नजरिया / शौर्यपथ /भले ही भारत में कोविड-19 संक्रमण बढ़ रहा है, रोजाना करीब 50,000 मामले आ रहे हैं, लेकिन सरकार ने अनलॉक 3.0 लागू करने का फैसला लिया है। अनलॉक 3.0 निश्चित रूप से आर्थिक गतिविधियों को तेज करने वाला है। कुछ आर्थिक वृद्धि दर्ज भी हुई है, लेकिन इसे अर्थव्यवस्था में पूरी बहाली मान लेना अतिशयोक्ति होगी। आर्थिक गतिविधियों को रियायत मिली है, लेकिन अभी अर्थव्यवस्था मंदी से उबरने के किसी भी संकेत से दूर है। हालांकि, इस साल मानसून की बारिश अच्छी होने की उम्मीद है, साथ ही, कृषि ऐसा अकेला क्षेत्र है, जहां मजबूत वृद्धि की संभावना जताई जा रही है।
पिछले वित्त वर्ष में चार प्रतिशत से ज्यादा वृद्धि के साथ कृषि क्षेत्र देश में तीसरे स्थान पर रहा था। आज ऐसी संभावना नहीं है कि कृषि 2019-20 के समान विकास दर दर्ज करे। मुद्दा यह है कि क्या चार-पांच प्रतिशत की विकास दर के साथ हमारा कृषि क्षेत्र बाकी अर्थव्यवस्था को भी संभालने के लिए पर्याप्त है। ध्यान रहे, बाकी क्षेत्रों में नकारात्मक विकास दर देखी जा रही है। समग्र विकास को अगर देखें, तो कृषि विकास अप्रासंगिक लग सकता है, क्योंकि कृषि का राष्ट्रीय आय में योगदान सिर्फ 15 प्रतिशत है। लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि कृषि विकास देश में आर्थिक गतिविधियों का एक मुख्य संचालक है। चूंकि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में मांग घटी हुई है, इसलिए पूरी अर्थव्यवस्था लंबे समय से संकट में है।
इस पर अब आम सहमति है कि मौजूदा मंदी मुख्य रूप से घटती मांग का नतीजा है। कृषि विकास कितना प्रभावशाली है, इसे आंकने के लिए कृषि उत्पादन में वृद्धि की बजाय किसान की आय को देखना चाहिए। कृषि उत्पादन में वृद्धि का तात्पर्य किसानों की आय में वृद्धि से है। किसानों की आय अनेक चीजों पर निर्भर है। सबसे अहम बात, यह किसानों की उपज की कीमत पर निर्भर है, मगर अभी इस मोर्चे पर शुरुआती संकेतक बहुत उत्साहजनक नहीं हैं। थोक मूल्य सूचकांक पिछले तीन महीनों में थोक मूल्यों में गिरावट के साथ अपस्फीति की ओर इशारा कर रहा है। कीमतें घट रही हैं और किसानों की आय भी। मुद्र्रास्फीति में गिरावट का मतलब है कि अधिकांश खाद्य पदार्थों की कीमतों में गिरावट का रुख है। भले ही अनाज की कीमतों में सकारात्मक मुद्रास्फीति जारी है, लेकिन अन्य अधिकांश खाद्य पदार्थ, जैसे फल, सब्जियां, अंडे, मुर्गी और मछली की कीमतों में गिरावट जारी है। गिरावट का यह क्रम अब दूध की कीमतों में भी दिख रहा है और अन्य महत्वपूर्ण नकदी फसलों, जैसे कपास व तिलहन में भी। इसलिए भले ही कृषि उत्पादन में वृद्धि जारी हो, मगर यह वृद्धि किसानों के लिए बेहतर आय में नहीं बदल रही है। कृषि की लागत में वृद्धि के साथ अधिकांश छोटे और सीमांत किसानों की आय में वृद्धि की बजाय गिरावट की आशंका है।
पिछले दो वर्षों के दौरान किसान कुछ भाग्यशाली थे, जब राजनीतिक अभियानों के कारण सरकारों ने बड़ी मात्रा में अनाज खरीद की थी, पर इसका दूसरा पहलू यह है कि इस साल सरकारी खरीद की सुविधा पहले की तरह रहने की संभावना नहीं है। अनाज भंडार अभी भरे हुए हैं। किसानों की आय जब दबाव में है, तब कमजोर गैर-कृषि क्षेत्रों से भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचने की आशंका है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कृषि अब कुल आय का केवल एक-तिहाई हिस्सा है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था के बाकी दो-तिहाई हिस्से में छोेटे और मध्यम उद्यम हैं, जो महामारी से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। गांवों में आय या कमाई घटने का एक और कारण भी है कि कई शहरी प्रवासी अपने गांव लौट आए हैं।
ऐसे में, भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेत दिखने की संभावना तब तक नहीं है, जब तक कि कृषि को राजकोषीय प्रोत्साहन न हासिल हो। ऐसे वित्तीय उपाय करने होंगे, जिससे कृषि वस्तुओं की व्यापक मांग पैदा हो। सरकार को अपना खर्च बढ़ाने की जरूरत पड़ेगी। न केवल खरीद और सब्सिडी में वृद्धि के माध्यम से, बल्कि गैर-कृषि ग्रामीण क्षेत्र को भी बढ़ावा देकर मांग में वृद्धि की जा सकती है। राजकोषीय प्रोत्साहन का एक और बड़ा दौर न केवल जरूरी है, बल्कि खरीफ फसलों के इस मौसम में अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने के लिए भी जरूरी है। भारतीय किसानों ने अपना काम किया है, अब समय है कि सरकार अपना काम करे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)हिमांशु, एसोशिएट प्रोफेसर, जेएनयू