्जों की वास्तविक स्थिति सार्वजनिक करनी चाहिए। कानून और कार्रवाई का पैमाना सभी के लिए समान होना चाहिए।
निर्माण कार्यों में चहेतों पर मेहरबानी, भुगतान में भी भेदभाव के आरोप
नगर निगम के निर्माण कार्यों में भी महापौर की भूमिका को लेकर ठेकेदारों के बीच असंतोष की चर्चाएं हैं। आरोप हैं कि कुछ चुनिंदा ठेकेदारों के कार्यों के प्रति नरम रुख अपनाया जाता है, जबकि अन्य ठेकेदारों के कार्यों की बारीकी से जांच कर आपत्तियां लगाई जाती हैं। निर्माण की गुणवत्ता की जांच आवश्यक है, लेकिन उसके मापदंड सभी के लिए समान होने चाहिए। वहीं कई ठेकेदारों के भुगतान महीनों तक लंबित रहने और कुछ अन्य को शीघ्र भुगतान मिलने की शिकायतें भी सामने आ रही हैं। यदि भुगतान प्रक्रिया में भेदभाव नहीं है तो निगम ठेकेदारवार लंबित बिलों और भुगतान की स्थिति सार्वजनिक क्यों नहीं करता? लाखों रुपये की गाड़ियों में महापौर के आसपास नजर आने वाले कुछ ठेकेदारों और अन्य ठेकेदारों के बीच भुगतान की स्थिति भी पारदर्शिता की मांग करती है।
बाजार अधिकारी अभ्युदय मिश्रा की कार्यप्रणाली पर भी सवाल
दुर्ग के बाजार क्षेत्रों में अतिक्रमण, अव्यवस्थित यातायात और सार्वजनिक स्थानों पर कब्जे आम नागरिकों की परेशानी बढ़ा रहे हैं। बाजार अधिकारी अभ्युदय मिश्रा की कार्यप्रणाली पर भी शिकायतों के आधार पर सवाल उठ रहे हैं। आरोप हैं कि शिकायतों पर कार्रवाई में समानता नहीं बरती जा रही और चुनिंदा मामलों में ही सक्रियता दिखाई देती है। महापौर को बताना चाहिए कि बाजार विभाग की नियमित समीक्षा कब होती है और सार्वजनिक रास्तों को अतिक्रमण मुक्त करने के लिए क्या ठोस कार्रवाई की गई है? छोटे दुकानदारों पर कार्रवाई और बड़े कब्जाधारियों के प्रति नरम रवैये की शिकायतों का निष्पक्ष परीक्षण जरूरी है।
त्योहार में भी अंधेरी सड़कें, गड्ढे और बदहाल उद्यान
शहर की सड़कों पर अंधेरा, गड्ढे, बदहाल उद्यान और सफाई की समस्या किसी से छिपी नहीं है। त्योहारों के दौरान नागरिक बेहतर रोशनी, स्वच्छता और सुगम यातायात की अपेक्षा करते हैं, लेकिन नगर निगम की प्राथमिकताओं पर सवाल बने हुए हैं। लगभग 60 हजार मतों से मिली जीत महापौर के लिए जनता के प्रति जिम्मेदारी का प्रमाण है, न कि जवाबदेही से ऊपर रहने का अधिकार। दुर्ग विधानसभा क्षेत्र के विधायक एवं प्रदेश के शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव के साथ बेहतर समन्वय की आवश्यकता भी महसूस की जा रही है। शहर के विकास में जनप्रतिनिधियों के बीच राजनीतिक दूरी नहीं, बल्कि सहयोग दिखाई देना चाहिए।
लोकतंत्र बचाओ पदयात्रा के बीच जनता का सवाल—बदहाली कब दूर होगी?
केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा, मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और प्रदेश के वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी में आयोजित पदयात्रा ने दुर्ग को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मंच दिया, लेकिन इसी अवसर पर शहर की वास्तविक समस्याओं पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। लोकतंत्र में जनता को अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों से सवाल पूछने का पूरा अधिकार है। महापौर अलका बाघमार को स्पष्ट करना चाहिए कि स्वास्थ्य प्रभारी नीलेश अग्रवाल की कार्यप्रणाली की समीक्षा कब होगी? ठेकेदारों के भुगतान में कथित भेदभाव की जांच कब होगी? निगम की जमीनों पर कब्जों के मामलों में कार्रवाई कब होगी और शहर को बदबू, गंदगी, अंधेरी सड़कों तथा अव्यवस्थित बाजारों से राहत कब मिलेगी?
आखिर शहर को हरे पर्दों की नहीं, स्थायी समाधान की जरूरत है। मंत्रियों के सामने बदहाली छिपाने से जनता की समस्याएं समाप्त नहीं होंगी। अब महापौर को तस्वीर बदलने के बजाय शहर की वास्तविक व्यवस्था बदलकर दिखानी होगी।