नजरिया /शौर्यपथ /भारत-चीन सीमा पर जो हुआ, वह दुर्भाग्यपूर्ण है। दोनों देशों के बीच सीमा विवाद नया नहीं है। तनाव पचास के दशक में ही शुरू हो गया था। जब पंचशील की बात पंडित नेहरू ने शुरू की थी, तब भी विवाद थे। तभी चीन ने 38,000 वर्ग किलोमीटर जमीन हथिया ली थी। तभी से तनातनी है। यह स्वीकारने में कोई हर्ज नहीं कि यह हमारी कूटनीति और राजनीतिक विफलता है, जिसका नतीजा हम भुगत रहे हैं। जब 1950 के दशक में चीनी प्रधानमंत्री चाउ एन लाई आए थे, उनका भारत में सम्मान किया गया था। उन्होंने तब कहा था, सीमा विवाद सुलझा लेते हैं, लेकिन इस दिशा में भारत की ओर से कार्रवाई नहीं हुई। चाउ एन लाई निराश लौट गए। दोनों देशों के बीच केवल तनाव ही नहीं रहा है, 1962 में युद्ध भी हो चुका है। हम उस लड़ाई के लिए तैयार नहीं थे। उसके बाद चीन ज्यादा आक्रामक हुआ। उसके बाद से ही उसकी नीति भारत को दबाकर रखने की रही। उसने जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और अरुणाचल प्रदेश में भी अपनी जमीन होने का दावा किया है।
हम चीन के साथ अपनी सीमा को सुलझाने में कामयाब नहीं हो रहे हैं। जहां अभी विवाद हुआ है, वहां चीन के साथ हमारी अंतरराष्ट्रीय सीमा नहीं है। लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल को लेकर अपने-अपने दावे हैं, इसलिए आपस में तनाव घटता-बढ़ता रहता है। ताजा हिंसा पीछे हटते और कब्जा लेते हुए हुई है। चीनी सैनिक किसी जगह पर अड़ गए होंगे, उसके बाद ही तनाव बढ़ा और हिंसा हुई है। ऐसा नहीं है कि उसके बाद दोनों ओर से फार्यंरग शुरू हो गई हो। अभी धुंध है। इसे ‘फॉग ऑफ वार’ या लड़ाई का कोहरा कहते हैं। मेरा मानना है कि चीन के छह से आठ जवान मारे गए होंगे, लेकिन वह मानेगा नहीं। बहुत संभव है, दोनों ओर, कुछ मीसिंग भी हुई हो, जिसका पता कुछ समय बाद ही चलेगा। अब जिस स्तर पर तनाव चला गया है, वह जल्दी नीचे नहीं आएगा। दोनों देशों को उच्च स्तर पर रणनीतिक बातचीत बढ़ाने की पहल करनी पड़ सकती है। समाधान राजनीतिक व कूटनीतिक स्तर पर ही होगा।
चीन जो कर रहा है, उसका सीधा संबंध शी जिनपिंग से है। इससे पाकिस्तान का भी संबंध है। नेपाल ने पिछले दिनों जो किया है, उससे भी चीन का संबंध है। भारत-चीन सीमा विवाद के समाधान के लिए देर-सबेर वार्ता की मेज पर पाकिस्तान और अफगानिस्तान को भी लाना पडे़गा। जहां तक युद्ध की बात है, तो यह चीन भी नहीं चाहेगा। दोनों देशों के बीच 100 अरब डॉलर का व्यापार है। युद्ध किसी के हित में नहीं है। परस्पर व्यवसाय तभी संभव है, जब तनाव सीमित रहेंगे।
अभी भारतीय सेना के मनोबल की बात करें, तो वह बहुत मजबूत है। भारतीय सैनिक 18,000 किलोमीटर की ऊंचाई पर भी लड़ने में सक्षम हैं। इतनी ऊंचाई पर मुकाबला करने की क्षमता किसी और देश के सैनिकों में नहीं है। चीन भी समझता है, इस तरह की लड़ाई में अब वह भारत से पार नहीं पा सकता। भारतीय सेना बहु-प्रशिक्षित है। इसके अलावा, चीन की पीपुल लिबरेशन आर्मी को लड़ने का अनुभव नहीं है, जबकि भारत को लगातार ही लड़ना पड़ रहा है। चीन से भयभीत होने की जरूरत नहीं है। हमारी सेनाओं का मनोबल टॉप पर है। अब समय आ गया है, सैन्य बजट कम से कम पांच प्रतिशत होना चाहिए। अभी यह तीन प्रतिशत है। सेना का आधुनिकीकरण तेज कर देना चाहिए।
हमें लगता है कि चीन हमें घेर रहा है, लेकिन वास्तव में हमने उसे घेर रखा है, जिससे वह बौखलाया हुआ है। वह सोचता है कि हम अमेरिका से गठबंधन कर चुके हैं, चीन की कंपनियों को निकालना चाहते हैं। हमने ऑस्ट्रेलिया से समझौता किया है, उसके जहाजों को हम पेट्रोल देंगे। चीन को लगता है, हम उसे दक्षिणी चीनी सागर में भी घेर रहे हैं। भारतीय संसद में जब अनुच्छेद 370 को खत्म करने का फैसला लिया गया था, तब कहा गया था कि हम पीओके और कश्मीर के अपने पूरे हिस्से को हर हाल में वापस लेंगे। अब चीन को लग रहा है कि उसने अपने कब्जे वाले इलाके में जो सड़क बनाई है, वही सड़क घूमकर पाकिस्तान जा रही है, उसका क्या होगा? वह परेशान है, लेकिन पूरे तनाव के बीच हमें अपने पक्ष में समाधान निकालना होगा। यह हमारा दुर्भाग्य है कि हम अपने पड़ोसी नहीं बदल सकते।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) मोहन भंडारी, रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल