मेलबॉक्स / शौर्यपथ / बुधवार का दिन भारत के लिए ऐतिहासिक रहा। काफी साल के बाद देश में नए लड़ाकू विमानों का आगमन हुआ है। राफेल से पहले भारत ने रूस से सुखोई खरीदा था। अच्छी बात यह है कि जब से मोदी सरकार सत्ता में आई है, तभी से वह नई पीढ़ी के लड़ाकू विमानों के लिए प्रयासरत है। राफेल के आने के बाद अब भारत अपनी ही जमीन से चीन और पाकिस्तान के अंदरूनी ठिकानों पर हवाई हमले कर पाएगा। इसी तरह, बुधवार की दूसरी घटना आने वाले समय में भारत को विश्व-गुरु बनाने की दिशा में सहायक साबित होगी। सरकार ने नई शिक्षा नीति की घोषणा की है, जो मैकाले की शिक्षा नीति को पलटकर रख देगी। नई नीति से उद्यमी ज्यादा पैदा होंगे, क्योंकि इसमें किताबी ज्ञान से ज्यादा हुनर निखारने पर जोर दिया गया है। आजादी के बाद से ही इसकी आवश्यकता महसूस की जा रही थी, लेकिन पिछली सरकारों ने इस दिशा में कुछ ठोस नहीं किया। मौजूदा सरकार उम्मीदों पर खरी उतर रही है।
ब्रज किशोर सिंह
चुनौतियां कायम हैं
बेशक सरकार ने नई शिक्षा नीति को मंजूर कर लिया है, लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा कि बगैर बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराए यह नीति कैसे सफल हो पाती है? नई शिक्षा नीति के तहत सरकार का पहला फोकस 5+3+3+4 शिक्षा के लिए स्कूलों और कॉलेजों में बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना और प्रशिक्षित लोगों की नियुक्ति है। जाहिर है, इस नीति को उपयोगी बनाने के लिए इसमें आम लोगों की भागीदारी जरूरी है। नई नीति में कुछ बदलाव समय के अनुरूप जरूर किए गए हैं, पर अधिकांश परिवर्तन बगैर इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ाए लागू करने का प्रयास किया जा रहा है, जिसका शायद ही सुखद नतीजा निकले।
आशीष रंजन पांडे, बरडीहा, गढ़वा
मातृभाषा पर जोर
तमाम बाल मनोवैज्ञानिक व विशेषज्ञ लगातार यह कहते रहे हैं कि बच्चे की प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में ही होनी चाहिए। इसी भाषा में बच्चा आसानी से सीख और समझ सकता है और उसका बौद्धिक विकास भी तुलनात्मक रूप से बेहतर होता है। सन् 1882 में अंग्रेजों ने जो हंटर शिक्षा आयोग गठित किया था, उसने भी यही सिफारिश की थी कि प्राथमिक शिक्षा स्थानीय (मातृ) भाषा में दी जानी चाहिए। विडंबना ही है कि जिस तथ्य को अंग्रेजों ने वर्षों पहले पहचान लिया था, उसको लेकर हम आजादी के सात दशकों के बाद भी भ्रम की स्थिति में रहे। सुखद है कि नई शिक्षा नीति में इसे कुबूल कर लिया गया है और प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में ही देने की बात कही गई है। इससे बच्चों में सीखने, सोचने और समझने की क्षमता तेजी से बढ़ेगी। हमारा देश भी उन्नति और प्रगति के उच्चतम स्तर तक पहुंचेगा।
सुरेंद्र कुमार, नजफगढ़, दिल्ली
गांवों में फैलता संक्रमण
कोरोना का कहर ऐसा बरपा कि गांवों से पलायन कर चुके लोग भी वापस अपने घर को लौट आए। लाखों श्रमिकों की चुनौती भरी घर वापसी हम सबको याद ही है। लेकिन इन श्रमिकों के साथ वे लोग भी गांव वापस आए हैं, जो संपन्न थे। अध्ययन यह बता रहा है कि जिन शहरों में प्रदूषण का स्तर अधिक है, वहां कोरोना मरीजों की संख्या में वृद्धि देखी गई है। तापमान बढ़ने से कोरोना संकट कम होगा, यह तो महज एक अनुमान रहा, हकीकत से इसका कोई वास्ता नहीं दिखा। ऐसे में, मानसून के बाद ठंड की दस्तक मुश्किलें बढ़ा सकती हैं। ठंड में इम्यूनिटी कमजोर होना आम बात है। इसीलिए बीमारी फैलने का खतरा भी होगा। चिंता की बात यह है कि यह खतरा सिर्फ महानगरों तक सीमित नहीं होगा। गांवों की ओर रुख करने वाले लोग भी इससे बच नहीं पाएंगे। इसीलिए प्रशासन को अभी से ही तैयारी कर लेनी चाहिए।
कीर्ति सैनी, हिसार