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असली रामराज्य

  • rounak group

मेलबॉक्स / शौर्यपथ / एक बहुप्रतीक्षित सपना साकार होने के करीब है, जब रामलला की मनोहारी छवि एक भव्य मंदिर में विराजेगी। निस्संदेह, करोड़ों देशवासियों की आस्था के विजय-पर्व पर भावनाओं का सैलाब उमड़ आना अपेक्षित है। लिहाजा, दशकों से तंबू-प्रवास में रह रहे रामलला के भव्य मंदिर की शुरुआत को उत्सव का स्वरूप क्यों न दिया जाए? एक तरफ, अयोध्या में इसकी तैयारियों की भव्यता अपने चरम पर है, तो वहीं मर्यादा पुरुषोत्तम की जन्मस्थली वाले प्रदेश में ही इंसानी संवेदनाओं की हत्या सारी मर्यादाओं को तार-तार कर रही है। हैवानियत की एक तस्वीर लिए मन बार-बार पूछ रहा है कि राम तो आएंगे, पर उनका रामराज्य कब आएगा? कहते हैं कि पैदा होने से पहले और मरने के बाद इंसान जाति-धर्म के बंधनों से मुक्त रहता है। फिर उस शव की जाति उसका पीछा क्यों नहीं छोड़ पाई, जो एक स्त्री का था? तथाकथित निम्न जाति की स्त्री होने में भला उसका क्या कुसूर था कि सम्मान के साथ विदा लेने का उसका हक भी उससे छीन लिया गया?
एमके मिश्रा, रातू, रांची, झारखंड

गरीबों की सुध
गरीबों का कोई नहीं होता, पर उसकी वजह से सब जरूर होते हैं। इतिहास से लेकर वर्तमान तक यह वाक्य सही जान पड़ता है। गरीबों का न कोई धर्म होता है, न जाति, और न कोई उनके सम्मान की कद्र करता है। वे तो बस इस भेड़चाल भरी दुनिया में पिसते रहते हैं। उनके लिए योजनाएं बंद एसी कमरों में बनती हैं, अफसरों व नेताओं को उनकी दयनीय स्थिति सुधारने के उपाय तलाशने के लिए विदेश भेजा जाता है, पर आजादी के सात दशकों के बाद भी गरीबी देश में बनी हुई है। यहां तक कि अब उसमें एक बार फिर वृद्धि होती दिख रही है। कोरोना संक्रमण ने गरीबों के लिए चुनौती बढ़ा दी है। क्या हमारे नीति-नियंता उनकी सुध लेंगे?
हर्ष कुमार, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली

एक नई चुनौती
कोरोना के गंभीर संक्रमण-काल में प्राकृतिक आपदा भी गंभीर चुनौती पेश कर रही है। ऐसा लग रहा है कि एक समस्या खत्म हुई नहीं कि दूसरी आ गई है। हालांकि, इसकी एक वजह हम खुद भी हैं, क्योंकि प्रकृति में मानव का हस्तक्षेप काफी भयावह है। उत्तर बिहार और असम में तो स्थिति कहीं ज्यादा चिंताजनक है, जहां एक बड़ी आबादी बाढ़ से घिरी हुई है। यहां न जाने कितने लोग बेघर हो चुके हैं और वे सड़कों पर ही रहकर अपना गुजारा कर रहे हैं। मुुश्किल यह भी है कि जब बाढ़ का पानी उतरता है, तो कई तरह की बीमारियां पैदा होती हैं, जिससे इंसानी जान-माल की व्यापक क्षति होती है। इसलिए यह जरूरी है कि बाढ़ पीड़ितों के हितों में सरकार विशेष कदम उठाए। हालांकि, यह आम लोगों का भी फर्ज है कि बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए वे आगे आएं और बढ़-चढ़कर मदद करें।
उदय कुमार ,जादोपुर, गोपालगंज

खत्म हो दादागिरी
पूरी दुनिया को कोरोना बीमारी देने के कारण चीन सभी के लिए सिरदर्द बना हुआ है। ऐसे में, उसके खिलाफ सभी राष्ट्रों को मिलकर ठोस रणनीति बनानी चाहिए। इसमें संयुक्त राष्ट्र को भी शामिल किया जाना चाहिए। दिक्कत यह भी है कि चीन अब भी विस्तारवादी नीति अपना रहा है। हमारे साथ लद्दाख में उलझने के अलावा वह कई अन्य देशों से भी सीमा विवाद में शामिल है। इसलिए यह समझ में नहीं आता कि परेशानी झेलने के बाद भी दुनिया के देश चीन के खिलाफ एकजुट प्रयास क्यों नहीं कर रहे? संभव है, इसके पीछे उसका एक बड़ी आर्थिक ताकत होना कारण हो। हालांकि, बड़ी से बड़ी आर्थिक ताकत को भी अकेला कर दिया जाए, तो वह सुधर जाती है। चीन के साथ यही रणनीति अपनाई जानी चाहिए। सभी देशों को उससे रिश्ता खत्म कर लेना चाहिए।
सुमित कुमार रस्तोगी
संभल, उत्तर प्रदेश

 

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शौर्यपथ