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राफेल का स्वागत

  • rounak group

सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ / भारत में राफेल जैसे लड़ाकू विमान का लंबे समय से चल रहा इंतजार खत्म हो गया। पांच विमानों की पहली खेप के भारत पहुंचते ही हमारी ताकत में जो इजाफा हुआ है, उससे निश्चित ही हमारी सेनाओं के मनोबल में वृद्धि हुई होगी। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि हम रक्षा सौदों में दो दशक से ज्यादा ढिलाई की वजह से कोई भी लड़ाकू विमान खरीद नहीं पा रहे थे।
जब 2016 में फ्रांस के साथ 36 राफेल के लिए सौदा हुआ, तब हमें भूलना नहीं चाहिए कि उसे लेकर किस तरह के विवाद हुए थे। राजनीतिक क्षेत्र में किस तरह से चर्चाएं हुई थीं। बहुत अप्रिय ढंग से आरोप-प्रत्यारोप लगे थे। संभव है, राजनीतिक विवाद न होते और रक्षा सौदों के प्रति हमारे प्रतिष्ठानों में पूरी निष्ठा व त्वरा होती, तो भारत को नए विमानों के लिए इतना लंबा इंतजार नहीं करना पड़ता।
पिछली सदी में सुखोई विमान खरीदे गए थे, अब 23 साल बाद राफेल मिला है, तो भारत में इसके मानसिक-सामरिक महत्व को समझा जा सकता है। अव्वल तो भारतीय गगन में एक असुरक्षा का भाव आने लगा था, पुराने पड़ चुके मिग विमानों की दुखद स्थिति आए दिन रुलाने लगी थी। ऐसे विमानों को उड़ाने की जरूरत पड़ रही थी कि जिन्हें उड़ते ताबूत तक कह दिया जाता था। बेशक, अब राफेल के आने के बाद हम अपनी वायुसेना के और उज्ज्वल भविष्य की ओर देख सकेंगे। सुखोई-30 जैसे विमान अभी भी सेवारत हैं, लेकिन सैन्य जरूरतों को पूरा करने के लिए हमें राफेल या उससे भी विकसित 200 से ज्यादा विमानों की जरूरत है। और अभी तो पांच विमानों के साथ शुरुआत हुई है, अगले साल तक जब सभी 36 राफेल भारत आ जाएंगे, तो जाहिर है, देशवासियों को ज्यादा सुरक्षा का एहसास कराएंगे। राफेल का आना बड़ी खुशखबरी है, लेकिन हमें अपना पारंपरिक संयम भी नहीं खोना चाहिए। भारत ने हथियार या विमान कभी भी किसी पर हमले के लिए नहीं खरीदे हैं, हमारी एक-एक रक्षा खरीद अपने बचाव के लिए है। हमें किसी अन्य देश की जमीन नहीं चाहिए, हमें किसी पर हमला नहीं करना है, हमें केवल अपना बचाव करना है। हां, जो हमसे दुश्मनी पालना चाहते हैं, उन्हें पता होना चाहिए कि भारत ईंट का जवाब पत्थर से दे सकता है। साथ ही, इस रक्षा उपलब्धि के पक्ष या विपक्ष में किसी तरह की सियासत से बचना चाहिए।
राफेल का आना हमारे लिए एक प्रेरणा भी है कि हम आगे के लिए और तैयार रहें। संसाधनों से भरे भारत में अब उस दौर का आगाज हो जाना चाहिए, जब हमें किसी भी देश से कोई रक्षा उपकरण खरीदने की जरूरत नहीं पड़े। अभी भारत स्वयं अगर बहुत सक्षम नहीं है, तो उसे दूसरे विकसित सहयोगी देशों के साथ मिलकर अपनी ही सीमा में रक्षा निर्माण उद्यम लगाना चाहिए। यह प्रयास शुरुआत में बहुत महंगा भले लगे, लेकिन दूरगामी रूप से भारत को इससे व्यापक मजबूती मिलेगी।
रक्षा के मोर्चे पर कोई भी तैयारी जयघोष के साथ हो, यह जरूरी नहीं। ऐसी तैयारियों को चुपचाप अंजाम देकर परिणाम देश के सामने रख देना चाहिए। राफेल या सुखोई जैसे विमानों के नए संस्करणों पर भारत को काम करना चाहिए। हमें पुराने साथी देशों जैसे रूस को भी साथ रखना होगा। राफेल की रोशनी में उन तमाम रक्षा खरीद और निर्माण योजनाओं में तेजी आनी चाहिए, जिनसे अपना देश और मजबूत होगा।

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शौर्यपथ