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हर साल, पहली जनवरी को नए संकल्प लिए जाते हैं किंतु ये संकल्प कितने समय तक टिक पाते हैं, यह जगज़ाहिर है। नए संकल्पों को तोड़कर, पुराने ढर्रों पर लौट जाने वाले लोगों के सम्मान में यह दिन मनाने की शुरुआत की गई है। अंग्रेज़ इसे ‘क्विटर्स डे’ कहते हैं, यानी कि छोड़ भागने वालों का दिन।
एक तथ्य के अनुसार, हर तीन में से एक व्यक्ति संकल्प के पहले महीने में ही उसे तोड़ देता है। स्क्रैंटन विश्वविद्यालय के एक अध्ययन के अनुसार 80 प्रतिशत लोग अपने फ़ैसलों पर टिक नहीं पाते हैं।
हालांकि, इस दिन के साथ कोई इतिहास जुड़ा हुआ नहीं है किंतु कुछ लोग इसे जनवरी के दूसरे शुक्रवार या कुछ लोग 19 जनवरी को मानते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि एक आदत को अपनी दिनचर्या में शामिल करने में क़रीब 21 दिन का समय लगता है। लेकिन शुरुआती जोश धीमे-धीमे मंद होता जाता है और 19वां दिन आते-आते लोगों का संकल्प दम ताेड़ देता है।
कारण स्पष्ट है कि लोग अत्यधिक महत्वाकांक्षी होकर बड़े-बड़े लक्ष्य निर्धारित कर लेते हैं, किंतु अपने जीवन में कोई विशेष बदलाव नहीं ला पाते।
‘बस, अब मुझसे नहीं होता’
यदि जोश में लिए गए संकल्प के पश्चात अब आपका यही वाक्य बन चुका है तो यह दिन सिर्फ़ आपके लिए है।
जश्न मनाइए! और, यदि आप अभी भी मैदान फ़तह करने का जज़्बा रखते हैं तो भी यह दिन आपके लिए है जो आपको याद दिलाएगा कि आपको हार नहीं मानना है।
तब भी जश्न मनाइए!
अब आपको किस जश्न में शरीक़ होना है, आख़िरकार यह फ़ैसला आपका ही है।