ओपिनियन / शौर्यपथ / एक अन्य एशियाई ताकत के उद्भव से चीन असहज हो गया है। संयुक्त राष्ट्र और दूसरे वैश्विक मंचों पर भारत द्वारा पेश किए जाने वाले प्रस्तावों पर हीला हवाली करने के अलावा, वह उप-महाद्वीप में नई दिल्ली के प्रभाव को रोकने की कोशिशों में भी जुटा है। चारों तरफ से हमें घेरने के लिए वह हमारे पड़ोसी देशों पर फोकस कर रहा है। पाकिस्तान के साथ एक सामरिक साझेदारी उसने की है, जबकि अन्य देशों के साथ अपने कूटनीतिक, आर्थिक और सैन्य संबंध आगे बढ़ाए हैं। इस काम के लिए बेल्ट ऐंड रोड इनीशिएटिव (बीआरआई) का इस्तेमाल किया गया है। एक हाथ लो और दूसरे हाथ दो के साथ-साथ वह दादागिरी की नीति भी अपनाता है। इंडो-पैसिफिक (हिंद महासागर व प्रशांत क्षेत्र के बीच का भू-राजनीतिक इलाका), अफ्रीका और कुछ अन्य क्षेत्रों में चीन ने आंतरिक मामलों में निर्लज्जता से दखलंदाजी की है।
यह सही है कि उभरती हुई तमाम बड़ी ताकतें भू-राजनीतिक क्षेत्र में अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए आक्रामक हो जाती हैं। मगर इस मामले में चीन का व्यवहार अपरिपक्व दिखता है। बेशक अपनी समग्र राष्ट्रीय ताकत (सीएनपी) को उसने तेजी से बढ़ाया है, पर अब भी कई आंतरिक और बाहरी चुनौतियां हैं, जो राष्ट्रपति शी जिनपिंग की रातों की नींद हराम करती हैं। ये चुनौतियां अर्थव्यवस्था, पीपुल्स लिबरेशन आर्मी, यानी पीएलए के नेतृत्व, राष्ट्रीय मनोबल और दुनिया भर में बढ़ती चीन-विरोधी भावना से जुड़ी हुई हैं।
दरअसल, चीन की सिकुड़ती अर्थव्यवस्था ने बडे़ पैमाने पर बेरोजगारी पैदा की है। सरकार के स्वामित्व वाले उद्यमों को सशक्त बनाने की चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) की नीति ने निजी क्षेत्र को खासा प्रभावित किया है, जो सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में करीब 65 प्रतिशत और नई नौकरियों के सृजन में लगभग 90 फीसदी का योगदान देता है। इसके अलावा, विनिर्माण क्षेत्र की समस्या, बढ़ते कर्ज और बुजुर्ग होती आबादी (जो भविष्य में श्रम-बल को कम करेगी) दीर्घावधि में चीन की आर्थिक स्थिरता को प्रभावित करेगी।
साल 2012 में शी जिनपिंग ने पीएलए को विश्व स्तरीय सेना बनाने की घोषणा की थी, जो 2049 तक ‘दुनिया के सर्वशक्तिमान मुल्क’ बनने की चीन की राह को आसान बनाएगी। तब से, सेना की जंगी ताकत बढ़ाने और सीपीसी के प्रति उसकी जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए तमाम सुधार कार्य किए गए हैं। हालांकि, सुधारों में निजी तौर पर रुचि ले रहे शी जिनपिंग पीएलए नेतृत्व के पेशेवर मानकों से खुश नहीं हैं, क्योंकि उसके पास युद्ध लड़ने का व्यावहारिक अनुभव नहीं है। कई थिंक-टैंकों ने बताया है कि पीएलए के पास अन्य सेनाओं को चुनौती देने लायक जरूरी क्षमताओं का अभाव है।
इसी तरह, समग्र राष्ट्रीय ताकत (सीएनपी) का एक महत्वपूर्ण घटक राष्ट्रीय मनोबल है। चीन के इस मनोबल को उसकी एकतरफा मीडिया रिपोर्टिंग व ‘वुल्फ वॉरियर्स’ के नाम से शुरू कूटनीतिक सक्रियता से नहीं आंकना चाहिए। इन दोनों का मकसद पश्चिमी और भारतीय मीडिया का मुकाबला करने के साथ-साथ शासन के चीनी मॉडल का प्रचार-प्रसार और शी जिनपिंग को एक वैश्विक नेता के रूप में पेश करना है। मगर बेरोजगारी में वृद्धि, नागरिक स्वतंत्रता पर पाबंदी और वंचितों व अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न की वजह से अंदरखाने में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के खिलाफ असंतोष बढ़ रहा है। पार्टी के नियंत्रण का दायरा बढ़ाने संबंधी शी जिनपिंग के सख्त रुख से भी लोग नाराज दिखते हैं। सार्वजनिक सूचनाओं की मानें, तो 2013 से 2018 के बीच जिनपिंग ने 23 लाख से अधिक कर्मचारियों को बर्खास्त और कैद किया, जिनमें पीएलए के कई वरिष्ठ अधिकारी और नौकरशाह भी शामिल हैं।
इस सूरतेहाल में यह कहना अनुचित नहीं कि पूर्वी लद्दाख में पीएलए ने जो दुस्साहस दिखाया है, वह गलत आकलन के साथ उठाया गया उसका कदम है। संभवत: बीजिंग को भारत से दृढ़ राजनीतिक-सैन्य प्रतिक्रिया की उम्मीद नहीं थी। हमारा सैन्य ढांचा और जवाबी रणनीति, उसकी अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचाने की हमारी तरकीबें और अंतरराष्ट्रीय समर्थन हासिल करने की हमारी क्षमता निश्चय ही बीजिंग की मुश्किलें बढ़ाएंगी।
भारत की फौरी रणनीति यही होनी चाहिए कि सैन्य और सियासी बातचीत के जरिए वास्तविक नियंत्रण रेखा पर यथास्थिति बहाल की जाए। सेना को तमाम संभव विकल्पों के बाद ही आजमाना चाहिए। इन विकल्पों के साथ-साथ हमें अपनी बढ़त बनाए रखने, साइबर डोमेन में व्यावहारिक कदम उठाने और पाकिस्तान के दुस्साहस को विफल करने के लिए भी तैयार रहना होगा।
रही बात दीर्घकालिक रणनीति की, तो यह व्यावहारिक और राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर बनानी होगी। चीन से मिलने वाले धोखे का खतरा कम से कम रहे, इसके लिए हमें तमाम रास्तों और उपायों के साथ तोड़ निकालना होगा। यहां तोड़ असल में वे उद्देश्य हैं, जो हम चीन को लेकर हासिल करना चाहते हैं। उपाय का अर्थ राजनीतिक, कूटनीतिक, आर्थिक, सैन्य और सूचना तत्व के साथ-साथ सरकार के सामने उपलब्ध अन्य आंतरिक व बाह्य संसाधन हैं, जबकि रास्ते का मतलब कुशल व प्रभावी तरीकों से संसाधनों का इस्तेमाल करना है, ताकि हम अपने उद्देश्य में सफल हो सकें।
अंतरराष्ट्रीय समर्थन हासिल करने के दौरान, चीन को आर्थिक चोट पहुंचाने वाली नीतियों का लाभ भारत को उठाना चाहिए, और अपनी सामरिक ताकत बढ़ाने व बुनियादी ढांचे के विस्तार की तरफ तेजी दिखानी चाहिए। पहाड़ों पर जवाब देने में सक्षम माउंटेन स्ट्राइक कॉप्र्स पर फिर से गौर करना संभवत: एक रणनीतिक अनिवार्यता है। इसका इस्तेमाल नव-निर्मित युद्ध समूहों में हो सकता है। मैं इस मुद्दे पर इसलिए बल दे रहा हूं, क्योंकि जुलाई, 2014 में चीन की आधिकारिक यात्रा के दौरान मैंने महसूस किया था कि पीएलए नेतृत्व में इस पलटन को लेकर चिंता और बेचैनी है।
चूंकि जरूरी सामरिक ताकत के विकास में अभी वक्त लगेगा, इसलिए क्षेत्रीय सैन्य समीकरणों को संतुलित करने के लिए समान सोच वाले देशों को एकजुट करना समझदारी है। हालांकि, इसके लिए काफी मेहनत करनी होगी। चीन की कटुता का प्रभावी मुकाबला करने के लिए राष्ट्र को अपने थल सैनिकों, नौसैनिकों और वायु सैनिकों के पीछे मजबूती से एकजुट होना चाहिए। यह सेना के मनोबल को उच्चतम स्तर पर बनाए रखने में मदद करेगा, जो कि जीत हासिल करने की अनिवार्य शर्त होती है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)जनरल बिक्रम सिंह, पूर्व थलसेना प्रमुख