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अवसाद से रक्षा

  • rounak group

सम्पादकीय / शौर्यपथ / कोरोना का समय पूरी दुनिया के लिए जितना अभूतपूर्व है, उतना ही चुनौतीपूर्ण भी। हम अपने चारों ओर सेहत की अत्यधिक चिंता, तनाव, काम में व्यवधान और साथ ही अपने स्वजनों, दोस्तों से दूरी का दुखद एहसास कर रहे हैं। जिंदगी को खुशनुमा ढंग से जीने के बहाने कम हो गए हैं। लोगों की मानसिक स्थिति पर गहरा असर पड़ा है। नई पीढ़ी का मन खास रूप से आहत हुआ है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन यानी आईएलओ द्वारा किए गए वैश्विक स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार, दुनिया में हर दूसरा युवा चिंता व अवसाद से ग्रस्त हो गया है। कोविड-19 के प्रभाव में 17 प्रतिशत से अधिक युवा ज्यादा पीड़ित हुए हैं। सर्वेक्षण रिपोर्ट के निष्कर्षों को ‘यूथ ऐंड कोविड-19 : नौकरियों, शिक्षा, अधिकारों और मानसिक हित पर प्रभाव’ शीर्षक से प्रकाशित किया गया है। इस सर्वेक्षण के लिए दुनिया के 112 देशों से 12,000 से अधिक प्रतिक्रियाएं ली गईं, जिनमें एक बड़ा हिस्सा शिक्षित युवाओं व इंटरनेट का उपयोग करने वालों का है।
सर्वेक्षण में 18 से 29 वर्ष की आयु के नौजवान शामिल थे, जिन्हें रोजगार, शिक्षा, मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण जैसे मुद्दों पर बात करने के लिए कहा गया था। सर्वेक्षण के अनुसार, युवाओं ने मानसिक सेहत संबंधी समस्याओं में बढ़ोतरी के लिए एक से अधिक कारण गिनाए। शिक्षा के साधनों में बदलाव और जीवन को लेकर अनिश्चितता ने उन्हें चिंता की ओर धकेला है। कक्षाओं और परीक्षाओं के न होने का असर भी समाज पर पड़ा है। ऑनलाइन कक्षाओं से भी एक अलग ही तरह की जिंदगी शुरू हुई है, उससे तनाव कम नहीं हुआ, बल्कि बढ़ गया है। उम्र के तीसरे व चौथे दशक में चल रहे युवाओं को रोजगार के अभाव और वर्तमान रोजगार के छूटने की चिंता ने घेर लिया है। घर से काम करने के साथ ही काम के घंटे भी बढ़ गए हैं। लोगों की जिम्मेदारियां बढ़ी हैं, थकावट व कुछ गंवा देने के भाव का असर मानसिक सेहत पर पड़ा है। सर्वेक्षण से पता चला है कि युवा छात्रों पर ज्यादा असर हुआ है। नया हुनर सीखने, सुधारने और आगे शिक्षा के लिए तरसते युवाओं के लिए यह समय बोझिल बन गया है। रिपोर्ट के अनुसार, शिक्षा में परिवर्तन व ऑनलाइन कक्षा के कारण 65 प्रतिशत युवाओं ने जरूरत से कम सीखा है। करीब 50 प्रतिशत युवाओं को आशंका है कि उनकी शिक्षा देर से पूरी होगी। कम से कम नौ प्रतिशत को अपनी परीक्षा में फेल होने की आशंका है, जिससे उन्हें मानसिक तनाव का अनुभव हो रहा है। एक और बात महत्वपूर्ण है कि महिलाओं की मानसिक खुशहाली ज्यादा प्रभावित हुई है, उसमें भी 18 से 24 वर्ष की महिलाओं पर ज्यादा असर हुआ है।
आईएलओ के अध्ययन में बताया गया है कि इन मानसिक चुनौतियों का जवाब हमें अभी ही खोजना होगा, वरना महामारी के खत्म होने के बाद दुनिया को स्वास्थ्य के और बड़े संकट का सामना करना पड़ सकता है। जीवन की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए सभी सरकारों को तनाव बढ़ाने वाले उपक्रमों या हरकतों से बचना होगा। सकारात्मक सोच वाले लोगों को आगे आकर मानसिक रूप से कमजोर हुए लोगों को सहारा देना होगा। आज सरकारों, डॉक्टरों, शिक्षकों व अभिभावकों की चुनौती बहुत बढ़ गई है। हमें समझना होगा कि एक-एक युवा हमारे लिए मूल्यवान है, तभी हम उन्हें अवसाद से बचाने में कामयाब होंगे।

 

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शौर्यपथ