मेरी कहानी / शौर्यपथ / मैं जब बहुत छोटा था, तब मुझे पता नहीं था कि ‘जाट’ किसको कहते हैं। उन्हीं दिनों मैं एक मैच खेलने रोहतक गया था। जैसे ही मुझे पता चला कि वहां जाट बहुत होते हैं, तो मैंने कोच सर से कहा कि मुझे जाट दिखाइएगा। कोच साहब हंसने लगे। मैं दिल्ली में रहता था, रोहतक एक दूसरे प्रदेश का हिस्सा था, इसलिए मैं जानता नहीं था। उससे पहले दिल्ली से बाहर ज्यादा गया भी नहीं था।
मेरे करियर में रणजी ट्रॉफी का एक मैच बहुत यादगार है। पहली पारी में मैं ‘जीरो’ पर आउट हो गया था। मैच के दौरान मुझे हाथ में बहुत ज्यादा चोट लग गई थी। हाथ की चमड़ी पूरी छिल गई थी। डॉक्टर ने कहा कि 15 दिन तक बल्ला भी नहीं पकड़ पाओगे। यह मैच वानखेड़े स्टेडियम में था। तब वानखेड़े स्टेडियम में ‘साइड’ में प्रैक्टिस विकेट हुआ करती थीं। वहां ‘स्लाइड’ मारी, तो हाथ बुरी तरह छिल गया। डॉक्टर ने कहा कि अगर बैट पकड़ोगे, तो ‘इन्फेक्शन’ का खतरा है। बावजूद इसके मैंने बल्लेबाजी की। हम दो सौ से ज्यादा के लक्ष्य का पीछा कर रहे थे। उस मैच में मैंने 120 रन नॉट आउट बनाए, वह भी एक हाथ से बल्लेबाजी करके। मैच उत्तर प्रदेश के खिलाफ था। पहली पारी में हमारे ऊपर 60 रनों की ‘लीड’ थी, तब भी हमने वह मैच जीता था। उस साल मैंने चार शतक लगाए थे। कप्तानी करते हुए पहले चार मैचों में ये लगातार चार शतक लगे थे।
इसके बाद 2003 में भारतीय टीम विश्व कप खेलकर लौटी थी। सौरव गांगुली की कप्तानी में भारतीय टीम ने फाइनल तक का सफर तय किया था, पर फाइनल में ऑस्ट्रेलिया ने भारत को हरा दिया था। वहां से लौटने के बाद खिलाड़ियों को ‘ब्रेक’ चाहिए था। इसी समय भारतीय टीम को बांग्लादेश के खिलाफ सीरीज खेलनी थी। इसी सीरीज के लिए मुझे पहली बार भारतीय टीम के लिए चुना गया। मुझे ‘सेलेक्ट’ तो पहले ही होना चाहिए था। मैंने जिम्बॉब्वे के खिलाफ एक दिन में 200 रन बनाए थे। उस साल मैंने तीन ‘बैक टु बैक’ दो सौ किए थे। मैंने ये तीन दोहरे शतक रेलवे, साइड गेम में जिम्बॉब्वे के खिलाफ और फिर सीजन के पहले मैच में रेलवे के खिलाफ लगाए थे, फिर भी मेरे ‘सेलेक्शन’ में देरी हुई। मुझे लगातार लग रहा था कि अब मुझे मौका मिलना चाहिए, पर मौका मिल नहीं रहा था। मेरी बेचैनी और ‘नर्वसनेस’ बढ़ते जा रहे थे। मुझे लग रहा था कि बांग्लादेश के खिलाफ मौका मिल तो गया है, पर अगर सीरीज में रन नहीं बने, तो कहीं दोबारा सब कुछ फिर से तो शुरू नहीं करना पड़ेगा। कीर्ति आजाद सेलेक्टर थे। उन दिनों टीम में सेलेक्शन की जानकारी या तो फोन से मिलती थी या फिर टीवी चैनल से। मोबाइल का दौर इतना नहीं था। जब यह खबर आई, तो मेरी नानी मुझे मंदिर लेकर गई थीं। मेरी नानी वैसे भी मंदिर बहुत जाती थीं।
भारतीय टीम में चुने जाने का संतोष बहुत बड़ा था, क्योंकि मैंने बहुत रन बनाए थे। मैं काफी समय से टीम में चुने जाने का इंतजार कर रहा था। इंटरनेशनल टीम में चुने जाने से पहले मेरे 15 से ज्यादा फस्र्ट क्लास शतक थे। आजकल तो खिलाड़ी एक-दो शतक लगाते हैं और फिर आईपीएल के जरिए टीम में आ जाते हैं। मेरी औसत 55-56 रनों की थी, जब मुझे टीम इंडिया में चुना गया। इसके बाद अगले चार साल में मुझे लगभग 20-22 मैचों में ही मौका मिला। जिसमें मेरे दो शतक थे। टेस्ट टीम में भी मेरा ‘सेलेक्शन’ हो गया था। उसमें भी मैं शतक लगा चुका था। अब 2007 विश्व कप की टीम चुने जाने का वक्त था। 2007 विश्व कप में मेरे साथ बिल्कुल वही हुआ था, जो आज अंबाती रायडू के साथ हुआ है। मैं लगातार टीम के साथ था। मैच खेल रहा था। एक मैच में मेरी ‘परफॉरमेंस’ खराब थी और उसमें रॉबिन उथप्पा ने अच्छा प्रदर्शन किया था।
पहले मैं टीम से बाहर हुआ और फिर ‘स्क्वाड’ से भी बाहर हो गया। इसके बाद विश्व कप की टीम से भी बाहर हो गया। जब आप विश्व कप से एक सीरीज पहले टीम से बाहर हो जाएं, तो बहुत निराशा होती है। अगर आप एक साल पहले बाहर हो जाएं, तो हालात स्वीकार करने का समय मिल जाता है। आपको पता चल जाता है कि आप टीम की ‘स्कीम ऑफ थिंग्स’ में नहीं हैं, लेकिन अगर आप एक सीरीज पहले बाहर हों, तो बहुत बुरा लगता है। मेरे साथ यह भी था कि 2007 से पहले मैं कोई विश्व कप खेला नहीं था। अंडर-19 विश्व कप भी मैंने ‘मिस’ किया था, जिसमें युवराज सिंह, मोहम्मद कैफ खेलकर उभरे थे। उस समय जोनल वनडे हुआ करते थे। उसमें मैंने पांच मैच खेले थे। पांचों मैच में मेरे 50 रन थे। चार मैंचों में मैं नॉट आउट था। इसके बाद भी मुझे मौका नहीं मिला था। फिर 2007 की विश्व कप टीम में भी जब मुझे मौका नहीं मिला, तो बहुत निराशा हुई। इतनी ज्यादा कि मुझे लगा कि मैं क्रिकेट खेलना छोड़ ही दूंगा।
(जारी)गौतम गंभीर, पूर्व क्रिकेटर और सांसद